ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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१८—वीर्यरत्ना के अनूठे नियम
नियम पहिला—“पवित्र संकल्प !”
वक्तव्य—संकल्प उन विचारों का नाम है, जिनमें पूर्ण विश्वास भरा हो । परमात्मा विश्वास में होता है, यह बात हमें कभी न भूलनी चाहिये । यदि सोते समय मनुष्य ऐसा सोचकर सोवे कि आज “मैं चार वजे उठूँगा” तो निश्चय जानो कि उस मनुष्य की आँखें चार वजे अवश्य खुल जाती हैं । आलस्यवश यदि वह फिर से सो जाय तो दूसरी बात है । सामान्य विचारों में यदि वह शक्ति है, तो श्रद्धा या दृढ़ भावनापूर्ण विचारों से कितनी प्रचण्ड शक्ति होती होगी, इसका आपही अनुमान कर सकते हो ।
एक मनुष्य गर्मी के दिनों में घाम से अत्यन्त व्याकुल हो गया था । दूरी पर उसे एक पेड़ दिखाई दिया । वैसे ही वह भागता हुआ वहाँ गया । पेड़ की शीतल छाया से उसे बहुत ही सुख उपजा । वह था “कल्प वृक्ष” । मनुष्य ने मन में सोचा, यदि यहाँ पीने के लिये ठंडा जल होता तो क्या ही आनन्द होता । ऐसा सोचते ही उसके बगल में सुन्दर शीतल भरना निर्माण हुआ । उस पर दृष्टि जाते ही वह बोल उठा—‘अरे वाह ! यहाँ तो भरना मौजूद है ( थोड़ा पानी पीकर ) अहह ! क्या ही ठण्डा और मीठा जल है ! यदि इस समय पास में कुछ मेवा होता तो क्या ही आनन्द होता !’ ऐसा सोचते ही वहाँ पर तत्काल मेवा से भरे हुए एक सुन्दर पात्र निर्माण हुआ ! उसे देखते ही उसने सोचा, ‘ऐ—यह क्या चमत्कार है ? मालूम होता है यहाँ पर कुछ रौतान का खेल
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है !’ ऐसा सोचते हों उसे वहाँ पर इधर-उधर चारों ओर नाचने कूदने की डरावनी आवाज सुनाई देने लगी। उसने सोचा ‘सचमुच यहाँ पर स्मशान ही मालूम होता है। कहीं ऐसा न हो कि कोई शैतान मेरे सामने आके खड़ा हो जाय।’ ऐसी शंका करते ही एक महान् विकराल “भूत” उसके सामने आकर खड़ा हुआ और उसकी ओर गुराँते हुये देखने लगा। मनुष्य ने डर के मारे आंखें लगा लीं और मन में कहने लगा ‘अरे वाप ! यह मुझे खाय तो नहीं जायगा !’ ज्योंही उसने ऐसा सोचा त्योंही उस पिशाच ने उसको मुँह में डालकर तत्काल खा लिया।
ठीक यही दशा अच्छे या बुरे विचार करने वालों की भी हुआ करती है। कल्पवृक्ष कहाँ है; यह तो हम नहीं जान सकते, परन्तु ऐसा कोई भी स्थल नहीं है कि जहाँ परमात्मा न हो। वह घट घट में और अणु परमाणु में भरा हुआ है और ईश्वर से बढ़कर दाता कल्पवृक्ष दूसरा कोई भी नहीं हो सकता और आप हम सब उसी की छाया में बैठे हुये हैं। तब ऐसे सर्वत्र व्यापमान कल्पवृक्ष के सामने मनुष्य की सम्पूर्ण भली बुरी कामनायेँ होंगी इसमें सन्देह ही क्या है ! अच्छे विचारों से उसे अवश्य ही मेवा मिलेगा और बुरे विचारों से वह पिशाचों द्वारा अवश्य ही खाया जायगा। सारांश, मनुष्य अपने ही विचारों से नष्ट और श्रेष्ठ बनता है, इसमें कोई भी शक नहीं। चाहे कितने ही गुमरूप से हृदय के भीतर हम कोई कल्पना—फिर कर्म तो दूर रहा—करते हों तो उसे भी परमात्मा देखता है और उसके भले-बुरे फल हमें वरावर देता है। “मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः”—भगवान् का यह अटल सिद्धान्त है। मन ही मनुष्य को गलाम
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बनाता है। मन ही मनुष्य को स्वर्ग में या नरक में विठा देता है। स्वर्ग या नरक में जाने की कुर्जी भगवान् ने हमारे ही हाथ में दे रखी है ? उसे सीधी या टेढ़ी धुमाना हमारे ही हाथ में है। मनुष्य की सुगति व दुर्गति उसके भले बुरे संकल्पों, विचारों पर ही सर्वथा निर्भर है। पापमय विचारों से वह पापात्मा और पुण्यमयी विचारों से वह निःसन्देह पुण्यात्मा बन जाता है। उच्च व पवित्र विचारों से, कितना ह पवित्र मनुष्य क्यों न हो वह भी उच्चार्ति-उच्च पवित्रात्मा बन सकता है। परन्तु भगवान् कहते हैं “उसके बुद्धि का निश्चय पूरा होना चाहिये।” अर्थात् ऐसा पुरुष फिर पाप कर्म नहीं कर सकता। “विश्वासो फलदायकः।”