ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ वीर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁
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पर अत्यद्भुत परिणाम होते हुये दिखाई देंगे। रोगी भी निरोग होंगे, कोधी भी शान्त होंगे और कामी भी ब्रह्मचारी होंगे। इस निश्चय को पूर्ण सत्य जानो। परन्तु दृष्टि हृदय पर लगी हुई होनी चाहिये और परमात्मा को हृदयस्थ समक्ष उसे सम्बोधित कर संकल्प करना चाहिये।
९—हे परमात्मन् ! आप प्रेमस्वरूप, शान्तिस्वरूप व क्षमारूप हो। इस दास के नसनस में प्रेम का, शान्ति का तथा क्षमा का सञ्चार हो रहा है। उनकी सनसनाहट का मैं अनुभव कर रहा हूँ। ❁ !
१०—भगवन् ! आप के पास दुःख, रोग, चिन्ता, भीति वारिद्रय कहाँ ? आप सदा सर्वदा सुखी, निरोगी, निश्चिन्त, निर्भय, लक्ष्मीपति हो। सुख, समृद्धि, शान्ति, आरोग्य, निर्भयता, आदि मुझ में संचार कर रहे हैं, ऐसा मेरा हृद विश्वास है। पहले से मैं अधिक आरोग्य हूँ, अधिक निर्भय हूँ, अधिक शान्त हूँ, निर्वाकारी हूँ। ❁ !
११—आज रात्रि में स्वप्न-द्रोप नहीं होगा मैं बहुत जल्द दुःखस्त हूँगा ! भगवन् मुझे सम्हालो ! वीर्य नाश होने के पहले ही मेरी आँखें खोल दो, मुझे जागृत कर दो, अब मैं किसी से नहीं डरूँगा, क्योंकि मेरा रक्षक प्रभु है। ❁ !
१२—वृत्तियाँ अब दिन-वदिन पवित्र हो रही हैं, दृष्टि में प्रत्येक क्षी के लिये मातृभाव समाया है, कानों में ब्रह्मचारियों का यश गूँज रहा है। मैं अब ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा हूँ, मेरा उद्धार हो रहा है। ❁ !
१३—प्रभो, मैं तेरा हूँ और तू मेरा है।