भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 199 में से

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१८—वीर्यरत्ना के अनूठे नियम

नियम पहिला—“पवित्र संकल्प !”

वक्तव्य—संकल्प उन विचारों का नाम है, जिनमें पूर्ण विश्वास भरा हो । परमात्मा विश्वास में होता है, यह बात हमें कभी न भूलनी चाहिये । यदि सोते समय मनुष्य ऐसा सोचकर सोवे कि आज “मैं चार वजे उठूँगा” तो निश्चय जानो कि उस मनुष्य की आँखें चार वजे अवश्य खुल जाती हैं । आलस्यवश यदि वह फिर से सो जाय तो दूसरी बात है । सामान्य विचारों में यदि वह शक्ति है, तो श्रद्धा या दृढ़ भावनापूर्ण विचारों से कितनी प्रचण्ड शक्ति होती होगी, इसका आपही अनुमान कर सकते हो ।

एक मनुष्य गर्मी के दिनों में घाम से अत्यन्त व्याकुल हो गया था । दूरी पर उसे एक पेड़ दिखाई दिया । वैसे ही वह भागता हुआ वहाँ गया । पेड़ की शीतल छाया से उसे बहुत ही सुख उपजा । वह था “कल्प वृक्ष” । मनुष्य ने मन में सोचा, यदि यहाँ पीने के लिये ठंडा जल होता तो क्या ही आनन्द होता । ऐसा सोचते ही उसके बगल में सुन्दर शीतल भरना निर्माण हुआ । उस पर दृष्टि जाते ही वह बोल उठा—‘अरे वाह ! यहाँ तो भरना मौजूद है ( थोड़ा पानी पीकर ) अहह ! क्या ही ठण्डा और मीठा जल है ! यदि इस समय पास में कुछ मेवा होता तो क्या ही आनन्द होता !’ ऐसा सोचते ही वहाँ पर तत्काल मेवा से भरे हुए एक सुन्दर पात्र निर्माण हुआ ! उसे देखते ही उसने सोचा, ‘ऐ—यह क्या चमत्कार है ? मालूम होता है यहाँ पर कुछ रौतान का खेल