ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁
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दोषेण तीव्रो विषयः कृष्ण सर्प विषादपि । विषं निहन्ति भोक्त्वा दृष्ट्वा चक्षुषाप्यहम् ॥ १ ॥ —विवेक चूडामणि ।
अर्थात्:—काले सांप के विष से भी बढ़कर विषय-जन्य विष अत्यन्त भयानक है। विष तो पी लेने पर मनुष्य मरता है परन्तु यह विषय-विष इतना उग्र है कि केवल उसकी ओर देखने मात्र ही से मनुष्य थूल में मिल जाता है ! भक्तदास वासन ने क्या ही ठीक कहा है कि:—
अहि विष तो काटे चढ़े, यह हगवत चढ़ि जाय ।
ज्ञान, ध्यान, बल, धर्म, को प्राण सहित खा जाय ॥ १ ॥
“खी के सारे शरीर में जहर भरा हुआ है” ऐसा कहने की जगह यदि यों कहा जाय कि “सब विष दृष्टि ही में भरा हुआ है” तो बहुत ही यथार्थ होगा। सारा संसार आपको यदि करटक-मय ही मालूम होता हो तो स्वयं अपने पैर में जूता डालकर बाहर निकलना ही आपकी बुद्धिमानी होगी। शिकायत करना निरी मूर्खता है। क्योंकि आप समस्त संसार को निष्कंटक तो नहीं बना सकते हो और न उसे चमड़े से ही ढांप सकते हैं ? उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत को आप नारी-रहित तो बना नहीं सकते हो। हां, अपनी ही पापमय दृष्टि को आप अवश्य पवित्र बना सकते हो। इसी में आपकी बुद्धिमानी है और सद्गति है। खी जाति पर व्यर्थ कुत्सित कटाक्ष करना निरी मूर्खता है। अतः दृष्टि को नीची रखने ही से हम विषय के हल्लाहल विष से बच सकते हैं। जब तक हम अपनी दृष्टि उठा कर किसी खी पर नहीं डालेंगे तब तक हमारा ब्रह्मचर्य निःसन्देह अटूट बना