ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
श्री भगवान् स्कन्ध कहते हैं:—“जो पुरुष धन की अथवा दहेज के लालच से अपनी अबोध कन्या किसी वृद्ध को—खूसट वृद्धे को, नीच को दुराचारी व्यभिचारी को कुरूप को अर्थात् अन्धे, लंगड़े, ल्ले, कुबड़े, रोगी, कोढ़ी, अपाहिज—इनमें से किसी को अथवा दुर्गुणी, दुर्न्यसनी को यदि व्याह दें तो वह मरने के बाद नीच पिशाच योनि में वरावर जन्म लेता है और अपने नीच कर्मों के नीच फल भोगता है ।
बाल-विवाह तथा वृद्ध-विवाह आदि दुष्ट-विवाहों की कुप्रथायें उठा देने ही से देश में ब्रह्मचारी बालक-बालिकायें उत्पन्न हो सकती हैं और उनकी वागडोर एक मात्र माता-पिताओं ही के हाथ में है ! अतएव ऐ माता-पिताओं ! अब विवेक से काम लो । लकीर के फकीर मत बनो । धर्म के तथा प्रकृति के नियमानुसार चल कर पुराय के भागी बनो और कुल तथा देश का उद्धार करो ।
१६—वीर्य का प्रचण्ड प्रताप
समुद्रतरणे यवत् उपायो नौः प्रकीर्तिता ।
संसार तरणे तद्वत् ब्रह्मचर्यं प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥
“जैसे समुद्र के पार जाने के लिये नौका ही श्रेष्ठ साधन है वैसे ही इस भव-सागर से पार जाने के लिये अर्थात् सब दुःखों से मुक्त होने के लिये ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट साधन है ।” क्योंकि “ब्रह्मचारी न कांचन आर्तिमाच्छ्रुति ।” अर्थात् “ब्रह्मचर्य ही से सम्पूर्ण सुखों की उत्पत्ति है ।” ऐसी श्रुति है ।
सम्पूर्ण विश्व में प्राणिमात्र में जो कुछ जीवन-कला दिखाई देती
❁ वीर्य का प्रचण्ड प्रताप ❁
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है वह सब ब्रह्मचर्य का ही प्रताप है । जीवनकला में सौन्दर्य, तेज, आनन्द, उत्साह, सामर्थ्य, असामान्यता, मोहकता अर्थात् आकर्षकत्व व सजीवत्व आदि अनेकानेक उच्च बातों का समावेश होता है । जैसे हाथी के पैर में सभी जीवों के पैर समाते हैं; वैसे ही एक ब्रह्मचर्य ही में सब कुछ आ जाता है । “एकहि साधे सब सधे” ऐसा शक्ति-सम्पन्न साधन यदि विश्व में कोई है तो वह एकमात्र ब्रह्मचर्य ही है । अतः प्रयत्नपूर्वक एकमात्र ब्रह्मचर्य ही को सम्हालो । क्योंकि ब्रह्मचर्य ही सन्पूर्ण शक्तियों का खजाना है ।
जो ब्रह्मचारी है उसमें दैवी तेज कूट कूट कर भरा रहता है । आप की आँखों में जो इतनी ज्योति है वह किसका प्रभाव है ? गाल पर गुलाबी छटा, मुख पर कमनीयता, छाती में अकड़, चाल में फौजी ढव आदि यह किसका प्रताप है ? हास में प्रथम नम्बर रहना, खेल में अमग्रण्य रहना, कुशती में किसी से हार न जाना, बड़े भारी बोझ को सहज ही में उठा लेना, हाथ में लिया हुआ काम पूरा करना, एक शब्द ही से दूसरों को वश में कर लेना, बड़ी बड़ी सभाओं में खड़े होते ही, अपनी सुरीली तथा प्रभावशाली आवाज से बड़े बड़े विद्वानों की अच्छी अच्छी युक्तियाँ, अपनी वाक्धारा प्रवाह में बहा देना, अत्यन्त निर्भयता, साहस तथा हृद निश्चय का होना—यह सब किसका प्रताप है ? निश्चय जानिए यह सब केवल ब्रह्मचर्य ही का अद्भुत प्रताप है ! कुमार अवस्था में सम्हल कर चलने के ही ये सब चमत्कार हैं ।
ये तपश्च तपस्यन्ति कौमाराः ब्रह्मचारिणः । विद्यावेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यपि तरन्ति ते ॥ १ ॥
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❧ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❧
“जो कुमार ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यरूपी तपः के तपस्वी हैं और जिन्होंने सुविद्या ( वेद ) से अपने को पवित्र बना लिया है वे ही केवल अद्वुत और कठिन से कठिन कर्मों को कर सकते हैं और इस दुस्तर संसार-सागर से तर सकते हैं।”
