ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
नष्ट होगी' ऐसी शंका करता ही व्यर्थ व मूर्खतापूर्ण है। प्रकृति शान्त होते हुए भी 'अनन्त है वस इसी एक वाक्य में इस प्रश्न का मुँह-तोड़ उत्तर है। हमारे ब्रह्मचारी होने से अनन्त अर्थात् अन्त-रहित प्रकृति का अन्त कदापि नहीं हो सकता, यह बात हमें कभी न भूलनी चाहिए। अतः मित्रो ! प्रथम अपने ही उद्धार की कोशिश करो। क्योंकि आत्मोद्धार ही लोकोद्धार है। यदि ऐसा न करोगे तो तुम्हारी चमगीदड़ की भांति उल्टी स्थिति होगी, निश्चय जानो।
१४—गृहस्थी में ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्यं समाप्याय गृहधर्मं समाचरेत्।
ऋणश्रय विमुक्त्यर्थं धर्मणोत्पादयेत् प्रजाम् ॥ १ ॥
ब्रह्मचर्य की अवस्था पूर्ण होने के बाद पत्नीस, वर्ष की युवावस्था में गृहस्थ धर्म को स्वीकार करे और ऋणश्रय विमुक्त्यर्थ ( देव-ऋण, ऋषि-ऋण व पितृ-ऋण इनसे छुटकारा पाने के हेतु ) धर्म की विधि से सुप्रजा निर्माण करे, न कि कुप्रजा।
शास्त्रों में हमारे आचार्यों ने प्रकृति के नियमानुसार ब्रह्मचर्य के नियम पहले ही से बाँध रखे हैं। प्रकृति के नियमों के तोड़ने से किसी का भला नहीं हो सकता। यदि उन नियमों के अनुसार चले तो मनुष्य स्त्री के रहते हुए भी ब्रह्मचारी हो सकता है। अखण्ड ब्रह्मचारी में और गृहस्थ-ब्रह्मचारी में यद्यपि बहुत फर्क होता है, तब भी धर्म-नियम के अनुसार चलने वाला गृहस्थ-ब्रह्मचारी भी महान् तेजस्वी, ओजस्वी, यशस्वी, मनस्वी अर्थात् मनोनिग्रही व सामर्थ्य-सम्पन्न होता है। जिस स्थान में सच्चा