भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁

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दोषेण तीव्रो विषयः कृष्ण सर्प विषादपि । विषं निहन्ति भोक्त्वा दृष्ट्वा चक्षुषाप्यहम् ॥ १ ॥ —विवेक चूडामणि ।

अर्थात्:—काले सांप के विष से भी बढ़कर विषय-जन्य विष अत्यन्त भयानक है। विष तो पी लेने पर मनुष्य मरता है परन्तु यह विषय-विष इतना उग्र है कि केवल उसकी ओर देखने मात्र ही से मनुष्य थूल में मिल जाता है ! भक्तदास वासन ने क्या ही ठीक कहा है कि:—

अहि विष तो काटे चढ़े, यह हगवत चढ़ि जाय ।

ज्ञान, ध्यान, बल, धर्म, को प्राण सहित खा जाय ॥ १ ॥

“खी के सारे शरीर में जहर भरा हुआ है” ऐसा कहने की जगह यदि यों कहा जाय कि “सब विष दृष्टि ही में भरा हुआ है” तो बहुत ही यथार्थ होगा। सारा संसार आपको यदि करटक-मय ही मालूम होता हो तो स्वयं अपने पैर में जूता डालकर बाहर निकलना ही आपकी बुद्धिमानी होगी। शिकायत करना निरी मूर्खता है। क्योंकि आप समस्त संसार को निष्कंटक तो नहीं बना सकते हो और न उसे चमड़े से ही ढांप सकते हैं ? उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत को आप नारी-रहित तो बना नहीं सकते हो। हां, अपनी ही पापमय दृष्टि को आप अवश्य पवित्र बना सकते हो। इसी में आपकी बुद्धिमानी है और सद्गति है। खी जाति पर व्यर्थ कुत्सित कटाक्ष करना निरी मूर्खता है। अतः दृष्टि को नीची रखने ही से हम विषय के हल्लाहल विष से बच सकते हैं। जब तक हम अपनी दृष्टि उठा कर किसी खी पर नहीं डालेंगे तब तक हमारा ब्रह्मचर्य निःसन्देह अटूट बना

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

रहता है, यह अनुभवसिद्ध बात है। आप भी इसका अवश्य अनुभव कीजिये, निस्सीम कल्याण होगा।

एक बार शेष जी बीमार पड़े। बहुत दवा की परन्तु आराम नहीं हुआ। अन्त में धन्वन्तरी ने शेष जी की आँखें वाँधीं और फिर दवा दी। तब बहुत जल्द ठीक हो गये। मित्रों ! शेष जी के नेत्र क्यों बांधे गये, जानते हो ? सुनो, जब तक शेष जी के नेत्र खुले थे तब तक उनके नेत्रों से निकलने वाली विषमयी ज्वालाओं से सब औषधि विलकुल विष बन जाती थी; अमृतवल्ली भी विषवल्ली बन जाती थी। नेत्र जब बांधे गये तभी दवा दवा बनी रही और वे चंगे हो गये। इसी प्रकार जब तक हम अपनी विषयपूर्ण पापी दृष्टि को बन्द अर्थात् नीची नहीं करेंगे तब तक सात जन्म में हमारा सुधार नहीं हो सकता। अतः चंचल चिन्त वालों को पर-खी की ओर देखना एकदम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग ही देना चाहिये। जो गण करके इसके अनुसार चलेगा, उसको अवश्य ही मेवा मिलेगा। उसका अवश्य ही उद्धार होगा और जो मोह वश पर-खी की तरफ़ ताकेगा उसको उसका ही निर्मित पाप-रूपी पिशाच अवश्य ही खा डालेगा। विषयी दृष्टि को बन्द करने से—किसी खी की ओर विलकुल न ताकने से—पापी से पापी मनुष्य भी बहुत जल्द सुधार सकता है। नीची अर्थात् नम्र दृष्टि ही से मनुष्य ऊँचा से ऊँचा बन सकता है। जो गीध या ऊँट की तरह किसी खी की ओर गर्दन उठा के वा घुमा के ताकेगा वह फौरन नरककुंड में जा गिरेगा। नीच पुरुष सती स्त्रियों की ओर भी पाप की ही दृष्टि से देखा करते हैं। भला ऐसे नारकी पुरुषों का कैसे भला हो सकता है? भक्तदास वामन कहते हैं:—

❁ पवित्र-सातुभाव-दृष्टि ❁

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“चटक मटक नित कुमति बन तकत चलत चहुँ और । वामन ! ऐसे अधम नर पड़े नरक में घोर ॥

ऋष्यमूक पर्वत पर जब श्री सीता देवी के गहने श्री लक्ष्मणजी के सामने जांचने के लिये रखे गये तब श्री लक्ष्मणजी क्या ही उत्कृष्ट उत्तर देते हैं:—

“नाहं जानामि केयूरं नाहं जानामि कुरुडले । नृपुरेत्यभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्” ॥१॥

“इन सब गहनों में केवल नृपुर ही मेरे पहिचान के हैं जो कि रोज वन्दन करते समय मैं श्रीसीता माता के चरणों में देखता था । इन केयूर कुरुडलों को और अन्य गहनों को मैं नहीं जानता हूँ । क्योंकि चरणारविंद को छोड़ कर मैंने दृष्टि उठाकर कभी ऊपर देखा ही नहीं !” अहह ! धन्य है श्री लक्ष्मणजी, आपकी यह आदर्श-शिक्षा ! यही कारण था कि आप चौदह वर्ष पर्यन्त श्रीसीतादेवी जैसी त्रैलोक्य सुन्दरी के साथ रहते हुये भी अपना ब्रह्मचर्य का अटूट पालन कर सके और मेघनाद जैसे प्रवल शत्रु को मार सके । मेघनाद तो केवल ‘हन्द्रीजीत’ ही था, परन्तु आप उससे भी बढ़कर ‘इन्द्रिय-जीत’ थे । श्रीमच्छङ्कराचार्य कहते हैं, “जितं जगत् केन ? मनो हि येन !” सत्य है, एक मात्र ‘इन्द्रियजीत’ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्य को जीत सकता है !

