ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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( ७ ) कच्चे मुट्ठों में या कच्चे काठ में घुन जल्दी लग जाता है और पक्के में विलकुल नहीं लगता । वैसे ही बचपन में वीर्य को नष्ट करने वाले, जब गाँव में कोई रोग फैलता है तब सब से पहले काल के शिकार बनते हैं; वैसे २५ वर्ष वाले ब्रह्मचारी शिकार नहीं बनते । यथार्थ में ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है ।
( ८ ) मट्टी में कम पका हुआ घड़ा ( सेवर घड़ा ) पानी के संयोग से बहुत जल्दी टूट जाता है, परन्तु पक्का जल्दी नहीं टूटता वैसे ही कच्चे वीर्य का पुरुष स्त्री संयोग से अथवा अनुचित वीर्य-पात से जल्दी ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है ।
प्रकृति के इन आठ प्रमाणों से आपने अब भली भाँति समझ लिया होगा कि “बाल-विवाह प्रत्यक्ष काल-विवाह ही है ।” “विद्यार्थी ब्रह्मचारी स्यात् ।” अर्थात् सच्चा विद्यार्थी वह ही है जो ब्रह्मचारी है । वह किसी बात में असफल नहीं होता क्योंकि उसकी बुद्धि, प्रतिभा, विचार-शक्ति स्मरणशक्ति आदि सभी शक्तियाँ तीव्र होती हैं । वीर्यभ्रष्ट विद्यार्थी ज्ञान-प्राप्ति में पूर्ण असफल सिद्ध होता है । हा ! जिस देश में विद्यार्थी—अवस्था ही में—बचपन ही में—ब्रह्मचर्य का नाश किया जाता है; लड़के को तैरना सीखने के पहले ही जो माता पिता उस बेचारे के गले में स्त्रीरूपी पत्थर बांधकर उसे दुस्तर संसार-सागर में ढकेल देते हैं, उस देश की उन्नति कैसे हो सकती है ?
कन्यां यच्छति वृद्धाय नीचाय धनलिप्सया । कुरुपाय कुशीलाय स प्रेतो जायते नरः ॥ १ ॥