भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

४—ईश्वर परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् है। मेरा भी स्वरूप वही है; मैं भी परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् हूँ ! ❁ !

५—ईश्वर पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी है; ईश्वर मुझ में है; मैं भी पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी हूँ । ❁ !

आवश्यक सूचनाः—“मैं” शब्द “ईश्वर” बोधक है, न कि शरीर बोधक। क्योंकि यह साढ़े तीन हाथ का अभिमानी चोला मृत्यु के बाद ज्यों का त्यों पड़ा रहने पर भी “मैं” नहीं कह सकता। अतः “मैं” यह सर्वव्यापी शब्द केवल ईश्वर बोधक ही संममना चाहिये; न कि देह का बोधक ! देहाभिमान से अधःपतन होगा यह बात सदा ध्यान में रखना चाहिये।

६—मैं ईश्वर हूँ, मेरी शक्ति अनन्त है। मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ । ❁ !

७—मैं पुरुष हूँ; प्रकृति मेरी स्त्री है; अतः प्रकृति को मेरी आज्ञा अक्षर अक्षर माननी होगी। ❁ !

८—अय प्रकृति देवि ! मन तथा इन्द्रियों को विषय का स्मरण न करने दो। उन्हें विषय की ओर न जाने दो। उन्हें विषय से पीछे हटाओ ! उन्हें विषय से खूब सम्हालो। हरगिज़ उनका नाश न होने दो। उन्हें विवेक से शान्त व सुखी करो। देखो इस आज्ञा का ठीक ठीक पालन करो। ❁ !

द्वितीय सूचनाः—अब नीचे के संकल्प हृदय की ओर देखते हुये करो; मानां परमात्मा हृदय में ही बैठे हुए हैं और हम “भक्त” भाव से, परमात्मा से बातचीत कर रहे हैं। इन सङ्कल्पों से शरीर