ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ महाचर्य ही जीवन है ❁
इसी प्रकार हमारे कायिक, वाचिक, मानसिक शुभाशुभ कर्मों के फल भी हमें अवश्य ही मिलते हैं । मामूली बीज तो कोई उगते भी नहीं, परन्तु कर्मबीज एक भी उगे बिना नहीं रहता; सभी फलरूप होते हैं । अतः प्रातःकाल उठते ही प्रथम अत्यन्त प्रेम से पकन्दो, चार घड़िया स्तोत्र वा भजन रोज़ कहो और फिर अलग पवित्र आसन पर बैठ कर, अत्यन्त दृढ़ विश्वास से नीचे दिये अनुसार पवित्र व उच्च संकल्प किया करो । देखो, संकल्प ही करते करते तुम में कैसा दैवी तेज प्रवेश करता है ।
“संकल्प-प्रार्थना”
“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्ये कोटि-समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव ! सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ १ ॥
“सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य दृदि संस्थिते ।
स्वर्गाऽपवर्गदे देवि ! नारायणि ! नमोस्तुते ॥ २ ॥
“गुरुर्हा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुचेनमः ॥ ३ ॥
१—मन ही गणेश ( गण-ईश अर्थात् इन्द्रिय समूह को हिलाने वाला स्वामी ) है ।
२—बुद्धि ही सर्वान्तर््याप्त ज्ञानदेवी सुरस्वती हैं ।
३—आत्मा ही परब्रह्म परमात्मा है । और,
४—आत्मा ही सत्वरज-तमात्मक त्रिमूर्ति श्रीदत्तात्रेयस्वरूप सदगुरु है ।
अर्थः—“हे वक्रतुण्ड ( टेढ़ी शृण्ड वाले ) ऽकार ! आप विश्वोदर हो, विश्वव्यापी हो । अनन्त कोटि सूर्यतुल्य आपका प्रकाश है । आपको मेरा बार बार प्रणाम है । हे भगवान् ! मेरे सम्पूर्ण