भाइयो ! तुम भी अपनी दृष्टि श्रीलक्ष्मणजी की तरह पवित्र बनाओ । प्रत्येक स्त्री के सामने दृष्टि को सदैव नीची ही रखो और मन में ईश्वर का चिन्तन वा “माँ, माँ, माँ,” इस पवित्र महा मंत्र का अटूट जप शुरू कर दो । तब ही तुम ब्रह्मचर्य का

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

सच्चा पालन कर सकेंगे और कामरूपी मेघनाद को निश्चयपूर्वक मार सकेंगे। सारांश यह कि किसी स्त्री की ओर न देखना ही ब्रह्मचर्य-रक्षा का परम श्रेष्ठ रहस्य है—उपाय है।

“सादी रहन-सहन”

नियम तीसरा :—

वक्तव्यः—ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये हमें अपना जीवनक्रम 'Simple living and high thinking' यानी “सादा वर्तव और ऊँचा ख्याल” इस सद्गुणदेश के अनुसार अत्यन्त सीधा-सादा प्रकार का रखना होगा; क्योंकि सादापन ही बड़पन का चिह्न है, बल्कि रहस्य है। Simpleness is itself greatness संसार में आज तक जितने महापुरुष हुए हैं वे सब सादी ही रहन-सहन से हुए हैं। अधिक सुख-भोग की सामग्री से घिरे रहना मानों अपने को व्यभिचारी ही बनाना है। श्रद्धार से कामदेव जागृत होता है। विलासप्रियता से तन, मन, धन, तीनों बरबाद हो जाते हैं। पेश-आराम का चसका ही मनुष्य को धूल में मिला देता है। आराम-तलव मनुष्य को कामरिपु पटक पटक कर मारता है। यही कारण है कि गरीबों से धनी लोग विशेष कामी और विशेष दुःखी रहते हैं। नखरेबाजी से मनुष्य आतिशबाजी की तरह बिलकुल जल उठता है। नकाशीदार लोटा या गिलास में जैसे सर्वत्र मैल भरा रहता है, उसी प्रकार नखरेबाज स्त्री-पुरुषों में भी काम, क्रोध, अहंकारादि मैल विशेष भरा रहता है। सत्पुरुष कहते हैं :—

❁ सादी रहन-सहन ❁

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भीतरसों मैलो हियो, बाहर रूप अनेक । नारायण तासों भले, कौआ तन मन एक ॥

खुद “न-खरा” शब्द ही मनुष्य की खोटी चाल को सावित कर रहा है । विशेष सज-धज करना, ऊँचे ऊँचे और रंगे-विरंगे भड़कीले व कामोत्तेजक कपड़े पहिनना, अपने हाथ अपने गले में मालाये पहरना, अंग में और बालों में सुगन्धित तैल, इत्र आदि लगाना, नेकट्राई, कॉलर, रिस्टवाँच से अपने को सवॉरना, बार बार शीशे में सूरत देखना, पान से मुँह लाल करना,—ये सब ब्रह्मचर्य के लिये काल के समान हैं । परन्तु शोक की बात है कि कई सयाने माता-पिता खुद अपने ही हाथ से, अपने बच्चों को इन विषय-अवृत्तिकर बातों में फँसा रहे और इस प्रकार अपने बच्चों को विगाड़ रहे हैं । भला ऐसे लोग विषय को कैसे जीत सकते हैं ? “कहत कवीर सुनो भाई साधो, ये क्या लड़ेगे रण में ?” यदि हमारे ईर्द-गिर्द शृङ्गारपूर्ण सामग्री न हो तो आत्मसंयम के कामों में बहुत ही सहायता मिल सकती है और हम बड़ी आसानी से आत्मसंयम कर सकते हैं । पास में खाने के लिये होने पर जैसे बराबर फूठी ही भूक लगती है, वैसे ही विलासी वस्तुओं और व्यक्तियों से घिरे रहने पर मन में काम भी बराबर जाग उठता है । ऐसा करना असंशयतः अपने भले मन को और भी विगाड़ना है; आग में तेल डालना है; वास्तव में यह भी एक प्रकार का छिपा कुसंग है । अतः इन सब भोग-विलास की बातों से सदैव दूर रहो । सादी रहन-सहन अथवा भोग-विलास से विरक्ति ही ब्रह्मचर्य-रक्षा का सहज उपाय है । सादगी ही

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

जीवन है और सजावट ही नाश है, यह तत्त्व पूर्णरीति से ध्यान में रखो ।

“सत्संगति”

नियम चौथा :—

सत्संगत्वे निःसंगत्वं निःसङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलत्वं निश्चलत्वे जीवन्मुक्तः ॥

