भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

श्री भगवान् स्कन्ध कहते हैं:—“जो पुरुष धन की अथवा दहेज के लालच से अपनी अबोध कन्या किसी वृद्ध को—खूसट वृद्धे को, नीच को दुराचारी व्यभिचारी को कुरूप को अर्थात् अन्धे, लंगड़े, ल्ले, कुबड़े, रोगी, कोढ़ी, अपाहिज—इनमें से किसी को अथवा दुर्गुणी, दुर्न्यसनी को यदि व्याह दें तो वह मरने के बाद नीच पिशाच योनि में वरावर जन्म लेता है और अपने नीच कर्मों के नीच फल भोगता है ।

बाल-विवाह तथा वृद्ध-विवाह आदि दुष्ट-विवाहों की कुप्रथायें उठा देने ही से देश में ब्रह्मचारी बालक-बालिकायें उत्पन्न हो सकती हैं और उनकी वागडोर एक मात्र माता-पिताओं ही के हाथ में है ! अतएव ऐ माता-पिताओं ! अब विवेक से काम लो । लकीर के फकीर मत बनो । धर्म के तथा प्रकृति के नियमानुसार चल कर पुराय के भागी बनो और कुल तथा देश का उद्धार करो ।

१६—वीर्य का प्रचण्ड प्रताप

समुद्रतरणे यवत् उपायो नौः प्रकीर्तिता ।

संसार तरणे तद्वत् ब्रह्मचर्यं प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥

“जैसे समुद्र के पार जाने के लिये नौका ही श्रेष्ठ साधन है वैसे ही इस भव-सागर से पार जाने के लिये अर्थात् सब दुःखों से मुक्त होने के लिये ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट साधन है ।” क्योंकि “ब्रह्मचारी न कांचन आर्तिमाच्छ्रुति ।” अर्थात् “ब्रह्मचर्य ही से सम्पूर्ण सुखों की उत्पत्ति है ।” ऐसी श्रुति है ।

सम्पूर्ण विश्व में प्राणिमात्र में जो कुछ जीवन-कला दिखाई देती