—यह भगवान् का वचन है। जितना विश्वास अधिक होगा उतना उसका फल भी अधिक होता है। महापुरुषों का विश्वास इतना प्रबल और अनन्य होता है कि वे पानी का घी और वालू को चीनी तक बना सकते हैं। ऐसा ही अनन्य विश्वास हमारा भी होना चाहिये। “संशयात्मा विनश्यति”—संशयी पुरुष का नाश होता है। अतः निःसन्देह भाव से संकल्प करने पर हमारा अवश्य ही उद्धार होगा, इसमें कोई आश्रय नहीं है ! सब पूछिये तो कुकल्पना ही शैतान है। अतः जिसको तरना हो उसे चाहिये कि हठपूर्वक कुबुद्धि को, कुविचारों को, त्याग कर सुबुद्धि को धारण करे और आज ही से, इसी समय से, पवित्र विचारों को शुरू कर दे ! निःसन्देह अपरिमित कल्याण होगा। अतः निद्रा के पूर्व रोज़ पाव घण्टा अवश्य पवित्र संकल्प किया करो। इससे सब कुस्वप्नों का नाश होकर, तुम में एक अद्भुत दैवी शक्ति प्रकट होगी और तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होंगे। “पुरुष प्रयत्नस्य असाध्यं नास्ति”—
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मनुष्य के उचित प्रयत्न करने पर असाध्य कुछ भी नहीं है। आज बीज बोया और कल फल चाहा, ऐसे अधीर मनुष्य को कदापि यश नहीं मिलता। यदि जल्दी फल न मिले तो मन में समझो कि पहले के पाप-संकल्प अधिक हैं; परन्तु वे पुण्य-संकल्पो द्वारा निश्चय ही परास्त होंगे। जब तक हृदय के अपविन्न भाव हट न जायें तब तक हठपूर्वक प्रबल वेग से पुनः पुनः चेष्टा करो। भगवान् कहते हैं कि “तुम्हारी यह चेष्टा कभी निष्फल न होगी; तुम्हारा अवश्य ही उद्धार होगा !” नहि कल्याणकृतं कश्चित् दुर्गातिं तात गच्छति ।”
“ध्वनि वैसी प्रतिध्वनि”—यह भी प्रकृति का एक अटल सिद्धान्त है। यदि हम कुएँ में भाँक कर कहें कि “नाश हो तेरा” तो उधर से भी नाश हो तेरा” ऐसा ही जवाब मिलेगा और यदि “भला हो तेरा” ऐसा कहें तो ऐसा ही उत्तर मिलेगा। अतः जिस प्रकार हम भगवान् की स्तुति प्रार्थना वा संकल्प करेंगे, ठीक वैसे ही भगवान् भी हमें कहेंगे। यदि हम कहेंगे कि “भगवान्” आप वीर्यवान् हो, भाग्यवान् हो, तो भगवान् भी उलट कर हम से यही कहेंगे, कि “आप वीर्यवान् हो, भाग्यवान् हो” इत्यादि। इस पर भी हमारे धर्मशास्त्रों में जो ईश्वर के स्तोत्र और मंत्र नित्य पाठ के लिये रक्खे गये हैं, उनमें हमारे उद्धार का कितना उच्च हेतु भरा हुआ है, यह पूर्णतया सिद्ध होता है। अतः जिस प्रकार हम अपने को बनाना चाहते हैं उसी प्रकार से स्तुति प्रार्थना “निःशंक” भाव से रोज किया करें; बहुत ही उपकार होगा।
तुलसी अपने राम को, रीक्ष भजे चहे खीक्ष।
खेत परे पर जामि है, उलटा सुलटा बीज ॥
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इसी प्रकार हमारे कायिक, वाचिक, मानसिक शुभाशुभ कर्मों के फल भी हमें अवश्य ही मिलते हैं । मामूली बीज तो कोई उगते भी नहीं, परन्तु कर्मबीज एक भी उगे बिना नहीं रहता; सभी फलरूप होते हैं । अतः प्रातःकाल उठते ही प्रथम अत्यन्त प्रेम से पकन्दो, चार घड़िया स्तोत्र वा भजन रोज़ कहो और फिर अलग पवित्र आसन पर बैठ कर, अत्यन्त दृढ़ विश्वास से नीचे दिये अनुसार पवित्र व उच्च संकल्प किया करो । देखो, संकल्प ही करते करते तुम में कैसा दैवी तेज प्रवेश करता है ।
“संकल्प-प्रार्थना”
“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्ये कोटि-समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव ! सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ १ ॥
“सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य दृदि संस्थिते ।
स्वर्गाऽपवर्गदे देवि ! नारायणि ! नमोस्तुते ॥ २ ॥
“गुरुर्हा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुचेनमः ॥ ३ ॥
१—मन ही गणेश ( गण-ईश अर्थात् इन्द्रिय समूह को हिलाने वाला स्वामी ) है ।
२—बुद्धि ही सर्वान्तर््याप्त ज्ञानदेवी सुरस्वती हैं ।
३—आत्मा ही परब्रह्म परमात्मा है । और,
४—आत्मा ही सत्वरज-तमात्मक त्रिमूर्ति श्रीदत्तात्रेयस्वरूप सदगुरु है ।