—श्रीमच्छङ्कराचार्य ।

“सत्सङ्ग से निःसङ्ग ( Non-attachment ) की प्राप्ति होती है; निःसङ्ग से निर्मोहत्व अर्थात् विषय से अप्रतीति बढ़ती है; निर्मोह से सत्य का पूरा ज्ञान व निश्चय होता है और सत्त्व के निश्चल ज्ञान से मनुष्य जीवन्मुक्त होता है अर्थात् इस संसार से तर जाता है ।”

वक्तव्यः—संसार में ‘आत्मोन्नति’ के लिये जितने साधन मौजूद हैं उन सब में सत्संग सब से श्रेष्ठ उपाय है । ‘सत्संग’ यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । सत्संग में संसार की तमाम उत्ततिकर बातों का समावेश होता है । जैसे पवित्र व ऊँचे विचार करना, पवित्र व मीठे वचन बोलना, पवित्र वचन सुनना, पवित्र भोजन करना, पवित्र स्वदेशी कपड़े पहनना आदि अनन्त बातों का समावेश होता है और ‘कुसंग’ में संसार की तमाम स्वपरनाशकारी बातों का समावेश होता है । सत्संग से मनुष्य देवता बनता है और कुसंग से मनुष्य राक्षस बन जाता है । भक्त तुलसीदास जी पूछते हैं “को न कुसंगति पाय नसाई ?” सच है, कुसंग से आज तक

❁ सत्संगति ❁

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बड़े बड़े शीलवान, गुणवान, और होनहार बालक-बालिकायें तथा स्त्री-पुरुष धूल में मिल गये हैं । कुसंग का प्लेग महान् भयानक होता है । जंगली जानवर का वा काले साँप का भी साथ बहुत अच्छा है; उससे मनुष्य की केवल मृत्यु ही होगी । परन्तु दुर्जन का संग महान् दुर्गतिकर है; वह मनुष्य को नीच योनियों में व नरक में ही डालने वाला है । पण्डित विष्णु-शर्मा कहते हैं:—

“वरं प्राणत्यागो न पुनरधमानासुपगमः ।”

“प्राण त्याग देना अच्छा है परन्तु नीचों के पास जाना तक घुरा है ।” “जैसा संग वैसा रंग” यही प्रकृति का कायदा है । धुवों के संग से सफेद मकान भी काला पड़ जाता है । लता में का कीड़ा लता ही के तुल्य हरा बन जाता है । वैसे ही दुर्जन के साथ मनुष्य भी दुर्जन बन जाता है और सज्जन के साथ सज्जन । “कामी के संग काम जागे पै जागे” “कायर के संग शूर भागै पै भागै” “काजर की कोठरी में कैसोहू सवानो घुसो, एक रेख काजर की लागै पै लागै ।” कवि का यह कथन अक्षरशः सत्य है । नीच पुरुष अपने ही तुल्य अपने मित्रों को भी नीच, पापी और दुर्गत्मा बना डालते हैं और सत्पुरुष अपने ही जैसे अपने मित्रों को भी पुर्यात्मा महात्मा बना देते हैं ।

सत्संग की महिमा अपरंपार है । सत्संग से मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति होती है और कुसंग से नरक की प्राप्ति होती है । सत्संग की महिमा और कुसंग की अधमता किसी से छिपी नहीं है । कुसंग से मनुष्य जीते जी ही नरक का सा अनुभव करने लग जाता है । इसी कारण से गोस्वामी जी कहते हैं—“वरु भल वास नरक

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

कर ताता, दुष्ट संग जनि देहि विधाता ।” अतः कल्याण चाहने वालों को कुसंग को एक दम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग देना चाहिये और सत्सङ्ग को प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये । कुमित्रों से मिश्ररहित रहना ही लाख गुना श्रेष्ठ है; क्योंकि कुसंग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों मटियामेट हो जाते हैं और अन्त में महान् अधोगति होती है । परन्तु सत्संग से चारों पुरुषार्थ अनायास सध जाते हैं । याद रक्खो, राजपाट, गज, वाजि, धन, स्त्री, पुत्रादि सब कुछ मिलेंगे, परन्तु सत्सङ्ग मिलना परम दुर्लभ है । “विनु सत्सङ्ग विवेक न होई, राम कृपा विनु सुलभ न सोई ।”—यह गोस्वामी जी का वचन अक्षर अक्षर सत्य है । मोक्ष के सब साधन एक तरफ और सत्सङ्ग एक तरफ दोनों में सत्सङ्ग का ही दर्जा बहुत ऊँचा है ।

“तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग । तुलै न ताही सकल मिलि, जो सुख लव सरसंग ॥

सच है, “शठ सुधरहिं सत्संगति पाई” कैसे ? तो जैसे “पारस परसि कुधातु सुहाई ।” यह नितान्त सत्य है कि “सम्पूर्ण दुराचार और व्यभिचार की जड़ एक मात्र कुसंगति ही है ।” अतः ब्रह्मचारियों को तथा अभ्युदयेच्छुओं को चाहिये कि कभी भी जीभ से बुरी बात न कहे, कान से बुरी बात न सुनें (जैसे कजली होली की गालियां व भद्रे भद्रे गीत आदि), आंख से बुरी चीज़ न देखें (जैसे नाटक, तमाशा, सिनेमा, नाचवाली रामलीला, भद्दी चीज़ इत्यादि), पैर से बुरी जगह न जायें, हाथ से बुरी चीज़ न छुवें और मन से विषय-चिन्तन हरगिज़ न करें । वस्त्रिकुम्भावों को

