भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ वीर्य की उत्पत्ति ❁

[ ४९ ]

भर में एक बार करें” “इतने पर भी न रहा जाय तो ?” अच्छा फिर एक मास में दो बार कर सकते हो; परन्तु जल्दी मृत्यु होगी ?” “इतने पर भी शान्ति न मिली तो ?” अच्छा तो, फिर ऐसा करे कि अपने कफन का सब सामान लाकर घर में पहले रख दें और फिर जैसा दिल में आवै वैसा किया करें ! क्योंकि न मालूम किस समय उसकी मौत आ जावे और उसे खा डाले !”

रति-प्रसंग में अनेकों के अनेक मत हैं। चाहे कितना ही मत-भेद क्यों न हो परन्तु सार बात यह है कि वीर्यनाश जितना ही कम किया जायगा उतना ही स्वास्थ्य अधिक अच्छा होगा और मनुष्य दीर्घायु रहेगा, यह मत सभी को मान्य है। जितना ही अधिक विषय का सेवन किया जाता है उतना ही मन अधिक अशान्त, मलीन, पतित व दुःखी हो जाता है। वह तब ही शान्त हो सकता है जब वह या तो धर्म के अथवा प्रकृति के नियमानुसार चले किंवा मिट्टी में मिल जाय !

सब के सब ब्रह्मचारी

कोई कह सकता है “सभी लोग ब्रह्मचारी बन जायँ तो फिर स्मृति चलेगी कैसे” ? हम कहते हैं—“भित्रो ! स्मृति चलाने की फिक आप न करें। स्मृति का चलाने वाला निराला ही है। केवल आपही अपनी फिक करो और विषय के कारण अकाल में नष्ट-भ्रष्ट न बनो ! ब्रह्मचर्य से स्मृति नष्ट तो नहीं किन्तु मुक्त अवश्यमेव हो सकती है। क्योंकि ब्रह्मचर्य ही आत्मोद्धार का तथा विश्वोद्धार का सच्चा रहस्य है। अखण्ड वीर्यधारण तथा शाश्वत विषय सेवन का नाम ही ब्रह्मचर्य है। वस्तुतः ‘ब्रह्मचर्य से स्मृति