अर्थः—“हे वक्रतुण्ड ( टेढ़ी शृण्ड वाले ) ऽकार ! आप विश्वोदर हो, विश्वव्यापी हो । अनन्त कोटि सूर्यतुल्य आपका प्रकाश है । आपको मेरा बार बार प्रणाम है । हे भगवान् ! मेरे सम्पूर्ण
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विघ्न नष्ट करके मेरे सम्पूर्ण कार्य सदैव सिद्ध करो !” “सम्पूर्ण लोगों के हृदय में बुद्धिरूप से सदा विराजमान रहने वाली और स्वर्ग तथा मोक्ष देने वाली हे परम दयालु माता, देवी नारायणी ! तेरे चरण कमल में मेरा बारबार प्रणाम है !” “आप मुझे सदैव सुखुष्टि दो !” “हे जगद्गुरो ! आप ही ब्रह्म, विष्णु महेश्वर हो; सम्पूर्ण जगत् के प्रेरक तथा चालक हो ! आप ही की आज्ञा से चन्द्र सूर्य प्रकाशित होते हैं। वायु बहता है, मेघ वरसते हैं और सम्पूर्ण चराचर जीव अपना अपना कार्य सुयंत्रित कर रहे हैं। आप साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हो, आप अनाथ के नाथ हो, ठोकर लगने पर भी, सम्हालने वाली भूमि की तरह अनन्त अपराध हाथ से होने पर भी—महान् अपराधी होने पर भी—हमें सम्हालने वाले, हमारे एकमात्र आधार आपही हो, हम आपही के शरण हैं। आप शरणगतवत्सल हो; आप हमें सच्चा सन्मार्ग दिखलाओ और हमारी वाँह पकड़ कर हमें सन्मार्ग से कभी विचलित न होने दो। आपको मेरा सनन्म बारबार प्रणाम है !” ❁
त्राहिमाम् ! त्राहिमाम् !! त्राहिमाम् !!!
“प्रेरक संकल्प” !
१—ईश्वर सर्वत्र व्यापमान है; ईश्वर मेरे भीतर है; मैं ईश्वर हूँ। “अहं ब्रह्मास्मि” यही मेरा सच्चा स्वरूप है। ❁ !
२—ईश्वर सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप व आनन्दस्वरूप है; ईश्वर सच्चिदानन्द है; ईश्वर मेरे भीतर है; मैं भी सच्चिदानन्दरूप हूँ। ❁ !
३—ईश्वर पूर्ण निर्भय, निःसंग व निष्पाप है। मैं भी पूर्ण निर्भय, निःसंग व निष्पाप हूँ। ❁ !
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४—ईश्वर परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् है। मेरा भी स्वरूप वही है; मैं भी परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् हूँ ! ❁ !
५—ईश्वर पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी है; ईश्वर मुझ में है; मैं भी पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी हूँ । ❁ !
आवश्यक सूचनाः—“मैं” शब्द “ईश्वर” बोधक है, न कि शरीर बोधक। क्योंकि यह साढ़े तीन हाथ का अभिमानी चोला मृत्यु के बाद ज्यों का त्यों पड़ा रहने पर भी “मैं” नहीं कह सकता। अतः “मैं” यह सर्वव्यापी शब्द केवल ईश्वर बोधक ही संममना चाहिये; न कि देह का बोधक ! देहाभिमान से अधःपतन होगा यह बात सदा ध्यान में रखना चाहिये।
६—मैं ईश्वर हूँ, मेरी शक्ति अनन्त है। मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ । ❁ !
७—मैं पुरुष हूँ; प्रकृति मेरी स्त्री है; अतः प्रकृति को मेरी आज्ञा अक्षर अक्षर माननी होगी। ❁ !
८—अय प्रकृति देवि ! मन तथा इन्द्रियों को विषय का स्मरण न करने दो। उन्हें विषय की ओर न जाने दो। उन्हें विषय से पीछे हटाओ ! उन्हें विषय से खूब सम्हालो। हरगिज़ उनका नाश न होने दो। उन्हें विवेक से शान्त व सुखी करो। देखो इस आज्ञा का ठीक ठीक पालन करो। ❁ !
द्वितीय सूचनाः—अब नीचे के संकल्प हृदय की ओर देखते हुये करो; मानां परमात्मा हृदय में ही बैठे हुए हैं और हम “भक्त” भाव से, परमात्मा से बातचीत कर रहे हैं। इन सङ्कल्पों से शरीर
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पर अत्यद्भुत परिणाम होते हुये दिखाई देंगे। रोगी भी निरोग होंगे, कोधी भी शान्त होंगे और कामी भी ब्रह्मचारी होंगे। इस निश्चय को पूर्ण सत्य जानो। परन्तु दृष्टि हृदय पर लगी हुई होनी चाहिये और परमात्मा को हृदयस्थ समक्ष उसे सम्बोधित कर संकल्प करना चाहिये।
९—हे परमात्मन् ! आप प्रेमस्वरूप, शान्तिस्वरूप व क्षमारूप हो। इस दास के नसनस में प्रेम का, शान्ति का तथा क्षमा का सञ्चार हो रहा है। उनकी सनसनाहट का मैं अनुभव कर रहा हूँ। ❁ !