❁ सत्संगति ❁

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नष्ट करने वाला परमात्मा का ही शुभचिन्तन व ध्यान हमेशा करें। वस, फिर तुम महात्मा ही हो और तुम्हें यहीं पर सच्चा स्वर्ग है।

एक समय भगवान् विष्णु ने राजा बलि से पूछा कि “तुम सज्जनों के साथ नरक में जाना पसन्द करोगे या दुर्जनों के साथ स्वर्ग में ?” बलि ने तत्काल उत्तर दिया कि “मैं सज्जनों के साथ नरक में ही जाना पसन्द करूंगा।” पूछा, “क्यों ?” तब जवाब मिला, जहाँ पर सज्जन है, वहीं पर स्वर्ग है और जहाँ पर दुर्जन हैं वहीं पर नरक है। दुर्जन पुरुष स्वर्ग को भी नरक बना छोड़ते हैं और सज्जन पुरुष नरक को भी स्वर्ग बना देते हैं। सत्पुरुष जहाँ जायेंगे वहीं पर स्वर्ग बन जाता है।

“सत्संगः परमं तीर्थं सत्संगः परमं पदम् ।

तस्मात्सर्वं परित्यज्य सत्संगं सततं कुर्व ॥”

सत्संग ही परम पवित्र तीर्थ है। सत्संग ही श्रेष्ठतम पद अर्थात् मोक्ष है। इस लिये सब छोड़ छोड़ कर काया वाचा मनसा नित्य सत्संग का ही सेवन करो। जब जब चित्त में नीच विषय विकार उत्पन्न हों, तब तब उस परिस्थिति का एक दम त्याग कर, सत्पुरुषों या सुमित्रों के पास तुरन्त जा बैठो। वहाँ जाते ही तुम्हारी सम्पूर्ण नीच वृत्तियाँ तत्काल दब जायंगी और मन व तन दोनों शान्त व पवित्र बन जायेंगे, यह स्वानुभव सिद्ध बात है। आप भी इसका अनुभव कर अपना उद्धार कीजिये।

एकान्तः—जिनके चित्त में कुविचार उत्पन्न होते हों, ऐसे दुर्बल चित्त वाले व्यक्तियों को एकान्तवास कदापि न करना चाहिये। उन्हें सदा इष्ट-मित्र, माता-पिता, भाई इनके समीप ही रहना चाहिये; इसी में कल्याण है।

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“सद्ग्रन्थावलोकन”

नियम पाँचवाँ :—

वक्तव्यः—जहाँ सन्मित्र व सज्जन-संगति दुर्लभ हो वहाँ सद्ग्रन्थ-रूपी सज्जनों और मित्रों की संगति करन चाहिए। सद्ग्रन्थों द्वारा हम संसार के एक से एक महात्मा की संगति रात-दिन कर सकते हैं और उनसे जब चाहें तब तथा जितने मरतबे चाहें उतने मरतबे वार्तालाप कर सकते हैं और अपना ‘यथेष्ट’ समाधान कर सकते हैं। “सद्ग्रन्थ इस लोक के चिन्तामणि हैं। सद्ग्रन्थों के पठन-पाठन से सब कुचिन्तार्यें मिट जाती हैं, संशय-पिशाच भाग जाते हैं और मन में सद्भाव जागृत होकर परम शांति प्राप्त होती है। ज्ञानाग्नि से मनुष्य का सब पाप जल जाता है और मनुष्य पापात्मा से पुण्यात्मा और व्यभिचारी से ब्रह्मचारी बन जाता है। ज्ञानानन्द के सामने विषयानन्द फीका पड़ जाता है। बिना सिद्धान्त-वाक्यों के श्रवण किये किसी का आचरण कदापि शुद्ध नहीं हो सकता। श्रवण की महिमा अपरम्पार है। बिना देखे और सुने किसी का उद्धार आज तक न हुआ है, न होगा।

अतः हमें रोज़ प्रातःकाल और सायंकाल किसी पवित्र ग्रन्थ का पवित्रता और एकग्रतापूर्वक, शुद्ध जगह पर बैठ कर, थोड़ा ही नियमित पाठ करने का नियम बांध लेना चाहिये। पाठ को शान्ति और प्रसन्नता-पूर्वक पूरा किये बिना अत्र ग्रहण नहीं करेंगे—ऐसा एक निश्चय कर लेना चाहिये। इस प्रकार निश्चय कर लेने से मनुष्य के भीतर एक अद्भुत देवी शक्ति जागृत होती है, जो कि उसे उन्नति के शिखर पर पहुँचा देती है।

❁ सद्ग्रन्थावलोकन ❁

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गीता वा रोमयण का पाठ करना अत्यन्त उपकारी होगा। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये योगवाशिष्ठ, वैराग्यमुमुक्षुप्रकरण, उपदेशरत्नाकर, ज्ञान वैराग्य प्रकाश, श्रीरामकृष्ण, शंकराचार्यकृत प्रश्नोत्तरमणिमाला, दासबोध,—ये पुस्तकें अति ही उपकारी हैं। इनका नित्य पाठ करना चाहिये। जैसे एक ही अन्न और जल रोज़ खाया और पिया जाता है, वैसे ही जो कुछ पढ़ा है उसे ही बराबर पढ़ना और उसका खूब मनन करना चाहिये, इसी में हमारा उद्धार है।

