भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

धर्मं शुक्लं च रक्षयेत् !” इसलिये सर्व प्रकार से प्रयत्नपूर्वक धर्म व ब्रह्मचर्य की रक्षा कीजिये । क्योंकि धर्म ही जीवन है और अधर्म ही मृत्यु है ! तथा ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है ।

१५—बाल-विवाह

बाल-विवाह यह अत्यन्त काल-विवाह ही है । यह पूर्णतया ब्रह्मचर्य का नाशक है । बाल विवाह सर्वथा धर्म-विरुद्ध व अप्र-कृतिक है । तथा वेद शास्त्र के अतिकूल ❁ है । प्रकृति के नियमानुसार ही धर्मशास्त्र में नियम है । अतः बालविवाह प्रकृति एवं धर्म के विरुद्ध कैसा है सो अब सुन लीजिए—

( १ ) जो पेड़ जल्दी बढ़ते, जल्दी फूलते-फलते हैं ( जैसे केला, पपीता, रेंड इत्यादि ) वे उतने ही जल्दी नष्ट भी होते हैं । वैसे ही जो बालक बालिकायें जल्दी ब्याही जाती हैं, जल्दी ऋतु मति होती हैं, ( केवल ऋतु प्राप्त होना यही स्त्री की युवावस्था का

  • वेदानधीत्य वेदौ वा वेद वापि यथाक्रमम् ।

अविष्णुतब्रह्मचर्ये गृहस्थाश्रममाश्रयेत् ॥ १ ॥

सबसे श्रेष्ठ स्मृतिकार साक्षात् वेदमूर्ति मनु जी कहते हैं—‘ जब तक लड़का तीन दो वा एक वेद पूर्ण न सीख ले और कम से कम २५ वर्ष तक अर्बुद ब्रह्मचर्य व्रत पालन कर अपने को गृहस्थी चलाने के लिये पूर्ण समर्थ न बना ले तब तक अपनी शादी कदापि न करे । यही वेद की आज्ञा है ।’ स्त्रियों के लिये भी ऐसी ही आज्ञा है । इसके लिये प्रमाण :—

ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ।

अत्ढवाश् ब्रह्मचर्येणाश्रवो वासं जिगीर्वति ॥