ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
रहता है, यह अनुभवसिद्ध बात है। आप भी इसका अवश्य अनुभव कीजिये, निस्सीम कल्याण होगा।
एक बार शेष जी बीमार पड़े। बहुत दवा की परन्तु आराम नहीं हुआ। अन्त में धन्वन्तरी ने शेष जी की आँखें वाँधीं और फिर दवा दी। तब बहुत जल्द ठीक हो गये। मित्रों ! शेष जी के नेत्र क्यों बांधे गये, जानते हो ? सुनो, जब तक शेष जी के नेत्र खुले थे तब तक उनके नेत्रों से निकलने वाली विषमयी ज्वालाओं से सब औषधि विलकुल विष बन जाती थी; अमृतवल्ली भी विषवल्ली बन जाती थी। नेत्र जब बांधे गये तभी दवा दवा बनी रही और वे चंगे हो गये। इसी प्रकार जब तक हम अपनी विषयपूर्ण पापी दृष्टि को बन्द अर्थात् नीची नहीं करेंगे तब तक सात जन्म में हमारा सुधार नहीं हो सकता। अतः चंचल चिन्त वालों को पर-खी की ओर देखना एकदम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग ही देना चाहिये। जो गण करके इसके अनुसार चलेगा, उसको अवश्य ही मेवा मिलेगा। उसका अवश्य ही उद्धार होगा और जो मोह वश पर-खी की तरफ़ ताकेगा उसको उसका ही निर्मित पाप-रूपी पिशाच अवश्य ही खा डालेगा। विषयी दृष्टि को बन्द करने से—किसी खी की ओर विलकुल न ताकने से—पापी से पापी मनुष्य भी बहुत जल्द सुधार सकता है। नीची अर्थात् नम्र दृष्टि ही से मनुष्य ऊँचा से ऊँचा बन सकता है। जो गीध या ऊँट की तरह किसी खी की ओर गर्दन उठा के वा घुमा के ताकेगा वह फौरन नरककुंड में जा गिरेगा। नीच पुरुष सती स्त्रियों की ओर भी पाप की ही दृष्टि से देखा करते हैं। भला ऐसे नारकी पुरुषों का कैसे भला हो सकता है? भक्तदास वामन कहते हैं:—