ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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ब्रह्मचारी पहुँच सकता है उसी स्थान में सच्चा गृहस्थ भी जा सकता है। परन्तु आज सच्चे गृहस्थ ब्रह्मचारी भारत में कितने होंगे ? बहुत ही कम ! यह नितान्त सत्य है कि सच्चे गृहस्थ ब्रह्मचारी के न होने से ही भारत गारत हो रहा है; घर घर में कुसन्तान फैल गई है, जो कि १२ वर्ष की उम्र के बाद ही अपने ब्रह्मचर्य का सत्यानाश करने में प्रवृत्ति होती है। स्वयं माता-पिता ही अपने कन्या-पुत्रों के ब्रह्मचर्य के नाश का बाल-विवाहद्वारा खुल्लमखुल्ला यथेष्ट प्रबन्ध कर रहे हैं। भला ऐसे नादानों से, खुद उन्हीं की नहीं, तो देश के भलाई की आशा कैसे की जा सकती है ? जो प्रकृति के नियमों को पैरों के तले कुचलता है, उसे प्रकृति भी कठोरता से कुचल डालती है। बहुत से विवाहित पुरुषों का ख्याल है कि अपनी धर्मपत्नी के साथ महीने में चाहे जब, हफ्ते में कोई भी दिन और रात में चाहे जितने मरतबे, कितने ही काल तक, विषयोपभोग करना विलकुल शास्त्र-संगत और ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार है; उसमें कुछ भी पाप या अधर्म नहीं है और न उसमें कुछ हानि ही होती है। परन्तु यह ख्याल अत्यन्त गलत और महा नाशकारी है। भाइयो ! जरा प्रकृति की ओर तो देखो ? पशुओं की अपेक्षा मनुष्य कितना बलहीन है ? तथा पशुओं का जननेन्द्रिय सामर्थ्य कितना अल्प व नियमित है ? इस पर से मनुष्यों को, जो कि घोड़ा, बैल, हाथी, सिंहदिकों से कम शारीरिक सामर्थ्य रखता है, कितना अत्यल्प व अत्यन्त नियमित विषय सेवन करना चाहिये, इसका आप ही हिसाव लगाइये ! सच कहा जाय तो मनमाना विषय सेवन करने वाला पशुओं से भी गया बीता है। ऋषियों का सिद्धान्त है कि:—