ब्रह्मचारी पुरुष सर्वत्र दिग्विजयी होते हैं; उन्हें कभी अपयश नहीं मिलता। सम्पूर्ण अपयश का मूल एक मात्र वीर्यहीनता ही है ! वीर अभिमन्यु का नाश क्यों हुआ ? वह समय में जाने के पहले भारत-वंश विस्तार का “वीज” आरोपण करके गया था। पृथ्वीराज क्यों पकड़ा व मारा गया ? कहते हैं युद्ध में जाते समय उसकी कमर उसकी खी ने कस दी थी ! जो वीर्य को नष्ट करता है, वह हर जगह नष्ट किया जाता है और जो वीर्य को धारता है वही सब जगह विजयी होता है सच्चा ब्रह्मचारी काल का भी काल होता है ! दुश्मन भी उसके सामने कान्तिहीन पड़ जाते हैं। “आत्मिक तेज” जिसको अंग्रेजी में परसनल म्याग्नेटिज्म (Personal Magnetism) अथवा तेजोबल यानी परसनल श्रोरा (Personal Aura) कहते हैं, ब्रह्मचारी में कूट कूट कर भरा रहता है, जिसके प्रताप से लोग उस पर अनायास लट्ट हो जाते हैं। वह जो कुछ कहता है, वही प्रिय व सत्य मालूम देने लगता है। और सब के चित्त में उसके लिये पूज्यभाव पैदा होता है।
एक धनी अच्छे अच्छे कपड़े पहिनता है, चेहरा भी उसका सफेद होता है, पर उसके तरफ देखते ही, हमारा हृदय भी अपराध न करने पर भी, हम में एकाएक उसके लिये तिरस्कार बुद्धि जागृति
❧ ब्रह्मचर्य परंतपः ।” ब्रह्मचर्य ही सब से श्रेष्ठ तपश्चर्या है।
❁ वीर्य का प्रचण्ड प्रताप ❁
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होती है। इसका क्या कारण ? इसका एक मात्र कारण उसकी वीर्यहीनता ही है। दूसरा एक कोई गरीब का नवयुवक सतेज बालक होता है, परन्तु उसे देखते ही मनुष्य के चित्त में उसके लिये एकाएक स्नेहभाव जागृत होता है। यह किसका प्रताप है ? यह सब वीर्यपुष्टता वा ब्रह्मचर्य का ही दिव्य प्रताप है। सारांश शुक्रसंचय ही स्नेह का एकमात्र आदि कारण है यह बात अक्षर अक्षर सत्य है।
स्वामी विवेकानन्द जब शिकागो ( अमेरिका ) की प्रचण्ड विद्वत्सभा में खड़े हुए, तब वहाँ के समस्त विद्वानों को उन्होंने केवल पाँच ही मिनट में कठपुतलियों की तरह मुग्ध कर लिया। उनकी अच्छी अच्छी युक्तियों को अपनी वाक्शक्ति-प्रवाह में, चरण ही में, वहा दिया और लोगों को अपना पूर्ण व स्थायी भक्त बना लिया। यह किसका प्रताप है ? यह केवल ब्रह्मतेज ही का प्रताप है, जो कि एक मात्र ब्रह्मचर्य ही से प्राप्त हो सकता है और अन्य किसी से नहीं। एक विद्वान आता है तीन घंटे व्याख्यान देता है और लोगों को अपनी वाक्सामर्थ्य से हिला छोड़ता है, पर लोग घर पर जाते ही वह सब भूल जाते हैं। ऐसा क्यों ? यह सब वीर्यहीनता के ही बदौलत ! दूसरा एक ऐसा ही मामूली मनुष्य आता है, दो-चार ही शब्द सुनाता है। परन्तु वे ही दो-चार शब्द मनुष्य आखीर दम तक नहीं भूलता। यह किसका प्रताप है ? यह सब आत्मतेज का अर्थात् वीर्यवत्ता का प्रताप है ! वीर्यभ्रष्ट पुरुष कभी आत्मबली नहीं हो सकता और न वह स्थायी प्रभाव ही डाल सकता है, चाहे वह फिर जटा बढ़ाये हो, चाहे मूँड मुँडाये हो अथवा चारों वेदों का ज्ञाता हो ! कहा है :—“एकतश्चतुरो वेदाः ब्रह्मचर्यं तथैकतः ।”
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एक तरफ चारों वेदों का पुराय और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य का पुराय, दोनों में ब्रह्मचर्य ही का पुराय विशेष है ।
ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही श्री भीष्मपितामह के सामने उनके महान प्रतापी गुरु परशुरामजी को हार माननी पड़ी । इतना ही नहीं किन्तु श्रीकृष्ण भगवान् को भी उनके सामने अपना प्रण भूल कर आखीर में मुक ही जाना पड़ा ! अहा ! कहते रोवें खड़े हो जाते हैं ! श्री हनुमान जी ने एक ही घूँसे से इतने बड़े भारी प्रतापी रावण को बेहोश कर दिया और उसके मुख से खून बहाया । एक ही उड़ान में समुद्र को लीघना, बड़े बड़े पर्वतों को सहज ही में उठा ले आना और काल के भी मुंह में थप्पड़ लगाना, यह किस का सामर्थ्य है ? यह सब अखण्ड ब्रह्मचर्य का ही सामर्थ्य है ! ब्रह्मचर्य से मनुष्य में निस्संशय अद्वितीय ब्रह्मतेज प्रकट होता है, जिसके कारण वह बड़े बड़े अद्भुत कार्य बड़ी आसानी से कर दिखा लाता है । आज तक जो कुछ बड़े बड़े धार्मिक व सामाजिक परिवर्तन हुए हैं वे सब ब्रह्मचारियों ही के द्वारा अथवा ब्रह्मचर्य ही के बल पर हुए हैं ।