उपन्यासः—उपन्यासादि शृङ्गार रसपूर्ण ग्रन्थ पढ़ना मानों अपने हाथ अपने मकान में दियासलाई लगाना है। शृङ्गारी पुस्तकें बड़े ब्रह्मचारी को भी व्यभिचारी बना देती हैं, अच्छे अच्छे सच्चरित्र बालक बालकायें भी कुग्रन्थों के पठन और श्रवण से दुश्चरित्र बन गयी हैं। अतः कुग्रन्थों का सर्वदा त्याग करो, अच्छे ग्रन्थों का पता अपने सुमित्रों और भाइयों से पूछो। मूर्खता से कोई कुग्रन्थ न पढ़ बैठो। कुग्रन्थ पढ़ना और विष खा लेना दोनों समान है अतः जिन्हें नोच पुरुष न बनना हो, जिन्हें महापुरुष बनना हो, उन्हें चाहिये कि वे आग्रहपूर्वक महापुरुषों के चरित्र-ग्रन्थ पढ़ें।

चरित्र-ग्रन्थः—चरित्र ग्रन्थों के पढ़ने से बड़े बड़े पापात्मा भी पुण्यात्मा बन गये हैं। सुदों में भी जीवन फूँक देते हैं, महापुरुष के चरित्र-ग्रन्थ इस लोक के लिये चैतन्यामृत हैं। अतः जो अपना उद्धार चाहते हैं वे नित्य-प्रति धर्म-ग्रन्थ नीति-ग्रन्थ चरित्र-ग्रन्थ आदि पढ़ें पढ़ाये, सुने, सुनाये क्योंकि सद्ग्रन्थ ही धार्मिक-जीवन का भोजन है। सद्ग्रन्थ ही इस लोक के तारक मंत्र हैं। और कुग्रन्थ ही काल के सारक यंत्र हैं।

१० ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“घर्षण-स्नान”

नियम छटा:—

वक्तव्य:—ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये मन का और वाणी का पवित्र रहना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि गन्दे शरीर से मन भी गन्दा बन जाता है। गन्दगी रोग का घर है। जो पुरुष रोगी है वह कभी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। पुनः रोगी शरीर से दीन और दुनियां दोनों डूब जाते हैं। अतः शरीर को सदा शुद्ध व बलिष्ठ बनाये रखना प्राणि मात्र का सब से प्रथम और मुख्य कर्तव्य है।

एक समय हमारी तरफ एक मनुष्य मोहरूम में शेर बनाया गया था। शरीर में वारनिश मिलाया हुआ पीला रंग सर्वत्र पोंत दिया गया था। दिन भर खेला-कूदा और रात को घर लौटा। थकावट के कारण जल्दी सो गया। सूर्योदय हुआ। ८-९ बजने पर भी नहीं उठा, तब लोग घबड़ा गये। पुकारने पर भी जब नहीं बोला तब लोगों ने किवाड़ तोड़ डाले और क्या देखते हैं कि वह मुर्दे की तरह अचल पड़ा है। तुरन्त डाक्टर को बुलाया। डाक्टर ने आते ही फौन उस शेर को टारपेन तेल, गरम पानी और साबुन से खूब रगड़ कर साफ किया। जब उस मनुष्य का शरीर स्वच्छ हुआ, चमड़े के सब छिद्र जब साफ खुल गये, तब कहीं १५ मिनट के बाद उसने गहरी सांस ली और आँखें खोलीं। अन्त में वह चंगा हो गया। इस दृष्टान्त से यह सिद्ध हुआ है कि नाक और मुँह से भी हमारे शरीर का चमड़ा कहीं अधिक साँस लेता है। चमड़े के छिद्र बन्द होने से नाक और मुँह खुले रहते

❁ धर्पणस्नान ❁

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हुएँ भी हम जी नहीं सकते । अतएव प्रत्येक स्त्री पुरुष को चाहिये कि वह शरीर की स्वच्छता में कभी आलस्य न करे, धर्पण-स्नान रोज किया करे । धर्पण-स्नान से त्वचा के सब छिद्र खुल जाने के कारण भीतर के असंख्य दूषित पदार्थ पसीने के रूप में बड़ी आसानी से बाहर निकल जाते हैं और बाहर की शुद्ध हवा भीतर जाने से शरीर निरोग बन जाता है । धर्पण-स्नान से मनुष्य अधिक तेजस्वी, निरोग, निर्विकारी, ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी सहज में बन सकता है; और गन्दापन से वह रोगी, विकारी, आलसी, विपयी और अस्पायु बन जाता है । सब जगह पवित्रता ही जीवन है व अपवित्रता ही मृत्यु है । हम लोग अक्सर काक-स्नान ( कौआ-स्नान ) किया करते हैं । शिर पर १०—५ लोटे पानी डाल लिये और हो गया स्नान ! शरीर मलने से कुछ मतलब नहीं । लेखक ने तो एक मनुष्य को केवल एक ही लोटे पानी में स्नान करते हुए देखा है । यह बहुत ही बुरा है । नतीजा यह होता है कि, शरीर में का जहर बाहर नहीं निकलने पाता । पाखाना साफ नहीं होता है, जठराग्नि मन्द होने से खाना भी नहीं पचता, सदा अपच हुआ करता है । फिर भीतर के जहर को परम दयालु प्रकृति माता खुजली, दाद, फोड़ों के रूपों में शरीर के बाहर निकालने लगती है । रोग प्रकृति की स्पष्ट सूचनायें हैं और मनुष्य की दुर्गुप्तगी के अन्तिम इलाज हैं । इतने पर भी मनुष्य होश में न आये तो द्वार में इन्तजार करती हुई मृत्यु उसे चट से अपनी गोद में ले लेती है ।

