भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

७० ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

बनाता है। मन ही मनुष्य को स्वर्ग में या नरक में विठा देता है। स्वर्ग या नरक में जाने की कुर्जी भगवान् ने हमारे ही हाथ में दे रखी है ? उसे सीधी या टेढ़ी धुमाना हमारे ही हाथ में है। मनुष्य की सुगति व दुर्गति उसके भले बुरे संकल्पों, विचारों पर ही सर्वथा निर्भर है। पापमय विचारों से वह पापात्मा और पुण्यमयी विचारों से वह निःसन्देह पुण्यात्मा बन जाता है। उच्च व पवित्र विचारों से, कितना ह पवित्र मनुष्य क्यों न हो वह भी उच्चार्ति-उच्च पवित्रात्मा बन सकता है। परन्तु भगवान् कहते हैं “उसके बुद्धि का निश्चय पूरा होना चाहिये।” अर्थात् ऐसा पुरुष फिर पाप कर्म नहीं कर सकता। “विश्वासो फलदायकः।”—यह भगवान् का वचन है। जितना विश्वास अधिक होगा उतना उसका फल भी अधिक होता है। महापुरुषों का विश्वास इतना प्रबल और अनन्य होता है कि वे पानी का घी और वालू को चीनी तक बना सकते हैं। ऐसा ही अनन्य विश्वास हमारा भी होना चाहिये। “संशयात्मा विनश्यति”—संशयी पुरुष का नाश होता है। अतः निःसन्देह भाव से संकल्प करने पर हमारा अवश्य ही उद्धार होगा, इसमें कोई आश्रय नहीं है ! सब पूछिये तो कुकल्पना ही शैतान है। अतः जिसको तरना हो उसे चाहिये कि हठपूर्वक कुबुद्धि को, कुविचारों को, त्याग कर सुबुद्धि को धारण करे और आज ही से, इसी समय से, पवित्र विचारों को शुरू कर दे ! निःसन्देह अपरिमित कल्याण होगा। अतः निद्रा के पूर्व रोज़ पाव घण्टा अवश्य पवित्र संकल्प किया करो। इससे सब कुस्वप्नों का नाश होकर, तुम में एक अद्भुत दैवी शक्ति प्रकट होगी और तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होंगे। “पुरुष प्रयत्नस्य असाध्यं नास्ति”—

ब्रह्मचर्य ही जीवन है · पृष्ठ 86, कुल 199 में से · BharatKosha