वीर्यहीनता के कारण आज हम लोगों में अपने पूर्वजों की अद्भुत शक्तियों में भी सन्देह प्राप्त हो रहा है । क्यों न हो ! हमारे ही सौ वर्ष तक जीवित रहने का यदि हमें सन्देह है, तो फिर ईश्वरीय शक्तियों के लिये सन्देह प्राप्त होना स्वाभाविक बात है ! पुष्पक विमान के लिये भी तो हमें पहले ऐसा ही सन्देह था ? परन्तु आज जब ब्रह्म विमानों को देख रहे हैं तब चुप मार कर सिर हिला कर कहने लगे कि ‘होगा भाई, ये लोग यंत्र से चलावे
❁ वीर्य का प्रचण्ड प्रताप ❁
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हैं परन्तु हमारे पूर्वज विमानों को मंत्र से भी चलाते रहे होंगे ! श्री भीष्मपितामह श्रीपरशुरामजी और ययातिपुत्र, इन्होंने अपने पिताओंके लिये और अनेकों ऋषि-कुमारों ने केवल परोपकारार्थ—दूसरों के लिए ब्रह्मचर्य को धारण किया था। परन्तु आज हमारी ऐसी स्थिति हो गई है कि हम खुद अपने ही उपकार के लिये ब्रह्मचर्य को नहीं पाल सकते ! भला इससे बढ़ कर हमारे 'आत्मिक पतन' का और सुस्पष्ट व पुष्ट प्रमाण दूसरा कौन सा हो सकता है। निर्वीर्य पुरुष को सभी बातें असंभव सी जान पड़ती है। फलतः ब्रह्मचारी पुरुष के लिये संसार में तो क्या परन्तु त्रिमुवन में भी कोई बात असंभव व अप्राप्य नहीं है। श्री भगवान् शंकर कहते हैं—
सिद्धे धिन्दौ महायत्ने किंन सिद्धयति भूतले ।
यस्य प्रसादान्महिमा ममाप्ये तादृशो भवेत् ॥ १ ॥
अर्थात्—“महान् परिश्रमपूर्वक विन्दु को साधने वाले अखण्ड ब्रह्मचारी के लिये त्रिमुवन में भी ऐसी कोई वस्तु नहीं है, कि जो असंभव व असाध्य हो। ब्रह्मचर्य के प्रताप से मनुष्य मेरे ही तुल्य अर्थात् ईश्वर तुल्य ही सर्वत्र बन्दनीय व पूजनीय बन जाता है।”
वस हो गया ! इससे बढ़ कर ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णन करना मानवी शक्ति के बाहर है। ब्रह्मचर्य की महिमा अपरंपार है। केवल सच्चे ब्रह्मचारी ही ब्रह्मचर्य की अद्भुत महिमा का अनुभव कर सकते हैं।
अतः भ्रातृ-भगिनी-मित्रगण ! तुम भी ब्रह्मचर्य का शक्तिभर पालन कर उसके प्रचण्ड शक्ति की दिव्य छटा अनुभूत करो। यद्यपि तुम्हारे हाथ से आज तक बहुत कुछ अपराध हुए हैं, तो
❁ अज्ञान का फल मृत्यु है ❁
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“एको ब्रह्म पूर्णं सब जग में, छोड़ कपट की गाँठ गही को ॥ २ ॥
“दुख सुख सो बीती सो बीती, याद न कर ! बरबाद वही को ॥ ३ ॥
“जानकीदास सुमिर श्री रघुवर, गई सो गई, अब राख रही को” ॥ ४ ॥
१७—अज्ञान का फल मृत्यु है
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्मात् विमुच्यते ॥ १ ॥
“मनुष्य अपने ही कर्म करता है, अपने ही उसके भले-बुरे फल भोगता है, अपने ही कर्म से इस काल संसार में चक्कर लगाता है और अपने ही कर्मों से इन सब से मुक्त भी होता है।” सारांश, आत्मघात वा आत्मोद्धार यह सब अपने ही हाथ में हैं।
श्री मनु महाराज कहते हैं:—“किया हुआ कुकर्म वा अधर्म कभी निष्फल नहीं होता—चाहे जंगल में भाग जाय, पर्वत में छिप जाय, आकाश में उड़ जाय, चाहे पातालमें घुस जाय, कहीं भी पाप कर्मों से छुटकारा नहीं होता ? पाप का भूत सिर पर सदा सवार ही रहता है ! अधर्म का फल जल्दी नहीं मिलता, केवल इसी कारण, अज्ञानी वा मोहान्ध लोग पाप से डरते हैं। परन्तु निश्चय जानो कि वह पापाचरण धीरे धीरे तुम्हारे सुखकी जड़ों को बराबर काटता ही चला जा रहा है।”
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
यदि बालक जानते होते कि उनके ही किए हुए कुकर्मों के कारण उनकी ऐसी दुर्दशा हुई है ; उनके कुकर्मों के फल उन्हें को भोगने पड़ते हैं, उस समय दूसरा कोई भी साथी नहीं होता है ; यदि वे जानते होते कि काम से मनुष्य बेकाम बन जाता है और अकाल ही में मर जाता है ; तो वे क्या कभी कुकर्मों में प्रवृत्त होते ? कदापि नहीं ! अज्ञान ही से मनुष्य कुकर्मों में प्रवृत्त होता है और अपना नाश कर लेता है । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अज्ञान ही से मनुष्य गड्ढे में जा गिरता है । जान बूझ कर गड्ढे में कुदड़ पड़ने वाले को एक तो परोपकारी महापुरुष समझना चाहिए या तो स्वार्थान्ध वा मोहान्ध पतित पुरुष समझना चाहिए । भला ऐसे आत्मघाती को कौन तार सकता है ?