धर्पण-स्नान की शास्त्रीय विधि:—स्नानके लिये प्रातःकाल सबसे अच्छा समय है । प्रातःस्नान से सब दिन बड़े आनन्द से बीतता

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

है और आलस्य नष्ट होकर सम्पूर्ण शरीर चैतन्यमय बन जाता है। अतएव स्नान सूर्योदय के पहले ही कर लेना चाहिये, जाड़े और वरसात में ८-१० या १५ मिनट और गर्मी में पूरा आधा घण्टा तक, जब तक कि मस्तिष्क पूरा ठण्डा न हो तब तक स्नान अवश्य करना चाहिये। स्वप्न-द्रोप से पीड़ित मनुष्य को तो शाम को भी दुबारा नहाना चाहिये। जहाँ तक हो, ताजा और स्वच्छ शीतल जल मस्तिष्क पर खूब डालना चाहिये। स्नान के लिये कूप का जल सब ऋतुओं में अनुकूल होता है; जाड़े में गर्म और गर्मी में सर्द होता है। स्नान से लिये कूप में से जल अपने ही हाथ खींचो उससे सीना और दण्ड पुष्ट हो जाते हैं। जाड़े में स्नान के पहले १०-१२ दण्ड और २५-३० बैठक लगा लेने से जाड़ा नहीं मालूम होगा। परन्तु वर्षण-स्नान में जोर से रगड़ने से जो कुछ व्यायाम होता है, उससे शरीर में काफ़ी गर्मी आ जाती है। स्नान के लिये पानी सदा ताजा, स्वच्छ व विपुल रहे, इस बात का स्मरण रहे। स्नान के पहले सब शरीर को सूखे तौलिया से व खुरखुरे बल्ब से (मुलायम से नहीं) खूब जोर से रगड़ो; रगड़ने में कुछ कमी न करो और कुछ डरो भी मत। पर हाँ उचित जगह पर उचित जोर लगाओ, नहीं तो मारे रगड़ो के आँख ही फोड़ लोगे। तौलिया से रगड़ने के बाद हाथ से रगड़ो। हाथ के रगड़ने से शरीर में एक विजली पैदा होती है। जो कि शरीर के तमाम रोगों को हटाती है। इस कारण शरीर का प्रत्येक अवयव अच्छी तरह से रगड़ना चाहिये। जहाँ संधर्षण न होगा उतनी ही जगह कमजोर और रोगी बनी रहेगी, यह बात ध्यान में रखो। पेट को ठीक रगड़ने से पेट के अनन्त विकार नष्ट होते हैं और पाखाना भी सांफ़ होता है।

❁ घर्षण-स्नान ❁

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स्नान के लिये बैठने पर गर्दन मुकाकर सब से पहिले एक-दो लोटे जल से शिर भिगोओ । यदि मस्तिष्क प्रथम न भिगोया जाय तो नीचे की तमाम गर्मी दिमाग में चढ़कर बड़ी ही हानि करेगी, स्मरणशक्ति नष्ट कर देगी, आँख की ज्योति विगाड़ देगी, मन में काम विकार प्रबल होंगे और स्वास्थ्य भी नष्ट हो जायगा । इस ही कारण “न च स्नायाद्विनाशिरः ।” सब से प्रथम बिना शिर को भिगोये व धोये स्नान कदापि न करना चाहिये, ऐसी सूत्रमय शाखाशा है । इस शास्त्र-हृत्स्य को न जानने से कारण ही, आज न मालूम कितने ही लोगों को मुफ्त में रोगी और अल्पायु बनना पड़ता होगा । अतएव सावधान रहो । गला, शिर भिगोने के बाद फिर गार के रक्खे हुये तौलिये से क्रमशः हाथ ! कंधे, सीना, पेट, पीठ, कमर, टाँग, पैर वगैरह खूब रगड़ो । फिर शिर पर से सम्पूर्ण शरीर भर में यथेष्ट पानी उड़ेलिये । हाथ से सब अंग फिर से रगड़ो । फिर शरीर भर में पानी उड़ेलो तत्पश्चात् सूखे तौलिया से सम्पूर्ण शरीर को पोंछ डालो । ( शरीर को साफ न पोंछने ही से गीलापन के कारण मनुष्य को अक्सर दाढ़, खुजली वगैरह हुआ करती है और खुजलाते खुजलाते अनेकों लड़कों को बुरी आदतें लग जाती हैं ) फिर धोती याँ ही लपेट कर खुली प्रकाशमय जगह में सूर्य-स्नान अर्थात् सूर्य के किरण शरीर पर लेते हुये थोड़ी देर इधर-उधर टहलो । शरीर पूरा सूख जाने के बाद फिर धोती पहन कर अपने धन्धे में लग जाओ । देखो, एक ही दिन के ‘घर्षण स्नान’ से आपके शरीर में क्या ही उत्साह, आनन्द, फुर्ती और कान्ति दिखाई देती है ! हमारा मुख अन्य भव अवयवों की अपेक्षा जो इतना सुन्दर और तेजस्वी दिखाई देता है, इसका मुख्य कारण

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

घर्षण-स्नान ही है। यदि एक ही दिन में घर्षण-स्नान से मनुष्य में इतना आनन्द, उत्साह आरोग्य, शान्ति व कान्ति दिखाई देती है, तो नित्यप्रति इस प्रकार विधिपूर्वक घर्षण-स्नान करने से मनुष्य का आनन्द, उत्साह, आरोग्य शान्ति व कान्ति और भी अधिक बढ़ेगी इसमें सन्देह ही क्या है ?

