भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ प्रत्यक्ष्य ही जीवन है ❁

सर्वथा त्याग दो । क्योंकि वैसा करना स्त्री-पुरुष दोनों के लिये हानिकर व नाशकर है । भरद्वास वामन कहते हैं :—

यदपि मात भगिनी सुता तऊ न घैठे पास । प्रवला हैं ये इन्द्रियाँ करो न तुम विश्वास ॥

श्री लक्ष्मणजी की तरह प्रत्येक स्त्री को स्त्री जगन्मनी जानकीजी का ही रूप समझ कर, मातृभाव से उसे मन ही मन प्रणाम करो और “सिया रामसय रुच जग जानी”—ऐसा पवित्र चिन्तन करने लगे ।

स्त्रियों को “पर नर तात समान” ऐसी शुद्धदृष्टि रखनी चाहिये निस्सन्देह उद्धार होगा । मातृ-चिन्तन या ईश्वर-चिन्तन यह विषयचिन्तन को मिटाने की एक घड़ी ही उत्कृष्ट दवा है । आप भी इसका सेवन कीजिये और अपना उद्धार कर लीजिये । जब तक हमारी दृष्टि वन्द है, हम निद्रित हैं, तब तक वगल में पड़े हुये महा विपथर काले सांप से भी हम नहीं डर सकते; पूर्ण निर्भय बने रहते हैं । परन्तु दृष्टि पड़ते ही उसका कितना भयंकर परिणाम होता है यह तत्काल स्पष्ट दिखाई देता है । वैसे ही जब तक किसी स्त्री की ओर हम पलक उठा के नहीं देखेंगे, उसका मुँह काला है या गौरा है ऐसा नहीं जानेंगे, तब तक यदि प्रत्यक्ष हमारे सामने उर्वशी भी आ के खड़ी क्यों न हो जावे तो वह भी हमें एक रत्नी भर डिगा नहीं सकती; हमारे चित्त को विचलित नहीं कर सकती । परन्तु दृष्टि जाले ही नष्टदृष्टि पतिंगे की तरह, उस मनुष्य के बाहर-भीतर आग लग जाती है । श्रीमान शंकराचार्य कहते हैं—