यदि कितना ही बढ़िया पंकात्र तुम्हारे सामने रक्खा जाय और तुम्हें यह मालूम हो जाय कि इसमें विष मिलाया हुआ है, तो क्या कभी तुम उस पंकात्र को खाओगे ? हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम उस पंकात्र को कदापि नहीं खाओगे ! बल्कि वहाँ से तत्काल उठ के चले जावोगे । वैसे ही सच्चा आत्मोद्धारक क्षियों के और अन्य मोहक पदार्थों के बाहरी रंग-रूप में कदापि नहीं भूलता; वह फौरन वहाँ से हट जाता है और अपने को बचा लेता है । अज्ञानी व मोहान्ध पुरुष ही उनमें फँसते हैं और दीपलुब्ध पतंग की भाँति जल के खाक हो जाते हैं । अज्ञान ही मृत्यु है और ज्ञान ही जीवन है ! “ज्ञानाग्निःसर्वं कर्माणि भस्मसात् कुर्वतोऽज्जुनं ।” भगवान् कहते हैं :—“ज्ञानाग्नि से मनुष्य के संपूर्ण पाप-कर्म दग्ध हो जाते हैं और शुभ कर्मों से उसका उद्धार होता है ।”
हमें अब पूर्ण विश्वास है कि हमने बालक-बालिकाओं को
❁ अज्ञान का फल मृत्यु है
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उनके माता-पिताओं को, और सम्पूर्ण गुरुजनों को यथेष्टरूपमें सचेत कर दिया है । अब वे इस ग्रन्थ को पढ़ने पर ऐसा कदापि नहीं कह सकते कि 'हमें मालूम नहीं था !'
अब आप लोगो को वीर्य-रक्षा के अनूठे व "स्वानुभूत" नियम बतलाए जाते हैं जिनके द्वारा आप विषयों से निश्चय-पूर्वक बच सकते हैं और ब्रह्मचर्य की भली भाँति रक्षा कर सकते हैं । इन नियमों में के एक एक वाक्य लाख रूप्यों के हैं । इन्हीं नियमों के प्रताप से हम सपत्नी होते हुए भी अखण्ड ब्रह्मचर्य का अभंग पालन कर रहे हैं❁ । फिर जिनके स्त्री नहीं है, वे अपने ब्रह्मचर्य का पालन करने में समर्थ होंगे । इसमें सन्देह ही क्या है ? यदि एक भी पुरुष, बालिका वा बालक इन नियमों के अनुसार चल कर ब्रह्मचर्य द्वारा अपना उद्धार कर ले तो लेखक उस व्यक्ति का बहुत ही उपकृत होगा और अपने को धन्य समझेगा !*
भगवान् आपको सुबुद्धि व आत्मिक बल प्रदान करे !
ॐ ! आपका नम्र सेवक, शिवानन्द
*पर अब ता० २९-१-२९२ई शुक्रवार के दिन हमारी महाभाग्यशालिनी सौ ० सतीपत्नी 'कैलासवासिनी' अर्थात् 'चिर समाधिस्थ' हुई हैं । श्री शिवेच्छा ! ओ३म् !—शिवानन्द ।
सूचना—यदि किसी को ब्रह्मचर्य के विषय में किसी शंका का समाधान कराना हो तो निम्नोक्त पते पर पूछ सकता है । परन्तु उत्तर पाने के लिये टिकिट वा रिप्लाई कार्ड अवश्य भेजना होगा ।
पता:—शिवानन्द C/O, प्रो० माणिकराय, बड़ौदा ।
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१८—वीर्यरत्ना के अनूठे नियम
नियम पहिला—“पवित्र संकल्प !”
