भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 199 में से

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भी बहुत नष्ट होते हैं। फिर आविले जैसे बड़े होते हैं तिसमें से भी बहुत कुछ नष्ट होते हैं। जब वे और भी पुष्ट होते हैं तब कहीं वे आखिर तक उस पेड़ पर स्थिर रह सकते हैं। वैसे ही जो बालक-बालिकायें बचपन ही में व्याहे जाते हैं उनमें से बहुत भर जाते हैं, जिसका अनुभव आज प्रत्यक्ष हम आप कर रहे हैं, और जो पचीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन कर गृहस्थाश्रम में विधियुक्त प्रवेश करते हैं वे ही केवल सौ वर्ष तक जीवित रहकर जीवन का पूर्ण आनन्द ल्हटते हैं।

(५) कच्ची कलियाँ तोड़ने से पुष्पों की महक मारी जाती है। उनमें सुगन्धि नहीं मिल सकती। कच्चे फल रस हीन, कसैले और रोगकारी होते हैं। कच्चा भोजन पेट में अनेक रोग पैदा करता है वैसे ही कच्चेपन में विवाह करने और वीर्य को नष्ट करने से अर्थात् अ-पक वीर्य-पात, से नपुंसकता, दुर्बलता, चय, प्रमेहादि भीषण रोग उत्पन्न होते हैं, जो उस व्यक्ति को अकाल ही में मृत्यु की गोद में पहुँचाने में पूर्ण सहायक बनते हैं।

(६) कच्चा बीज कोई भी किसान खेत में नहीं बो सकता क्योंकि उससे खेती का और बीज वाले मालिक दोनों का नाश होता है। किसान लोग खेत में बोने वाले बीज को प्राण के तुल्य सम्भाल कर रखते हैं। यदि कभी भूखे भी रहना पड़े तो भी कुछ परवाह नहीं करते परन्तु उस बीज को अतुल्य (फसल) तक हाथ नहीं लगाते। वैसे ही मनुष्य को भी अपने वीर्यरूपी बीज को २५ वर्ष तक पूरे तौर से संभालना चाहिये और नव-मैथुन से सर्वथा बचा रहना चाहिये। “जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे” यह ध्यान में रखो।

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