भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ बाल-विवाह ❁

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लक्ष्ण नहीं है। दुध-मुँहें दाँत को ईख चूसने के लायक समझना घोर मूर्खता है। ऋतुकाल का सच्चा अर्थ समझो ! कम से कम गर्भाधान के समय स्त्री की आयु १६ वर्ष की होनी चाहिए। और पुरुष की २५ वर्ष की ) और जो जल्दी लड़के, बच्चे वाली होती हैं, वे बहुत जल्द रोगग्रस्त हो मृत्यु को प्राप्त होती हैं। प्रत्यक्ष उनकी ही यह हालत है, तब फिर उनके सन्तान की कौन कहे ? “बाप से बेटे सवाई” जल्दी मरते हैं। तदनन्तर माता-पिता रोते हैं और अपने ही हाथ से अपने कन्या-पुत्रों को चिता पर लिटा कर फूँकते हैं और अपना काला मुँह लेकर घर वापस आते हैं। वाह रे प्रेम !

( २ ) जो पेड़ जल्दी नहीं बढ़ते ( जैसे आम, इमली, अमरुद इत्यादि ) और जल्दी फूलते-फलते नहीं वे जल्दी मरते भी नहीं। वैसे ही जो बालक बालिकायें ज्यादा उम्र में व्याही जाती हैं और गर्भाधान के समय स्त्री की १६ व पुरुष की २५ वर्ष की आयु होती है और जो धर्म-नियमों के अनुसार चलते हैं, वे निस्सन्देह सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं, ऐसा भीष्म-पितामह का सिद्धान्त है। परन्तु अकाल ही में माता-पिता बने हुए अकाल ही में यमपुर सिवारते हैं। “अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुषः।”

—श्रीभीष्म ।

( ३ ) घास की अग्नि जैसी जल्दी बढ़ती है वैसी ही जल्दी बुभुक्षी जाती है और खैर, आम, इमली की अग्नि जल्दी नहीं बढ़ती और इस कारण जल्दी बुभुक्षी भी नहीं। “जो जल्दी बढ़ता है सो जल्दी गिरता भी है” यही प्रकृति का नियम है।

( ४ ) आम को जब बौर आती है तो उसमें से बहुत कुछ नष्ट हो जाती है। फिर छोटे छोटे फल ( अम्बिरियाँ ) लगते हैं उसमें से