ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
ऋतावृतौ स्वदारेषु संगतिर्या विधानतः । ब्रह्मचर्यतदेवोक्तं गृहस्थाश्रमवासिनाम् ॥
—श्रीयाक्षवल्क्ष्य
“ऋतुकाल में अपनी स्त्री से ( धर्मपत्नी से ) विधियुक्त अर्थात् शाखाज्ञानुसार केवल सन्तान के हेतु समागम करने वाला पुरुष, गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी, ब्रह्मचारी ही है ।” ‘सन्तानार्थं च मैथुनम्’ यह स्पष्ट व सख शाखाज्ञा है, याद रखो । श्री मनुमहाराज कहते हैं—“मास में ऋतुकाल में केवल दो ही रात्रि में जो धर्म-शाखाज्ञानुसार स्त्री-सेवन करता है वह धर्मात्मा पुरुष स्त्री रहते हुए भी ब्रह्मचारी है ।”
इसमें का “ऋतुकालः” यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । ऋतुकाल का मतलब स्त्री के रजोदर्शन काल का चौथा ही दिन नहीं है उस दिन यदि शिवरात्री एकादशी अथवा नवरात्र आया
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बड़ौदा
( BARODA )