वक्तव्य—संकल्प उन विचारों का नाम है, जिनमें पूर्ण विश्वास भरा हो । परमात्मा विश्वास में होता है, यह बात हमें कभी न भूलनी चाहिये । यदि सोते समय मनुष्य ऐसा सोचकर सोवे कि आज “मैं चार वजे उठूँगा” तो निश्चय जानो कि उस मनुष्य की आँखें चार वजे अवश्य खुल जाती हैं । आलस्यवश यदि वह फिर से सो जाय तो दूसरी बात है । सामान्य विचारों में यदि वह शक्ति है, तो श्रद्धा या दृढ़ भावनापूर्ण विचारों से कितनी प्रचण्ड शक्ति होती होगी, इसका आपही अनुमान कर सकते हो ।
एक मनुष्य गर्मी के दिनों में घाम से अत्यन्त व्याकुल हो गया था । दूरी पर उसे एक पेड़ दिखाई दिया । वैसे ही वह भागता हुआ वहाँ गया । पेड़ की शीतल छाया से उसे बहुत ही सुख उपजा । वह था “कल्प वृक्ष” । मनुष्य ने मन में सोचा, यदि यहाँ पीने के लिये ठंडा जल होता तो क्या ही आनन्द होता । ऐसा सोचते ही उसके बगल में सुन्दर शीतल भरना निर्माण हुआ । उस पर दृष्टि जाते ही वह बोल उठा—‘अरे वाह ! यहाँ तो भरना मौजूद है ( थोड़ा पानी पीकर ) अहह ! क्या ही ठण्डा और मीठा जल है ! यदि इस समय पास में कुछ मेवा होता तो क्या ही आनन्द होता !’ ऐसा सोचते ही वहाँ पर तत्काल मेवा से भरे हुए एक सुन्दर पात्र निर्माण हुआ ! उसे देखते ही उसने सोचा, ‘ऐ—यह क्या चमत्कार है ? मालूम होता है यहाँ पर कुछ रौतान का खेल
❁ वॉर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁
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है !’ ऐसा सोचते हों उसे वहाँ पर इधर-उधर चारों ओर नाचने कूदने की डरावनी आवाज सुनाई देने लगी। उसने सोचा ‘सचमुच यहाँ पर स्मशान ही मालूम होता है। कहीं ऐसा न हो कि कोई शैतान मेरे सामने आके खड़ा हो जाय।’ ऐसी शंका करते ही एक महान् विकराल “भूत” उसके सामने आकर खड़ा हुआ और उसकी ओर गुराँते हुये देखने लगा। मनुष्य ने डर के मारे आंखें लगा लीं और मन में कहने लगा ‘अरे वाप ! यह मुझे खाय तो नहीं जायगा !’ ज्योंही उसने ऐसा सोचा त्योंही उस पिशाच ने उसको मुँह में डालकर तत्काल खा लिया।
ठीक यही दशा अच्छे या बुरे विचार करने वालों की भी हुआ करती है। कल्पवृक्ष कहाँ है; यह तो हम नहीं जान सकते, परन्तु ऐसा कोई भी स्थल नहीं है कि जहाँ परमात्मा न हो। वह घट घट में और अणु परमाणु में भरा हुआ है और ईश्वर से बढ़कर दाता कल्पवृक्ष दूसरा कोई भी नहीं हो सकता और आप हम सब उसी की छाया में बैठे हुये हैं। तब ऐसे सर्वत्र व्यापमान कल्पवृक्ष के सामने मनुष्य की सम्पूर्ण भली बुरी कामनायेँ होंगी इसमें सन्देह ही क्या है ! अच्छे विचारों से उसे अवश्य ही मेवा मिलेगा और बुरे विचारों से वह पिशाचों द्वारा अवश्य ही खाया जायगा। सारांश, मनुष्य अपने ही विचारों से नष्ट और श्रेष्ठ बनता है, इसमें कोई भी शक नहीं। चाहे कितने ही गुमरूप से हृदय के भीतर हम कोई कल्पना—फिर कर्म तो दूर रहा—करते हों तो उसे भी परमात्मा देखता है और उसके भले-बुरे फल हमें वरावर देता है। “मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः”—भगवान् का यह अटल सिद्धान्त है। मन ही मनुष्य को गलाम
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
बनाता है। मन ही मनुष्य को स्वर्ग में या नरक में विठा देता है। स्वर्ग या नरक में जाने की कुर्जी भगवान् ने हमारे ही हाथ में दे रखी है ? उसे सीधी या टेढ़ी धुमाना हमारे ही हाथ में है। मनुष्य की सुगति व दुर्गति उसके भले बुरे संकल्पों, विचारों पर ही सर्वथा निर्भर है। पापमय विचारों से वह पापात्मा और पुण्यमयी विचारों से वह निःसन्देह पुण्यात्मा बन जाता है। उच्च व पवित्र विचारों से, कितना ह पवित्र मनुष्य क्यों न हो वह भी उच्चार्ति-उच्च पवित्रात्मा बन सकता है। परन्तु भगवान् कहते हैं “उसके बुद्धि का निश्चय पूरा होना चाहिये।” अर्थात् ऐसा पुरुष फिर पाप कर्म नहीं कर सकता। “विश्वासो फलदायकः।”—यह भगवान् का वचन है। जितना विश्वास अधिक होगा उतना उसका फल भी अधिक होता है। महापुरुषों का विश्वास इतना प्रबल और अनन्य होता है कि वे पानी का घी और वालू को चीनी तक बना सकते हैं। ऐसा ही अनन्य विश्वास हमारा भी होना चाहिये। “संशयात्मा विनश्यति”—संशयी पुरुष का नाश होता है। अतः निःसन्देह भाव से संकल्प करने पर हमारा अवश्य ही उद्धार होगा, इसमें कोई आश्रय नहीं है ! सब पूछिये तो कुकल्पना ही शैतान है। अतः जिसको तरना हो उसे चाहिये कि हठपूर्वक कुबुद्धि को, कुविचारों को, त्याग कर सुबुद्धि को धारण करे और आज ही से, इसी समय से, पवित्र विचारों को शुरू कर दे ! निःसन्देह अपरिमित कल्याण होगा। अतः निद्रा के पूर्व रोज़ पाव घण्टा अवश्य पवित्र संकल्प किया करो। इससे सब कुस्वप्नों का नाश होकर, तुम में एक अद्भुत दैवी शक्ति प्रकट होगी और तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होंगे। “पुरुष प्रयत्नस्य असाध्यं नास्ति”—