१०—भगवन् ! आप के पास दुःख, रोग, चिन्ता, भीति वारिद्रय कहाँ ? आप सदा सर्वदा सुखी, निरोगी, निश्चिन्त, निर्भय, लक्ष्मीपति हो। सुख, समृद्धि, शान्ति, आरोग्य, निर्भयता, आदि मुझ में संचार कर रहे हैं, ऐसा मेरा हृद विश्वास है। पहले से मैं अधिक आरोग्य हूँ, अधिक निर्भय हूँ, अधिक शान्त हूँ, निर्वाकारी हूँ। ❁ !
११—आज रात्रि में स्वप्न-द्रोप नहीं होगा मैं बहुत जल्द दुःखस्त हूँगा ! भगवन् मुझे सम्हालो ! वीर्य नाश होने के पहले ही मेरी आँखें खोल दो, मुझे जागृत कर दो, अब मैं किसी से नहीं डरूँगा, क्योंकि मेरा रक्षक प्रभु है। ❁ !
१२—वृत्तियाँ अब दिन-वदिन पवित्र हो रही हैं, दृष्टि में प्रत्येक क्षी के लिये मातृभाव समाया है, कानों में ब्रह्मचारियों का यश गूँज रहा है। मैं अब ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा हूँ, मेरा उद्धार हो रहा है। ❁ !
१३—प्रभो, मैं तेरा हूँ और तू मेरा है।
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“अब करुणा कर कोजिए सोई, जा विधि मोर परम हित होई ॥”
आहिमाम् ! आहिमाम् !! आहिमाम् !!!
इस प्रकार रोज़ प्रातःकाल, सायंकाल, और भोजन के समय ऐसे केवल तीन ही बार यदि विश्वास और दृढ़ता के साथ हम संकल्प करेंगे तो अपरन्पार कल्याण होगा। महापुरुष कहते हैं:—
“स यः संकल्पब्रह्मेत्युपास्ते कल्द्वान्चै सः ।
लोकान् धृवान् धृव प्रतिष्ठान् प्रतिष्ठिते ॥१॥
“जो इस संकल्परूपी ब्रह्म की नित्यमति उपासना करता है वह निर्भय होकर इस लोक व परलोक में ईश्वर के तुल्य पूजनीय बन जाता है और उसका सर्वत्र सन्मान होता है।”
“सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्वदुःखमान्नुयात्” ॥१॥
ॐशान्तिःपुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु ।
शुभं भवतु ।
“तथास्तु”
“पवित्र-मातृभाव-दृष्टि”
नियम दूसरा :—
वक्तव्य—वीर्य-रक्षा के लिए हमें हनुमानजी को मुख्य आदर्श मान उनकी तरह प्रत्येक स्त्री की ओर, यदि देखना ही हो तो “मातृवत् परदारेणु” अर्थात् “पर तिथ मात समान” इसी पवित्र
❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁
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दृष्टि से देखना चाहिये। परन्तु किसी स्त्री की ओर आँख उठा कर न देखना ही पवित्र दृष्टि बनाए रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। किसी स्त्री का ध्यान व स्मरण कदापि न करो। स्त्रियों के कोई चित्र किंवा मूर्ति भी कभी न देखो, फिर स्त्रियों की ओर देखना तो दूर रहा ! यदि किसी स्त्री का ध्यान आवे तो तत्काल अपने परमात्मा के फोटो का तथा अपनी माता का ध्यान करने लगे। अपनी मां वा ईश्वर को उस स्त्री में देखने लगे। कोई अंग प्रत्यक्ष स्मरण हो तो “उसी तृण” अपनी माँ के उसी अंग प्रत्यक्ष को उसमें स्थापित करो। निःसन्देह तुम्हें अपनी करनी पर अत्यंत लज्जा व घृणा प्राप्त होगी और तुम उस स्त्री का नाशकारी ध्यान करना ही छोड़ दोगे। यदि कोई स्त्री सामने भी आ जाय तो फौरन अपनी दृष्टि नीची कर लो; दृष्टि ऊपर हरगिज़ न उठाओ, और तत्काल मन में, “भगवन्नाम स्मरण” अथवा “माँ” “माँ” “माँ” “माँ” इस महामन्त्र का निरन्तर जप करने लग जाओ, निस्सन्देह तुम्हारी संपूर्ण पापमय वासनायें दग्ध हो जाँयगी और मन पूर्णतया पवित्र बना रहेगा। मातृनाम पवित्र है, मातृनाम का जप इतना श्रेष्ठ है कि कु-चिन्ता उसके पास आ ही नहीं सकती। अवश्य अनुभव कीजियेगा; परम उद्धार होगा। यदि किसी स्त्रीसे बातचीत करने का प्रसंग ही आवे, तो बहुत कम बातचीत करो और उन्हें “हे वहन, हे माँ” इत्यादि पवित्र नामों से सम्बोधित करो। परन्तु हमेशा दृष्टि को नीची बनाये रखने की बात कभी मत भूलो; इस बात को अपने हृदय पट पर अंकित कर रखो। स्त्री-समाज में आवागमन सहसा न करो। स्त्रियों से एकान्त में बात चीत करना
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❁ प्रत्यक्ष्य ही जीवन है ❁
