भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“अब करुणा कर कोजिए सोई, जा विधि मोर परम हित होई ॥”

आहिमाम् ! आहिमाम् !! आहिमाम् !!!

इस प्रकार रोज़ प्रातःकाल, सायंकाल, और भोजन के समय ऐसे केवल तीन ही बार यदि विश्वास और दृढ़ता के साथ हम संकल्प करेंगे तो अपरन्पार कल्याण होगा। महापुरुष कहते हैं:—

“स यः संकल्पब्रह्मेत्युपास्ते कल्द्वान्चै सः ।

लोकान् धृवान् धृव प्रतिष्ठान् प्रतिष्ठिते ॥१॥

“जो इस संकल्परूपी ब्रह्म की नित्यमति उपासना करता है वह निर्भय होकर इस लोक व परलोक में ईश्वर के तुल्य पूजनीय बन जाता है और उसका सर्वत्र सन्मान होता है।”

“सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्वदुःखमान्नुयात्” ॥१॥

ॐशान्तिःपुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु ।

शुभं भवतु ।

“तथास्तु”

“पवित्र-मातृभाव-दृष्टि”

नियम दूसरा :—

वक्तव्य—वीर्य-रक्षा के लिए हमें हनुमानजी को मुख्य आदर्श मान उनकी तरह प्रत्येक स्त्री की ओर, यदि देखना ही हो तो “मातृवत् परदारेणु” अर्थात् “पर तिथ मात समान” इसी पवित्र

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