❁ वीर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁
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मनुष्य के उचित प्रयत्न करने पर असाध्य कुछ भी नहीं है। आज बीज बोया और कल फल चाहा, ऐसे अधीर मनुष्य को कदापि यश नहीं मिलता। यदि जल्दी फल न मिले तो मन में समझो कि पहले के पाप-संकल्प अधिक हैं; परन्तु वे पुण्य-संकल्पो द्वारा निश्चय ही परास्त होंगे। जब तक हृदय के अपविन्न भाव हट न जायें तब तक हठपूर्वक प्रबल वेग से पुनः पुनः चेष्टा करो। भगवान् कहते हैं कि “तुम्हारी यह चेष्टा कभी निष्फल न होगी; तुम्हारा अवश्य ही उद्धार होगा !” नहि कल्याणकृतं कश्चित् दुर्गातिं तात गच्छति ।”
“ध्वनि वैसी प्रतिध्वनि”—यह भी प्रकृति का एक अटल सिद्धान्त है। यदि हम कुएँ में भाँक कर कहें कि “नाश हो तेरा” तो उधर से भी नाश हो तेरा” ऐसा ही जवाब मिलेगा और यदि “भला हो तेरा” ऐसा कहें तो ऐसा ही उत्तर मिलेगा। अतः जिस प्रकार हम भगवान् की स्तुति प्रार्थना वा संकल्प करेंगे, ठीक वैसे ही भगवान् भी हमें कहेंगे। यदि हम कहेंगे कि “भगवान्” आप वीर्यवान् हो, भाग्यवान् हो, तो भगवान् भी उलट कर हम से यही कहेंगे, कि “आप वीर्यवान् हो, भाग्यवान् हो” इत्यादि। इस पर भी हमारे धर्मशास्त्रों में जो ईश्वर के स्तोत्र और मंत्र नित्य पाठ के लिये रक्खे गये हैं, उनमें हमारे उद्धार का कितना उच्च हेतु भरा हुआ है, यह पूर्णतया सिद्ध होता है। अतः जिस प्रकार हम अपने को बनाना चाहते हैं उसी प्रकार से स्तुति प्रार्थना “निःशंक” भाव से रोज किया करें; बहुत ही उपकार होगा।
तुलसी अपने राम को, रीक्ष भजे चहे खीक्ष।
खेत परे पर जामि है, उलटा सुलटा बीज ॥
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❁ महाचर्य ही जीवन है ❁
इसी प्रकार हमारे कायिक, वाचिक, मानसिक शुभाशुभ कर्मों के फल भी हमें अवश्य ही मिलते हैं । मामूली बीज तो कोई उगते भी नहीं, परन्तु कर्मबीज एक भी उगे बिना नहीं रहता; सभी फलरूप होते हैं । अतः प्रातःकाल उठते ही प्रथम अत्यन्त प्रेम से पकन्दो, चार घड़िया स्तोत्र वा भजन रोज़ कहो और फिर अलग पवित्र आसन पर बैठ कर, अत्यन्त दृढ़ विश्वास से नीचे दिये अनुसार पवित्र व उच्च संकल्प किया करो । देखो, संकल्प ही करते करते तुम में कैसा दैवी तेज प्रवेश करता है ।
“संकल्प-प्रार्थना”
“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्ये कोटि-समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव ! सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ १ ॥
“सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य दृदि संस्थिते ।
स्वर्गाऽपवर्गदे देवि ! नारायणि ! नमोस्तुते ॥ २ ॥
“गुरुर्हा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुचेनमः ॥ ३ ॥
१—मन ही गणेश ( गण-ईश अर्थात् इन्द्रिय समूह को हिलाने वाला स्वामी ) है ।
२—बुद्धि ही सर्वान्तर््याप्त ज्ञानदेवी सुरस्वती हैं ।
३—आत्मा ही परब्रह्म परमात्मा है । और,
४—आत्मा ही सत्वरज-तमात्मक त्रिमूर्ति श्रीदत्तात्रेयस्वरूप सदगुरु है ।
अर्थः—“हे वक्रतुण्ड ( टेढ़ी शृण्ड वाले ) ऽकार ! आप विश्वोदर हो, विश्वव्यापी हो । अनन्त कोटि सूर्यतुल्य आपका प्रकाश है । आपको मेरा बार बार प्रणाम है । हे भगवान् ! मेरे सम्पूर्ण
❁ वीर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁
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विघ्न नष्ट करके मेरे सम्पूर्ण कार्य सदैव सिद्ध करो !” “सम्पूर्ण लोगों के हृदय में बुद्धिरूप से सदा विराजमान रहने वाली और स्वर्ग तथा मोक्ष देने वाली हे परम दयालु माता, देवी नारायणी ! तेरे चरण कमल में मेरा बारबार प्रणाम है !” “आप मुझे सदैव सुखुष्टि दो !” “हे जगद्गुरो ! आप ही ब्रह्म, विष्णु महेश्वर हो; सम्पूर्ण जगत् के प्रेरक तथा चालक हो ! आप ही की आज्ञा से चन्द्र सूर्य प्रकाशित होते हैं। वायु बहता है, मेघ वरसते हैं और सम्पूर्ण चराचर जीव अपना अपना कार्य सुयंत्रित कर रहे हैं। आप साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हो, आप अनाथ के नाथ हो, ठोकर लगने पर भी, सम्हालने वाली भूमि की तरह अनन्त अपराध हाथ से होने पर भी—महान् अपराधी होने पर भी—हमें सम्हालने वाले, हमारे एकमात्र आधार आपही हो, हम आपही के शरण हैं। आप शरणगतवत्सल हो; आप हमें सच्चा सन्मार्ग दिखलाओ और हमारी वाँह पकड़ कर हमें सन्मार्ग से कभी विचलित न होने दो। आपको मेरा सनन्म बारबार प्रणाम है !” ❁
त्राहिमाम् ! त्राहिमाम् !! त्राहिमाम् !!!
