ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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“चटक मटक नित कुमति बन तकत चलत चहुँ और । वामन ! ऐसे अधम नर पड़े नरक में घोर ॥
ऋष्यमूक पर्वत पर जब श्री सीता देवी के गहने श्री लक्ष्मणजी के सामने जांचने के लिये रखे गये तब श्री लक्ष्मणजी क्या ही उत्कृष्ट उत्तर देते हैं:—
“नाहं जानामि केयूरं नाहं जानामि कुरुडले । नृपुरेत्यभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्” ॥१॥
“इन सब गहनों में केवल नृपुर ही मेरे पहिचान के हैं जो कि रोज वन्दन करते समय मैं श्रीसीता माता के चरणों में देखता था । इन केयूर कुरुडलों को और अन्य गहनों को मैं नहीं जानता हूँ । क्योंकि चरणारविंद को छोड़ कर मैंने दृष्टि उठाकर कभी ऊपर देखा ही नहीं !” अहह ! धन्य है श्री लक्ष्मणजी, आपकी यह आदर्श-शिक्षा ! यही कारण था कि आप चौदह वर्ष पर्यन्त श्रीसीतादेवी जैसी त्रैलोक्य सुन्दरी के साथ रहते हुये भी अपना ब्रह्मचर्य का अटूट पालन कर सके और मेघनाद जैसे प्रवल शत्रु को मार सके । मेघनाद तो केवल ‘हन्द्रीजीत’ ही था, परन्तु आप उससे भी बढ़कर ‘इन्द्रिय-जीत’ थे । श्रीमच्छङ्कराचार्य कहते हैं, “जितं जगत् केन ? मनो हि येन !” सत्य है, एक मात्र ‘इन्द्रियजीत’ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्य को जीत सकता है !
भाइयो ! तुम भी अपनी दृष्टि श्रीलक्ष्मणजी की तरह पवित्र बनाओ । प्रत्येक स्त्री के सामने दृष्टि को सदैव नीची ही रखो और मन में ईश्वर का चिन्तन वा “माँ, माँ, माँ,” इस पवित्र महा मंत्र का अटूट जप शुरू कर दो । तब ही तुम ब्रह्मचर्य का
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