ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
बाँधोगे तो मन तुमको जहाँ चाहे वहाँ पटक देगा, यह निश्चय सम्भो । क्या आपको इसका अनुभव नहीं है ? “आत्मोद्धार कैसे हो ?” इस पर सन्त कहते हैं “मन की कथनी से उलटी रीति पर चलो—उलटी चाल चलो । मन का गुलाम सब का गुलाम है । वह पंडित होने पर भी महामूर्ख है, बलवान होने पर भी महान दुर्बल है और राजा होने पर भी पूरा दुखी, अभागा और मिखारी है ।” मन का स्वामी ही सम्पूर्ण जगत् का स्वामी है, चाहे वह शरीर से भले ही दुर्बल हो । श्रीगोस्वामो जी कहते हैं:—
काम कोष मद लोभ की, जब लग मन में खान ।
तुलसी परिडित मूरखो, दोनों एक समानं ॥ १ ॥
अतः हमें चाहिये कि इस अन्ध में दिये हुये सरल, श्रेष्ठ व अमूल्य नियमों द्वारा अपने मन को स्वाधीन कर ब्रह्मचर्य का सच्चा पालन करें तथा अपना सच्चा उद्धार कर लें ।
१३—वीर्य की उत्पत्ति
“रसाद्रकं ततो मांसम् मासान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्याऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्लसंभवः ॥
—श्रीशुश्रुताचार्य
मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह प्रथम पेट में आकर पचने लगता है और उसका रस बनता है; उस रस का पांच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है; रक्त का भी पांच दिन तक पाचन होता है और उससे मांस बनता है । पाचन की यह क्रिया एक सेकण्ड भी बन्द नहीं रहती । एक को पचा कर