ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁
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दृष्टि से देखना चाहिये। परन्तु किसी स्त्री की ओर आँख उठा कर न देखना ही पवित्र दृष्टि बनाए रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। किसी स्त्री का ध्यान व स्मरण कदापि न करो। स्त्रियों के कोई चित्र किंवा मूर्ति भी कभी न देखो, फिर स्त्रियों की ओर देखना तो दूर रहा ! यदि किसी स्त्री का ध्यान आवे तो तत्काल अपने परमात्मा के फोटो का तथा अपनी माता का ध्यान करने लगे। अपनी मां वा ईश्वर को उस स्त्री में देखने लगे। कोई अंग प्रत्यक्ष स्मरण हो तो “उसी तृण” अपनी माँ के उसी अंग प्रत्यक्ष को उसमें स्थापित करो। निःसन्देह तुम्हें अपनी करनी पर अत्यंत लज्जा व घृणा प्राप्त होगी और तुम उस स्त्री का नाशकारी ध्यान करना ही छोड़ दोगे। यदि कोई स्त्री सामने भी आ जाय तो फौरन अपनी दृष्टि नीची कर लो; दृष्टि ऊपर हरगिज़ न उठाओ, और तत्काल मन में, “भगवन्नाम स्मरण” अथवा “माँ” “माँ” “माँ” “माँ” इस महामन्त्र का निरन्तर जप करने लग जाओ, निस्सन्देह तुम्हारी संपूर्ण पापमय वासनायें दग्ध हो जाँयगी और मन पूर्णतया पवित्र बना रहेगा। मातृनाम पवित्र है, मातृनाम का जप इतना श्रेष्ठ है कि कु-चिन्ता उसके पास आ ही नहीं सकती। अवश्य अनुभव कीजियेगा; परम उद्धार होगा। यदि किसी स्त्रीसे बातचीत करने का प्रसंग ही आवे, तो बहुत कम बातचीत करो और उन्हें “हे वहन, हे माँ” इत्यादि पवित्र नामों से सम्बोधित करो। परन्तु हमेशा दृष्टि को नीची बनाये रखने की बात कभी मत भूलो; इस बात को अपने हृदय पट पर अंकित कर रखो। स्त्री-समाज में आवागमन सहसा न करो। स्त्रियों से एकान्त में बात चीत करना