भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

❁ वीर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁

[ ७३ ]

विघ्न नष्ट करके मेरे सम्पूर्ण कार्य सदैव सिद्ध करो !” “सम्पूर्ण लोगों के हृदय में बुद्धिरूप से सदा विराजमान रहने वाली और स्वर्ग तथा मोक्ष देने वाली हे परम दयालु माता, देवी नारायणी ! तेरे चरण कमल में मेरा बारबार प्रणाम है !” “आप मुझे सदैव सुखुष्टि दो !” “हे जगद्गुरो ! आप ही ब्रह्म, विष्णु महेश्वर हो; सम्पूर्ण जगत् के प्रेरक तथा चालक हो ! आप ही की आज्ञा से चन्द्र सूर्य प्रकाशित होते हैं। वायु बहता है, मेघ वरसते हैं और सम्पूर्ण चराचर जीव अपना अपना कार्य सुयंत्रित कर रहे हैं। आप साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हो, आप अनाथ के नाथ हो, ठोकर लगने पर भी, सम्हालने वाली भूमि की तरह अनन्त अपराध हाथ से होने पर भी—महान् अपराधी होने पर भी—हमें सम्हालने वाले, हमारे एकमात्र आधार आपही हो, हम आपही के शरण हैं। आप शरणगतवत्सल हो; आप हमें सच्चा सन्मार्ग दिखलाओ और हमारी वाँह पकड़ कर हमें सन्मार्ग से कभी विचलित न होने दो। आपको मेरा सनन्म बारबार प्रणाम है !” ❁

त्राहिमाम् ! त्राहिमाम् !! त्राहिमाम् !!!

“प्रेरक संकल्प” !

१—ईश्वर सर्वत्र व्यापमान है; ईश्वर मेरे भीतर है; मैं ईश्वर हूँ। “अहं ब्रह्मास्मि” यही मेरा सच्चा स्वरूप है। ❁ !

२—ईश्वर सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप व आनन्दस्वरूप है; ईश्वर सच्चिदानन्द है; ईश्वर मेरे भीतर है; मैं भी सच्चिदानन्दरूप हूँ। ❁ !

३—ईश्वर पूर्ण निर्भय, निःसंग व निष्पाप है। मैं भी पूर्ण निर्भय, निःसंग व निष्पाप हूँ। ❁ !