ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ वीर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁
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मनुष्य के उचित प्रयत्न करने पर असाध्य कुछ भी नहीं है। आज बीज बोया और कल फल चाहा, ऐसे अधीर मनुष्य को कदापि यश नहीं मिलता। यदि जल्दी फल न मिले तो मन में समझो कि पहले के पाप-संकल्प अधिक हैं; परन्तु वे पुण्य-संकल्पो द्वारा निश्चय ही परास्त होंगे। जब तक हृदय के अपविन्न भाव हट न जायें तब तक हठपूर्वक प्रबल वेग से पुनः पुनः चेष्टा करो। भगवान् कहते हैं कि “तुम्हारी यह चेष्टा कभी निष्फल न होगी; तुम्हारा अवश्य ही उद्धार होगा !” नहि कल्याणकृतं कश्चित् दुर्गातिं तात गच्छति ।”
“ध्वनि वैसी प्रतिध्वनि”—यह भी प्रकृति का एक अटल सिद्धान्त है। यदि हम कुएँ में भाँक कर कहें कि “नाश हो तेरा” तो उधर से भी नाश हो तेरा” ऐसा ही जवाब मिलेगा और यदि “भला हो तेरा” ऐसा कहें तो ऐसा ही उत्तर मिलेगा। अतः जिस प्रकार हम भगवान् की स्तुति प्रार्थना वा संकल्प करेंगे, ठीक वैसे ही भगवान् भी हमें कहेंगे। यदि हम कहेंगे कि “भगवान्” आप वीर्यवान् हो, भाग्यवान् हो, तो भगवान् भी उलट कर हम से यही कहेंगे, कि “आप वीर्यवान् हो, भाग्यवान् हो” इत्यादि। इस पर भी हमारे धर्मशास्त्रों में जो ईश्वर के स्तोत्र और मंत्र नित्य पाठ के लिये रक्खे गये हैं, उनमें हमारे उद्धार का कितना उच्च हेतु भरा हुआ है, यह पूर्णतया सिद्ध होता है। अतः जिस प्रकार हम अपने को बनाना चाहते हैं उसी प्रकार से स्तुति प्रार्थना “निःशंक” भाव से रोज किया करें; बहुत ही उपकार होगा।
तुलसी अपने राम को, रीक्ष भजे चहे खीक्ष।
खेत परे पर जामि है, उलटा सुलटा बीज ॥