भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

यदि बालक जानते होते कि उनके ही किए हुए कुकर्मों के कारण उनकी ऐसी दुर्दशा हुई है ; उनके कुकर्मों के फल उन्हें को भोगने पड़ते हैं, उस समय दूसरा कोई भी साथी नहीं होता है ; यदि वे जानते होते कि काम से मनुष्य बेकाम बन जाता है और अकाल ही में मर जाता है ; तो वे क्या कभी कुकर्मों में प्रवृत्त होते ? कदापि नहीं ! अज्ञान ही से मनुष्य कुकर्मों में प्रवृत्त होता है और अपना नाश कर लेता है । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अज्ञान ही से मनुष्य गड्ढे में जा गिरता है । जान बूझ कर गड्ढे में कुदड़ पड़ने वाले को एक तो परोपकारी महापुरुष समझना चाहिए या तो स्वार्थान्ध वा मोहान्ध पतित पुरुष समझना चाहिए । भला ऐसे आत्मघाती को कौन तार सकता है ?

यदि कितना ही बढ़िया पंकात्र तुम्हारे सामने रक्खा जाय और तुम्हें यह मालूम हो जाय कि इसमें विष मिलाया हुआ है, तो क्या कभी तुम उस पंकात्र को खाओगे ? हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम उस पंकात्र को कदापि नहीं खाओगे ! बल्कि वहाँ से तत्काल उठ के चले जावोगे । वैसे ही सच्चा आत्मोद्धारक क्षियों के और अन्य मोहक पदार्थों के बाहरी रंग-रूप में कदापि नहीं भूलता; वह फौरन वहाँ से हट जाता है और अपने को बचा लेता है । अज्ञानी व मोहान्ध पुरुष ही उनमें फँसते हैं और दीपलुब्ध पतंग की भाँति जल के खाक हो जाते हैं । अज्ञान ही मृत्यु है और ज्ञान ही जीवन है ! “ज्ञानाग्निःसर्वं कर्माणि भस्मसात् कुर्वतोऽज्जुनं ।” भगवान् कहते हैं :—“ज्ञानाग्नि से मनुष्य के संपूर्ण पाप-कर्म दग्ध हो जाते हैं और शुभ कर्मों से उसका उद्धार होता है ।”

हमें अब पूर्ण विश्वास है कि हमने बालक-बालिकाओं को