स्नान के कुछ शास्त्रीय नियम—( १ ) रोज दो मरतवे स्नान करना अच्छा है। गर्मी के दिनों में तो हमको दो मरतवे स्नान करना ही चाहिये। क्योंकि दिन भर के पसीने के कारण शरीर से बड़ी ही वद्वू निकलने लगती है। पसीने में बहुत ज़हर होता है, यह बात ध्यान में रखो। ( २ ) महीने में एक मरतवे गर्म पानी और साबुन या सोड़ा से नहाना बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद होता है, त्वचायें और भी साफ हो जाती हैं। परन्तु रोज गर्म पानी से नहाना अच्छा नहीं है। यह अप्राकृतिक है। उससे मनुष्य कमज़ोर नाजुक, चंचल व विषयी बन जाता है। नित्य गर्म पानी से नहाना ब्रह्मचर्य के लिये बहुत ही हानिकर है। ( ३ ) नदी और तालाब का स्नान और भी अच्छा होता है। शास्त्र में समुद्र-स्नान की महिमा सब से अधिक है क्योंकि समुद्र जल में एक प्रकार की विजली होने के कारण मनुष्य अधिक निरोग और चैतन्यमय बन जाता है। यदि घर के पानी में भी समुद्र का नमक मिलाकर स्नान किया जाय तो उससे भी विशेष फायदा होता है। बाद में शुद्ध जल से स्नान कर लेना चाहिये। ( ४ ) तैरने में बहुत से लाभ हैं। तैरने में सभी अवयवों को व्यायाम होता है, सीना पुष्ट और विस्तीर्ण होता है, फेफड़े शुद्ध और वलवान होते हैं और सम्पूर्ण शरीर निरोग, फुर्तीला, सुदृढ़, दमदार, उत्साही और शक्तिशाली बनता है। परन्तु

❁ धर्पण-स्नान ❁

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तैरना नियमपूर्वक होना चाहिये; तैरना अपने और दूसरों की प्राण रक्षा के लिये एक बहुत ही अच्छी कला है। क्या डूबते समय हमारी किताबें काम देंगी ? कदापि नहीं। अतः इस हुनर को स्वास्थ्य की दृष्टि से हर किसी को अवश्य सीख लेना चाहिये (५) स्नान भोजन के पहले वा बाद में तीन घंटे के अन्तर पर करना चाहिये। नहाने के बाद तुरन्त भोजन करने से अथवा भोजन के बाद तुरन्त नहाने से पित्त बढ़ जाने के कारण पाचन-क्रिया विगड़ जाती है जिससे कि रोग व मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। अतः एव सावधान रहो। (६) रोगा, दुर्बल, वा नाजुक मनुष्य को हफ्ते में ताजा ठण्डे पानी से जरूर नहाना चाहिये और बहुत धीरे धीरे ठण्डे जल से नहाने का अभ्यास डालना चाहिये। (७) तौलिया से रगड़ने और थोड़ी सी कसरत करने पर भी यदि बहुत ही जाड़ा मालूम होता हो, हमें स्नान हरगिज न करना चाहिये (८) स्नान के लिये जगह एकान्तपूर्ण, खुली हवादार, प्रकाशमय होनी चाहिये, स्नान के समय शरीर पर जितने ही कम कपड़े होंगे उतना ही अच्छा है, क्योंकि खुले शरीर पर सदी गर्मी असर नहीं कर सकती। लंगोट पहिन कर नहाना बहुत अच्छा है; घर पर एकान्त में विवस्त्र नहाना सबसे अच्छा है, जलाशय में नहीं। यद्यपि नंगा नहाना पश्चात्यों ने पसन्द किया है तथापि वह भारतीय सभ्यता के सर्वथा विरुद्ध है, भारतीयों के लिये लंगोट सहित नहाना ही सर्व श्रेष्ठ है। (९) वीर्यपात होने के बाद तुरन्त नहा लेना चाहिये।

जापानी लोग धर्पण-स्नान का महत्त्व भोजन से भी अधिक मानते हैं और इसी कारण आज वे इतने उत्साही, उद्योगी, दीर्घायु

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

और सब बातों में तेजस्वी दिखाई देते हैं ! परन्तु हम लोग, उन्हीं के भाई, मुर्दों के समान निर्बिध गोबरगणेश दिखाई दे रहे हैं । यह कितने शोक और लज्जा की बात है ? अब हमें अवश्य ही जागना चाहिये और हमेशा उन्नतिमद काम करने चाहिये । सब उन्नति का मूल शरीर है । अतः उसे पहले सुधारना चाहिये । योही हाथ बुमाने से जैसे फोड़े वर्तन ( पात्र ) साफ नहीं हो सकता, उसे जोर से ही रगड़ना पड़ता है, तद्वत् शरीर रूपी वर्तन भी, वगैर धर्पण-स्नान के बाहर भीतर से साफ और चमकीला नहीं हो सकता । काफ-स्नान से मनुष्य सदा रोगी, मलीन, आलसी, विपथी, निस्तेज और अल्पशु होता है । परन्तु वही मनुष्य यदि धर्पण-स्नान आज ही से शुरू कर दे, तो थोड़े ही दिनों में पूर्ण निरोगी, निर्निर्काशी, उत्साही व तेजस्वी बन सकता है । ब्रह्मचर्य तथा दीर्घ जीवन के लिये धर्पण-स्नान अत्यन्त आवश्यक और अमृत तुल्य है ।

