भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

❁ गृहस्थी में ब्रह्मचर्य ❁

५३ ]

हो तो ? अथवा घर में ही कोई मर गया तो ? क्या उस दिन कामरिपुचरितार्थ करना ही होगा ? नहीं, कदापि नहीं ! वैसा करना पूर्ण अधर्म व महापाप होगा ।

वस इससे अधिक हम यहाँ पर इस बात का जिक्र नहीं करना चाहते । विप भी यदि डाक्टर की राय से खा ले तो वह भी अमृत के तुल्य फल देता है, वैसे ही अपनी स्त्री का सेवन भी, यदि धर्म-शास्त्रानुसार सुतिथि, सुनक्षत्र का विचार कर, 'प्रमाण' में करे तो वह भी परम कल्याणकारी होता है । 'अ-प्रमाण' में निस्संदेह नाश है । प्रमाण से लेने पर विप भी रोगियों के लिये अमृत बन जाता है । कुसमय पर बीज बोने वाला किसान डूब जाता है । ठीक यही न्याय अपनी स्त्री के सेवन में भी समझ लीजिये । याद रखो, धर्मानुकूल चलने ही से हम, गृहस्थी में भी, ब्रह्मचारी बन सकते हैं और घर में जैसी चाहे वैसी शूर, वीर, श्रेष्ठ पुत्र-पुत्रियाँ उत्पन्न कर सकते हैं । अन्यथा पर-दारा-गमन न करने पर भी, मनुष्य व्यभिचारी पद को प्राप्त होता है और उसकी सब तरह से दुर्गति होती है । प्रमाणः—

धर्माथौ यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानुगः । श्रीप्राणधनदारेभ्योः क्षिप्रं स परिहीयते ॥

• जो धर्मतत्व का परित्याग करके, इन्द्रिय-नश हो स्वेच्छाचार अर्थात् अपनी मनमानी करता है, शीघ्र ही, धन, प्राण, स्त्री, पुत्रादि सभी नष्ट होकर, उसकी महान दुर्गति होती है । और जो धर्मतत्वानुसार चलता है, उसका देखते ही देखते सब तरह से उत्कर्ष होता है और अंत में सद्गति होती है । "तरमात्सर्वप्रयत्नेन

ब्रह्मचर्य ही जीवन है · पृष्ठ 70, कुल 199 में से · BharatKosha