भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ अज्ञान का फल मृत्यु है

[ ६७ ]

उनके माता-पिताओं को, और सम्पूर्ण गुरुजनों को यथेष्टरूपमें सचेत कर दिया है । अब वे इस ग्रन्थ को पढ़ने पर ऐसा कदापि नहीं कह सकते कि 'हमें मालूम नहीं था !'

अब आप लोगो को वीर्य-रक्षा के अनूठे व "स्वानुभूत" नियम बतलाए जाते हैं जिनके द्वारा आप विषयों से निश्चय-पूर्वक बच सकते हैं और ब्रह्मचर्य की भली भाँति रक्षा कर सकते हैं । इन नियमों में के एक एक वाक्य लाख रूप्यों के हैं । इन्हीं नियमों के प्रताप से हम सपत्नी होते हुए भी अखण्ड ब्रह्मचर्य का अभंग पालन कर रहे हैं❁ । फिर जिनके स्त्री नहीं है, वे अपने ब्रह्मचर्य का पालन करने में समर्थ होंगे । इसमें सन्देह ही क्या है ? यदि एक भी पुरुष, बालिका वा बालक इन नियमों के अनुसार चल कर ब्रह्मचर्य द्वारा अपना उद्धार कर ले तो लेखक उस व्यक्ति का बहुत ही उपकृत होगा और अपने को धन्य समझेगा !*

भगवान् आपको सुबुद्धि व आत्मिक बल प्रदान करे !

ॐ ! आपका नम्र सेवक, शिवानन्द


*पर अब ता० २९-१-२९२ई शुक्रवार के दिन हमारी महाभाग्यशालिनी सौ ० सतीपत्नी 'कैलासवासिनी' अर्थात् 'चिर समाधिस्थ' हुई हैं । श्री शिवेच्छा ! ओ३म् !—शिवानन्द ।

सूचना—यदि किसी को ब्रह्मचर्य के विषय में किसी शंका का समाधान कराना हो तो निम्नोक्त पते पर पूछ सकता है । परन्तु उत्तर पाने के लिये टिकिट वा रिप्लाई कार्ड अवश्य भेजना होगा ।

पता:—शिवानन्द C/O, प्रो० माणिकराय, बड़ौदा ।