“सादा व ताजा अल्पाहार”

नियम सातवां :—

वक्तव्यः—ब्रह्मचर्य और भोजन में अत्यन्त घनिष्ठ संबंध है । भोजन के महत्व को बहुत लोग नहीं जानते, इस कारण उन्हें अत्यन्त दुःख उठाना पड़ता है । जिसे ब्रह्मचारी बनना है, उसको सादा और अल्पाहारी अवश्य ही बनना होगा । अधिक भोजन करने वाला सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता । क્યાंकि जोर की आँधी जैसे पेड़ों को उखाड़ डालती है, वैसे ही कामदेव

❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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पैट्ट मनुष्य को पटक पटक कर मार डलता है। अधिक भोजन करने वाला पुरुष किसी हालत में वीर्य को नहीं रोक सकता। उसका चित्त सदा विषय की ओर लगा रहता है। मन और तन दोनों रोगी बन जाते हैं, आयु घट जाती है और स्वार्थ व परमार्थ दोनों मटियामेट हो जाते हैं। स्वप्नदोष अक्सर अधिक भोजन ही से हुआ करता है। यदि आप को वीर्यवान व आरोग्यवान् बनना हो, स्वप्नदोष से और अकालमृत्यु से बचना हो तो आपको अवश्य ही सदा और अल्पाहारी बनना होगा।

एक समय ईरान के बादशाह वहमन ने एक श्रेष्ठ वैद्य से पूछा “दिन-रात में मनुष्य को कितना खाना चाहिये ?” उत्तर मिला “सौ दिरम अर्थात् ३९ तोला ।” फिर पूछा, “इतने से क्या होगा ?” हकीम बोला, “शरीर-पोषण के लिये इस से अधिक नहीं चाहिए। इसके उपरान्त जो कुछ खाया जाता है वह सिर्फ वीभ ठोना और उम्र को खोना है।

यह सिद्धान्त है कि आहार, निद्रा, भय, मैथुन, क्रोध, कलह आदि बातें जितनी बढ़ाई जायँ उतनी ही बढ़ती जाती हैं और जितनी कम की जायँ उतनी कम होती जाती हैं। भगवान् बुद्ध कहते हैं:—“एक बार हलका आहार करने वाला “महात्मा” है; दो बार सम्हल करके खाने वाला बुद्धिमान् व भाग्यवान् है; और इससे अधिक वे अटकल खानेवाला महामूर्ख, अभागा और पशु का भी पशु है ।” सच है, गले तक खूब दूस दूस करके खाना और फिर पछताना कौन बुद्धिमान् है ? ये क्या भाग्यवान् के लक्षण हैं ? भोजन सुख के लिए खाया जाता है या दुःख के लिए ? जिस भोजन से दुःख उपजता है उस भोजन को विष तुल्य ही समझना

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❁ महत्त्वपूर्ण ही जीवन है ❁

चाहिये । “भोजन तारता भी है और मारता भी है ।” अधिक भोजन से मनुष्य जीते जी ही सुर्दी और बेकार बन जाता है । भक्तदास वामन कहते हैं:—

“ज्यादा घायु भरनसे, फूटवाल फट जाय ।

घड़ी कृपा भगवान् की, पेट नहीं फट जाय ॥१॥

“यदपि न दीखत पेट फटा, फटत मनुज का देह ।

रोग भयंकर होता है, धने नरक का गेह” ॥२॥

अतः तन्दुरुस्ती के लिये खाओ; रोगी बनने के लिए मत खाओ । जो कुछ खाओ जीने के लिए खाओ, मरने के लिये मत खाओ । बहुत भोजन करने वाला बहुत जल्द मरता है । अमेरिका के सुप्रसिद्ध डाक्टर म्याक्क्याडन कहते हैं:—“आजकल साधारणतः लोग भोजन के वहाने जितने पदार्थों का सत्यानाश करते हैं उनके चतुर्थीश से ही उनका काम बड़े आनन्द से चल सकता है । अकाल में अन्न के अभाव से लोग उतने नहीं मरते, जितने कि सुकाल में अधिक अन्न खाने से तरह तरह के रोगों से मर जाते हैं ।” देश में दुष्काल भी पेटू लोगों की ही कृपा से पड़ता है । अतः पेटू मनुष्यों को स्वयं अपना तथा देश का भी वैरी समझना चाहिये ।

अरेरे ! गरीब लोग बेचारे भोजन न मिलने से मरते हैं और धनी तथा पेटू लोग अधिक खाने से मरते हैं, केवल मध्यम प्रकार के मिताहारी पुरुष ही ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी हो सकते हैं । देश में प्लेग, कालरा भी पेटू लोगों के ही कारण होते हैं, क्योंकि पेटू मनुष्य बहुत गन्दे होते हैं । कमाना, खाना और पाखाना ये ही उनके इस संसार में के तीन मुख्य काम होते हैं और अन्त में वे