“प्रेरक संकल्प” !
१—ईश्वर सर्वत्र व्यापमान है; ईश्वर मेरे भीतर है; मैं ईश्वर हूँ। “अहं ब्रह्मास्मि” यही मेरा सच्चा स्वरूप है। ❁ !
२—ईश्वर सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप व आनन्दस्वरूप है; ईश्वर सच्चिदानन्द है; ईश्वर मेरे भीतर है; मैं भी सच्चिदानन्दरूप हूँ। ❁ !
३—ईश्वर पूर्ण निर्भय, निःसंग व निष्पाप है। मैं भी पूर्ण निर्भय, निःसंग व निष्पाप हूँ। ❁ !
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
४—ईश्वर परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् है। मेरा भी स्वरूप वही है; मैं भी परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् हूँ ! ❁ !
५—ईश्वर पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी है; ईश्वर मुझ में है; मैं भी पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी हूँ । ❁ !
आवश्यक सूचनाः—“मैं” शब्द “ईश्वर” बोधक है, न कि शरीर बोधक। क्योंकि यह साढ़े तीन हाथ का अभिमानी चोला मृत्यु के बाद ज्यों का त्यों पड़ा रहने पर भी “मैं” नहीं कह सकता। अतः “मैं” यह सर्वव्यापी शब्द केवल ईश्वर बोधक ही संममना चाहिये; न कि देह का बोधक ! देहाभिमान से अधःपतन होगा यह बात सदा ध्यान में रखना चाहिये।
६—मैं ईश्वर हूँ, मेरी शक्ति अनन्त है। मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ । ❁ !
७—मैं पुरुष हूँ; प्रकृति मेरी स्त्री है; अतः प्रकृति को मेरी आज्ञा अक्षर अक्षर माननी होगी। ❁ !
८—अय प्रकृति देवि ! मन तथा इन्द्रियों को विषय का स्मरण न करने दो। उन्हें विषय की ओर न जाने दो। उन्हें विषय से पीछे हटाओ ! उन्हें विषय से खूब सम्हालो। हरगिज़ उनका नाश न होने दो। उन्हें विवेक से शान्त व सुखी करो। देखो इस आज्ञा का ठीक ठीक पालन करो। ❁ !
द्वितीय सूचनाः—अब नीचे के संकल्प हृदय की ओर देखते हुये करो; मानां परमात्मा हृदय में ही बैठे हुए हैं और हम “भक्त” भाव से, परमात्मा से बातचीत कर रहे हैं। इन सङ्कल्पों से शरीर
❁ वीर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁
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पर अत्यद्भुत परिणाम होते हुये दिखाई देंगे। रोगी भी निरोग होंगे, कोधी भी शान्त होंगे और कामी भी ब्रह्मचारी होंगे। इस निश्चय को पूर्ण सत्य जानो। परन्तु दृष्टि हृदय पर लगी हुई होनी चाहिये और परमात्मा को हृदयस्थ समक्ष उसे सम्बोधित कर संकल्प करना चाहिये।
९—हे परमात्मन् ! आप प्रेमस्वरूप, शान्तिस्वरूप व क्षमारूप हो। इस दास के नसनस में प्रेम का, शान्ति का तथा क्षमा का सञ्चार हो रहा है। उनकी सनसनाहट का मैं अनुभव कर रहा हूँ। ❁ !
१०—भगवन् ! आप के पास दुःख, रोग, चिन्ता, भीति वारिद्रय कहाँ ? आप सदा सर्वदा सुखी, निरोगी, निश्चिन्त, निर्भय, लक्ष्मीपति हो। सुख, समृद्धि, शान्ति, आरोग्य, निर्भयता, आदि मुझ में संचार कर रहे हैं, ऐसा मेरा हृद विश्वास है। पहले से मैं अधिक आरोग्य हूँ, अधिक निर्भय हूँ, अधिक शान्त हूँ, निर्वाकारी हूँ। ❁ !
११—आज रात्रि में स्वप्न-द्रोप नहीं होगा मैं बहुत जल्द दुःखस्त हूँगा ! भगवन् मुझे सम्हालो ! वीर्य नाश होने के पहले ही मेरी आँखें खोल दो, मुझे जागृत कर दो, अब मैं किसी से नहीं डरूँगा, क्योंकि मेरा रक्षक प्रभु है। ❁ !
१२—वृत्तियाँ अब दिन-वदिन पवित्र हो रही हैं, दृष्टि में प्रत्येक क्षी के लिये मातृभाव समाया है, कानों में ब्रह्मचारियों का यश गूँज रहा है। मैं अब ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा हूँ, मेरा उद्धार हो रहा है। ❁ !
१३—प्रभो, मैं तेरा हूँ और तू मेरा है।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
“अब करुणा कर कोजिए सोई, जा विधि मोर परम हित होई ॥”
आहिमाम् ! आहिमाम् !! आहिमाम् !!!