सर्वथा त्याग दो । क्योंकि वैसा करना स्त्री-पुरुष दोनों के लिये हानिकर व नाशकर है । भरद्वास वामन कहते हैं :—
यदपि मात भगिनी सुता तऊ न घैठे पास । प्रवला हैं ये इन्द्रियाँ करो न तुम विश्वास ॥
श्री लक्ष्मणजी की तरह प्रत्येक स्त्री को स्त्री जगन्मनी जानकीजी का ही रूप समझ कर, मातृभाव से उसे मन ही मन प्रणाम करो और “सिया रामसय रुच जग जानी”—ऐसा पवित्र चिन्तन करने लगे ।
स्त्रियों को “पर नर तात समान” ऐसी शुद्धदृष्टि रखनी चाहिये निस्सन्देह उद्धार होगा । मातृ-चिन्तन या ईश्वर-चिन्तन यह विषयचिन्तन को मिटाने की एक घड़ी ही उत्कृष्ट दवा है । आप भी इसका सेवन कीजिये और अपना उद्धार कर लीजिये । जब तक हमारी दृष्टि वन्द है, हम निद्रित हैं, तब तक वगल में पड़े हुये महा विपथर काले सांप से भी हम नहीं डर सकते; पूर्ण निर्भय बने रहते हैं । परन्तु दृष्टि पड़ते ही उसका कितना भयंकर परिणाम होता है यह तत्काल स्पष्ट दिखाई देता है । वैसे ही जब तक किसी स्त्री की ओर हम पलक उठा के नहीं देखेंगे, उसका मुँह काला है या गौरा है ऐसा नहीं जानेंगे, तब तक यदि प्रत्यक्ष हमारे सामने उर्वशी भी आ के खड़ी क्यों न हो जावे तो वह भी हमें एक रत्नी भर डिगा नहीं सकती; हमारे चित्त को विचलित नहीं कर सकती । परन्तु दृष्टि जाले ही नष्टदृष्टि पतिंगे की तरह, उस मनुष्य के बाहर-भीतर आग लग जाती है । श्रीमान शंकराचार्य कहते हैं—
❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁
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दोषेण तीव्रो विषयः कृष्ण सर्प विषादपि । विषं निहन्ति भोक्त्वा दृष्ट्वा चक्षुषाप्यहम् ॥ १ ॥ —विवेक चूडामणि ।
अर्थात्:—काले सांप के विष से भी बढ़कर विषय-जन्य विष अत्यन्त भयानक है। विष तो पी लेने पर मनुष्य मरता है परन्तु यह विषय-विष इतना उग्र है कि केवल उसकी ओर देखने मात्र ही से मनुष्य थूल में मिल जाता है ! भक्तदास वासन ने क्या ही ठीक कहा है कि:—
अहि विष तो काटे चढ़े, यह हगवत चढ़ि जाय ।
ज्ञान, ध्यान, बल, धर्म, को प्राण सहित खा जाय ॥ १ ॥
“खी के सारे शरीर में जहर भरा हुआ है” ऐसा कहने की जगह यदि यों कहा जाय कि “सब विष दृष्टि ही में भरा हुआ है” तो बहुत ही यथार्थ होगा। सारा संसार आपको यदि करटक-मय ही मालूम होता हो तो स्वयं अपने पैर में जूता डालकर बाहर निकलना ही आपकी बुद्धिमानी होगी। शिकायत करना निरी मूर्खता है। क्योंकि आप समस्त संसार को निष्कंटक तो नहीं बना सकते हो और न उसे चमड़े से ही ढांप सकते हैं ? उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत को आप नारी-रहित तो बना नहीं सकते हो। हां, अपनी ही पापमय दृष्टि को आप अवश्य पवित्र बना सकते हो। इसी में आपकी बुद्धिमानी है और सद्गति है। खी जाति पर व्यर्थ कुत्सित कटाक्ष करना निरी मूर्खता है। अतः दृष्टि को नीची रखने ही से हम विषय के हल्लाहल विष से बच सकते हैं। जब तक हम अपनी दृष्टि उठा कर किसी खी पर नहीं डालेंगे तब तक हमारा ब्रह्मचर्य निःसन्देह अटूट बना
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
रहता है, यह अनुभवसिद्ध बात है। आप भी इसका अवश्य अनुभव कीजिये, निस्सीम कल्याण होगा।
एक बार शेष जी बीमार पड़े। बहुत दवा की परन्तु आराम नहीं हुआ। अन्त में धन्वन्तरी ने शेष जी की आँखें वाँधीं और फिर दवा दी। तब बहुत जल्द ठीक हो गये। मित्रों ! शेष जी के नेत्र क्यों बांधे गये, जानते हो ? सुनो, जब तक शेष जी के नेत्र खुले थे तब तक उनके नेत्रों से निकलने वाली विषमयी ज्वालाओं से सब औषधि विलकुल विष बन जाती थी; अमृतवल्ली भी विषवल्ली बन जाती थी। नेत्र जब बांधे गये तभी दवा दवा बनी रही और वे चंगे हो गये। इसी प्रकार जब तक हम अपनी विषयपूर्ण पापी दृष्टि को बन्द अर्थात् नीची नहीं करेंगे तब तक सात जन्म में हमारा सुधार नहीं हो सकता। अतः चंचल चिन्त वालों को पर-खी की ओर