भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

ऋतावृतौ स्वदारेषु संगतिर्या विधानतः । ब्रह्मचर्यतदेवोक्तं गृहस्थाश्रमवासिनाम् ॥

—श्रीयाक्षवल्क्ष्य

“ऋतुकाल में अपनी स्त्री से ( धर्मपत्नी से ) विधियुक्त अर्थात् शाखाज्ञानुसार केवल सन्तान के हेतु समागम करने वाला पुरुष, गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी, ब्रह्मचारी ही है ।” ‘सन्तानार्थं च मैथुनम्’ यह स्पष्ट व सख शाखाज्ञा है, याद रखो । श्री मनुमहाराज कहते हैं—“मास में ऋतुकाल में केवल दो ही रात्रि में जो धर्म-शाखाज्ञानुसार स्त्री-सेवन करता है वह धर्मात्मा पुरुष स्त्री रहते हुए भी ब्रह्मचारी है ।”

इसमें का “ऋतुकालः” यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । ऋतुकाल का मतलब स्त्री के रजोदर्शन काल का चौथा ही दिन नहीं है उस दिन यदि शिवरात्री एकादशी अथवा नवरात्र आया

  • ऋतुकाल का सच्चा अर्थ जानना हो और घर में ‘होरे’ निर्माण करने हों तो लेखक को “मन-यांचिद्धत सन्तति” नामक अत्यन्त महत्व पूर्ण करीब ४०० पृष्ठों को मौलिक किताब जरूर पढ़ो, मनन करो व आचरण में लाओ । इसमें का एक एक नियम लाख लाख रुपयों का है । किताब हृदय में ही रखने योग्य है । एक हजार आर्डर्स आने पर छपवाना शुरू कर देंगे । मूल्य दो रुपया रहेगा । किताब में लगभग सात आठ सुन्दर चित्र भी रहेंगे ।

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मैनेजर, राष्ट्रोद्धार-कार्यालय,

बड़ौदा

( BARODA )

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