इस प्रकार रोज़ प्रातःकाल, सायंकाल, और भोजन के समय ऐसे केवल तीन ही बार यदि विश्वास और दृढ़ता के साथ हम संकल्प करेंगे तो अपरन्पार कल्याण होगा। महापुरुष कहते हैं:—
“स यः संकल्पब्रह्मेत्युपास्ते कल्द्वान्चै सः ।
लोकान् धृवान् धृव प्रतिष्ठान् प्रतिष्ठिते ॥१॥
“जो इस संकल्परूपी ब्रह्म की नित्यमति उपासना करता है वह निर्भय होकर इस लोक व परलोक में ईश्वर के तुल्य पूजनीय बन जाता है और उसका सर्वत्र सन्मान होता है।”
“सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्वदुःखमान्नुयात्” ॥१॥
ॐशान्तिःपुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु ।
शुभं भवतु ।
“तथास्तु”
“पवित्र-मातृभाव-दृष्टि”
नियम दूसरा :—
वक्तव्य—वीर्य-रक्षा के लिए हमें हनुमानजी को मुख्य आदर्श मान उनकी तरह प्रत्येक स्त्री की ओर, यदि देखना ही हो तो “मातृवत् परदारेणु” अर्थात् “पर तिथ मात समान” इसी पवित्र
❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁
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दृष्टि से देखना चाहिये। परन्तु किसी स्त्री की ओर आँख उठा कर न देखना ही पवित्र दृष्टि बनाए रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। किसी स्त्री का ध्यान व स्मरण कदापि न करो। स्त्रियों के कोई चित्र किंवा मूर्ति भी कभी न देखो, फिर स्त्रियों की ओर देखना तो दूर रहा ! यदि किसी स्त्री का ध्यान आवे तो तत्काल अपने परमात्मा के फोटो का तथा अपनी माता का ध्यान करने लगे। अपनी मां वा ईश्वर को उस स्त्री में देखने लगे। कोई अंग प्रत्यक्ष स्मरण हो तो “उसी तृण” अपनी माँ के उसी अंग प्रत्यक्ष को उसमें स्थापित करो। निःसन्देह तुम्हें अपनी करनी पर अत्यंत लज्जा व घृणा प्राप्त होगी और तुम उस स्त्री का नाशकारी ध्यान करना ही छोड़ दोगे। यदि कोई स्त्री सामने भी आ जाय तो फौरन अपनी दृष्टि नीची कर लो; दृष्टि ऊपर हरगिज़ न उठाओ, और तत्काल मन में, “भगवन्नाम स्मरण” अथवा “माँ” “माँ” “माँ” “माँ” इस महामन्त्र का निरन्तर जप करने लग जाओ, निस्सन्देह तुम्हारी संपूर्ण पापमय वासनायें दग्ध हो जाँयगी और मन पूर्णतया पवित्र बना रहेगा। मातृनाम पवित्र है, मातृनाम का जप इतना श्रेष्ठ है कि कु-चिन्ता उसके पास आ ही नहीं सकती। अवश्य अनुभव कीजियेगा; परम उद्धार होगा। यदि किसी स्त्रीसे बातचीत करने का प्रसंग ही आवे, तो बहुत कम बातचीत करो और उन्हें “हे वहन, हे माँ” इत्यादि पवित्र नामों से सम्बोधित करो। परन्तु हमेशा दृष्टि को नीची बनाये रखने की बात कभी मत भूलो; इस बात को अपने हृदय पट पर अंकित कर रखो। स्त्री-समाज में आवागमन सहसा न करो। स्त्रियों से एकान्त में बात चीत करना
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❁ प्रत्यक्ष्य ही जीवन है ❁
सर्वथा त्याग दो । क्योंकि वैसा करना स्त्री-पुरुष दोनों के लिये हानिकर व नाशकर है । भरद्वास वामन कहते हैं :—
यदपि मात भगिनी सुता तऊ न घैठे पास । प्रवला हैं ये इन्द्रियाँ करो न तुम विश्वास ॥
श्री लक्ष्मणजी की तरह प्रत्येक स्त्री को स्त्री जगन्मनी जानकीजी का ही रूप समझ कर, मातृभाव से उसे मन ही मन प्रणाम करो और “सिया रामसय रुच जग जानी”—ऐसा पवित्र चिन्तन करने लगे ।
स्त्रियों को “पर नर तात समान” ऐसी शुद्धदृष्टि रखनी चाहिये निस्सन्देह उद्धार होगा । मातृ-चिन्तन या ईश्वर-चिन्तन यह विषयचिन्तन को मिटाने की एक घड़ी ही उत्कृष्ट दवा है । आप भी इसका सेवन कीजिये और अपना उद्धार कर लीजिये । जब तक हमारी दृष्टि वन्द है, हम निद्रित हैं, तब तक वगल में पड़े हुये महा विपथर काले सांप से भी हम नहीं डर सकते; पूर्ण निर्भय बने रहते हैं । परन्तु दृष्टि पड़ते ही उसका कितना भयंकर परिणाम होता है यह तत्काल स्पष्ट दिखाई देता है । वैसे ही जब तक किसी स्त्री की ओर हम पलक उठा के नहीं देखेंगे, उसका मुँह काला है या गौरा है ऐसा नहीं जानेंगे, तब तक यदि प्रत्यक्ष हमारे सामने उर्वशी भी आ के खड़ी क्यों न हो जावे तो वह भी हमें एक रत्नी भर डिगा नहीं सकती; हमारे चित्त को विचलित नहीं कर सकती । परन्तु दृष्टि जाले ही नष्टदृष्टि पतिंगे की तरह, उस मनुष्य के बाहर-भीतर आग लग जाती है । श्रीमान शंकराचार्य कहते हैं—