देखना एकदम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग ही देना चाहिये। जो गण करके इसके अनुसार चलेगा, उसको अवश्य ही मेवा मिलेगा। उसका अवश्य ही उद्धार होगा और जो मोह वश पर-खी की तरफ़ ताकेगा उसको उसका ही निर्मित पाप-रूपी पिशाच अवश्य ही खा डालेगा। विषयी दृष्टि को बन्द करने से—किसी खी की ओर विलकुल न ताकने से—पापी से पापी मनुष्य भी बहुत जल्द सुधार सकता है। नीची अर्थात् नम्र दृष्टि ही से मनुष्य ऊँचा से ऊँचा बन सकता है। जो गीध या ऊँट की तरह किसी खी की ओर गर्दन उठा के वा घुमा के ताकेगा वह फौरन नरककुंड में जा गिरेगा। नीच पुरुष सती स्त्रियों की ओर भी पाप की ही दृष्टि से देखा करते हैं। भला ऐसे नारकी पुरुषों का कैसे भला हो सकता है? भक्तदास वामन कहते हैं:—
❁ पवित्र-सातुभाव-दृष्टि ❁
[ ८१ ]
“चटक मटक नित कुमति बन तकत चलत चहुँ और । वामन ! ऐसे अधम नर पड़े नरक में घोर ॥
ऋष्यमूक पर्वत पर जब श्री सीता देवी के गहने श्री लक्ष्मणजी के सामने जांचने के लिये रखे गये तब श्री लक्ष्मणजी क्या ही उत्कृष्ट उत्तर देते हैं:—
“नाहं जानामि केयूरं नाहं जानामि कुरुडले । नृपुरेत्यभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्” ॥१॥
“इन सब गहनों में केवल नृपुर ही मेरे पहिचान के हैं जो कि रोज वन्दन करते समय मैं श्रीसीता माता के चरणों में देखता था । इन केयूर कुरुडलों को और अन्य गहनों को मैं नहीं जानता हूँ । क्योंकि चरणारविंद को छोड़ कर मैंने दृष्टि उठाकर कभी ऊपर देखा ही नहीं !” अहह ! धन्य है श्री लक्ष्मणजी, आपकी यह आदर्श-शिक्षा ! यही कारण था कि आप चौदह वर्ष पर्यन्त श्रीसीतादेवी जैसी त्रैलोक्य सुन्दरी के साथ रहते हुये भी अपना ब्रह्मचर्य का अटूट पालन कर सके और मेघनाद जैसे प्रवल शत्रु को मार सके । मेघनाद तो केवल ‘हन्द्रीजीत’ ही था, परन्तु आप उससे भी बढ़कर ‘इन्द्रिय-जीत’ थे । श्रीमच्छङ्कराचार्य कहते हैं, “जितं जगत् केन ? मनो हि येन !” सत्य है, एक मात्र ‘इन्द्रियजीत’ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्य को जीत सकता है !
भाइयो ! तुम भी अपनी दृष्टि श्रीलक्ष्मणजी की तरह पवित्र बनाओ । प्रत्येक स्त्री के सामने दृष्टि को सदैव नीची ही रखो और मन में ईश्वर का चिन्तन वा “माँ, माँ, माँ,” इस पवित्र महा मंत्र का अटूट जप शुरू कर दो । तब ही तुम ब्रह्मचर्य का
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
सच्चा पालन कर सकेंगे और कामरूपी मेघनाद को निश्चयपूर्वक मार सकेंगे। सारांश यह कि किसी स्त्री की ओर न देखना ही ब्रह्मचर्य-रक्षा का परम श्रेष्ठ रहस्य है—उपाय है।
“सादी रहन-सहन”
नियम तीसरा :—
वक्तव्यः—ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये हमें अपना जीवनक्रम 'Simple living and high thinking' यानी “सादा वर्तव और ऊँचा ख्याल” इस सद्गुणदेश के अनुसार अत्यन्त सीधा-सादा प्रकार का रखना होगा; क्योंकि सादापन ही बड़पन का चिह्न है, बल्कि रहस्य है। Simpleness is itself greatness संसार में आज तक जितने महापुरुष हुए हैं वे सब सादी ही रहन-सहन से हुए हैं। अधिक सुख-भोग की सामग्री से घिरे रहना मानों अपने को व्यभिचारी ही बनाना है। श्रद्धार से कामदेव जागृत होता है। विलासप्रियता से तन, मन, धन, तीनों बरबाद हो जाते हैं। पेश-आराम का चसका ही मनुष्य को धूल में मिला देता है। आराम-तलव मनुष्य को कामरिपु पटक पटक कर मारता है। यही कारण है कि गरीबों से धनी लोग विशेष कामी और विशेष दुःखी रहते हैं। नखरेबाजी से मनुष्य आतिशबाजी की तरह बिलकुल जल उठता है। नकाशीदार लोटा या गिलास में जैसे सर्वत्र मैल भरा रहता है, उसी प्रकार नखरेबाज स्त्री-पुरुषों में भी काम, क्रोध, अहंकारादि मैल विशेष भरा रहता है। सत्पुरुष कहते हैं :—
❁ सादी रहन-सहन ❁
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भीतरसों मैलो हियो, बाहर रूप अनेक । नारायण तासों भले, कौआ तन मन एक ॥
खुद “न-खरा” शब्द ही मनुष्य की खोटी चाल को सावित कर रहा है । विशेष सज-धज करना, ऊँचे ऊँचे और रंगे-विरंगे भड़कीले व कामोत्तेजक कपड़े पहिनना, अपने हाथ अपने गले में मालाये पहरना, अंग में और बालों में सुगन्धित तैल, इत्र आदि लगाना, नेकट्राई, कॉलर, रिस्टवाँच से अपने को सवॉरना, बार बार शीशे में सूरत देखना, पान से मुँह लाल करना,—ये सब ब्रह्मचर्य के लिये काल के समान हैं । परन्तु शोक की बात है कि कई सयाने माता-पिता खुद अपने ही हाथ से, अपने बच्चों को इन विषय-अवृत्तिकर बातों में फँसा रहे और इस प्रकार अपने बच्चों को विगाड़ रहे हैं । भला ऐसे लोग विषय को कैसे जीत सकते हैं ? “कहत कवीर सुनो भाई साधो, ये क्या लड़ेगे रण में ?” यदि हमारे ईर्द-गिर्द शृङ्गारपूर्ण सामग्री न हो तो आत्मसंयम के कामों में बहुत ही सहायता मिल सकती है और हम बड़ी आसानी से आत्मसंयम कर सकते हैं । पास में खाने के लिये होने पर जैसे बराबर फूठी ही भूक लगती है, वैसे ही विलासी वस्तुओं और व्यक्तियों से घिरे रहने पर मन में काम भी बराबर जाग उठता है । ऐसा करना असंशयतः अपने भले मन को और भी विगाड़ना है; आग में तेल डालना है; वास्तव में यह भी एक प्रकार का छिपा कुसंग है । अतः इन सब भोग-विलास की बातों से सदैव दूर रहो । सादी रहन-सहन अथवा भोग-विलास से विरक्ति ही ब्रह्मचर्य-रक्षा का सहज उपाय है । सादगी ही
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
जीवन है और सजावट ही नाश है, यह तत्त्व पूर्णरीति से ध्यान में रखो ।
“सत्संगति”
नियम चौथा :—
सत्संगत्वे निःसंगत्वं निःसङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलत्वं निश्चलत्वे जीवन्मुक्तः ॥
—श्रीमच्छङ्कराचार्य ।
“सत्सङ्ग से निःसङ्ग ( Non-attachment ) की प्राप्ति होती है; निःसङ्ग से निर्मोहत्व अर्थात् विषय से अप्रतीति बढ़ती है; निर्मोह से सत्य का पूरा ज्ञान व निश्चय होता है और सत्त्व के निश्चल ज्ञान से मनुष्य जीवन्मुक्त होता है अर्थात् इस संसार से तर जाता है ।”
वक्तव्यः—संसार में ‘आत्मोन्नति’ के लिये जितने साधन मौजूद हैं उन सब में सत्संग सब से श्रेष्ठ उपाय है । ‘सत्संग’ यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । सत्संग में संसार की तमाम उत्ततिकर बातों का समावेश होता है । जैसे पवित्र व ऊँचे विचार करना, पवित्र व मीठे वचन बोलना, पवित्र वचन सुनना, पवित्र भोजन करना, पवित्र स्वदेशी कपड़े पहनना आदि अनन्त बातों का समावेश होता है और ‘कुसंग’ में संसार की तमाम स्वपरनाशकारी बातों का समावेश होता है । सत्संग से मनुष्य देवता बनता है और कुसंग से मनुष्य राक्षस बन जाता है । भक्त तुलसीदास जी पूछते हैं “को न कुसंगति पाय नसाई ?” सच है, कुसंग से आज तक
❁ सत्संगति ❁
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बड़े बड़े शीलवान, गुणवान, और होनहार बालक-बालिकायें तथा स्त्री-पुरुष धूल में मिल गये हैं । कुसंग का प्लेग महान् भयानक होता है । जंगली जानवर का वा काले साँप का भी साथ बहुत अच्छा है; उससे मनुष्य की केवल मृत्यु ही होगी । परन्तु दुर्जन का संग महान् दुर्गतिकर है; वह मनुष्य को नीच योनियों में व नरक में ही डालने वाला है । पण्डित विष्णु-शर्मा कहते हैं:—
“वरं प्राणत्यागो न पुनरधमानासुपगमः ।”
“प्राण त्याग देना अच्छा है परन्तु नीचों के पास जाना तक घुरा है ।” “जैसा संग वैसा रंग” यही प्रकृति का कायदा है । धुवों के संग से सफेद मकान भी काला पड़ जाता है । लता में का कीड़ा लता ही के तुल्य हरा बन जाता है । वैसे ही दुर्जन के साथ मनुष्य भी दुर्जन बन जाता है और सज्जन के साथ सज्जन । “कामी के संग काम जागे पै जागे” “कायर के संग शूर भागै पै भागै” “काजर की कोठरी में कैसोहू सवानो घुसो, एक रेख काजर की लागै पै लागै ।” कवि का यह कथन अक्षरशः सत्य है । नीच पुरुष अपने ही तुल्य अपने मित्रों को भी नीच, पापी और दुर्गत्मा बना डालते हैं और सत्पुरुष अपने ही जैसे अपने मित्रों को भी पुर्यात्मा महात्मा बना देते हैं ।
सत्संग की महिमा अपरंपार है । सत्संग से मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति होती है और कुसंग से नरक की प्राप्ति होती है । सत्संग की महिमा और कुसंग की अधमता किसी से छिपी नहीं है । कुसंग से मनुष्य जीते जी ही नरक का सा अनुभव करने लग जाता है । इसी कारण से गोस्वामी जी कहते हैं—“वरु भल वास नरक
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
कर ताता, दुष्ट संग जनि देहि विधाता ।” अतः कल्याण चाहने वालों को कुसंग को एक दम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग देना चाहिये और सत्सङ्ग को प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये । कुमित्रों से मिश्ररहित रहना ही लाख गुना श्रेष्ठ है; क्योंकि कुसंग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों मटियामेट हो जाते हैं और अन्त में महान् अधोगति होती है । परन्तु सत्संग से चारों पुरुषार्थ अनायास सध जाते हैं । याद रक्खो, राजपाट, गज, वाजि, धन, स्त्री, पुत्रादि सब कुछ मिलेंगे, परन्तु सत्सङ्ग मिलना परम दुर्लभ है । “विनु सत्सङ्ग विवेक न होई, राम कृपा विनु सुलभ न सोई ।”—यह गोस्वामी जी का वचन अक्षर अक्षर सत्य है । मोक्ष के सब साधन एक तरफ और सत्सङ्ग एक तरफ दोनों में सत्सङ्ग का ही दर्जा बहुत ऊँचा है ।
“तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग । तुलै न ताही सकल मिलि, जो सुख लव सरसंग ॥
सच है, “शठ सुधरहिं सत्संगति पाई” कैसे ? तो जैसे “पारस परसि कुधातु सुहाई ।” यह नितान्त सत्य है कि “सम्पूर्ण दुराचार और व्यभिचार की जड़ एक मात्र कुसंगति ही है ।” अतः ब्रह्मचारियों को तथा अभ्युदयेच्छुओं को चाहिये कि कभी भी जीभ से बुरी बात न कहे, कान से बुरी बात न सुनें (जैसे कजली होली की गालियां व भद्रे भद्रे गीत आदि), आंख से बुरी चीज़ न देखें (जैसे नाटक, तमाशा, सिनेमा, नाचवाली रामलीला, भद्दी चीज़ इत्यादि), पैर से बुरी जगह न जायें, हाथ से बुरी चीज़ न छुवें और मन से विषय-चिन्तन हरगिज़ न करें । वस्त्रिकुम्भावों को
❁ सत्संगति ❁
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नष्ट करने वाला परमात्मा का ही शुभचिन्तन व ध्यान हमेशा करें। वस, फिर तुम महात्मा ही हो और तुम्हें यहीं पर सच्चा स्वर्ग है।
एक समय भगवान् विष्णु ने राजा बलि से पूछा कि “तुम सज्जनों के साथ नरक में जाना पसन्द करोगे या दुर्जनों के साथ स्वर्ग में ?” बलि ने तत्काल उत्तर दिया कि “मैं सज्जनों के साथ नरक में ही जाना पसन्द करूंगा।” पूछा, “क्यों ?” तब जवाब मिला, जहाँ पर सज्जन है, वहीं पर स्वर्ग है और जहाँ पर दुर्जन हैं वहीं पर नरक है। दुर्जन पुरुष स्वर्ग को भी नरक बना छोड़ते हैं और सज्जन पुरुष नरक को भी स्वर्ग बना देते हैं। सत्पुरुष जहाँ जायेंगे वहीं पर स्वर्ग बन जाता है।
“सत्संगः परमं तीर्थं सत्संगः परमं पदम् ।
तस्मात्सर्वं परित्यज्य सत्संगं सततं कुर्व ॥”
सत्संग ही परम पवित्र तीर्थ है। सत्संग ही श्रेष्ठतम पद अर्थात् मोक्ष है। इस लिये सब छोड़ छोड़ कर काया वाचा मनसा नित्य सत्संग का ही सेवन करो। जब जब चित्त में नीच विषय विकार उत्पन्न हों, तब तब उस परिस्थिति का एक दम त्याग कर, सत्पुरुषों या सुमित्रों के पास तुरन्त जा बैठो। वहाँ जाते ही तुम्हारी सम्पूर्ण नीच वृत्तियाँ तत्काल दब जायंगी और मन व तन दोनों शान्त व पवित्र बन जायेंगे, यह स्वानुभव सिद्ध बात है। आप भी इसका अनुभव कर अपना उद्धार कीजिये।
एकान्तः—जिनके चित्त में कुविचार उत्पन्न होते हों, ऐसे दुर्बल चित्त वाले व्यक्तियों को एकान्तवास कदापि न करना चाहिये। उन्हें सदा इष्ट-मित्र, माता-पिता, भाई इनके समीप ही रहना चाहिये; इसी में कल्याण है।