भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ वॉर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁

[ ६९ ]

है !’ ऐसा सोचते हों उसे वहाँ पर इधर-उधर चारों ओर नाचने कूदने की डरावनी आवाज सुनाई देने लगी। उसने सोचा ‘सचमुच यहाँ पर स्मशान ही मालूम होता है। कहीं ऐसा न हो कि कोई शैतान मेरे सामने आके खड़ा हो जाय।’ ऐसी शंका करते ही एक महान् विकराल “भूत” उसके सामने आकर खड़ा हुआ और उसकी ओर गुराँते हुये देखने लगा। मनुष्य ने डर के मारे आंखें लगा लीं और मन में कहने लगा ‘अरे वाप ! यह मुझे खाय तो नहीं जायगा !’ ज्योंही उसने ऐसा सोचा त्योंही उस पिशाच ने उसको मुँह में डालकर तत्काल खा लिया।

ठीक यही दशा अच्छे या बुरे विचार करने वालों की भी हुआ करती है। कल्पवृक्ष कहाँ है; यह तो हम नहीं जान सकते, परन्तु ऐसा कोई भी स्थल नहीं है कि जहाँ परमात्मा न हो। वह घट घट में और अणु परमाणु में भरा हुआ है और ईश्वर से बढ़कर दाता कल्पवृक्ष दूसरा कोई भी नहीं हो सकता और आप हम सब उसी की छाया में बैठे हुये हैं। तब ऐसे सर्वत्र व्यापमान कल्पवृक्ष के सामने मनुष्य की सम्पूर्ण भली बुरी कामनायेँ होंगी इसमें सन्देह ही क्या है ! अच्छे विचारों से उसे अवश्य ही मेवा मिलेगा और बुरे विचारों से वह पिशाचों द्वारा अवश्य ही खाया जायगा। सारांश, मनुष्य अपने ही विचारों से नष्ट और श्रेष्ठ बनता है, इसमें कोई भी शक नहीं। चाहे कितने ही गुमरूप से हृदय के भीतर हम कोई कल्पना—फिर कर्म तो दूर रहा—करते हों तो उसे भी परमात्मा देखता है और उसके भले-बुरे फल हमें वरावर देता है। “मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः”—भगवान् का यह अटल सिद्धान्त है। मन ही मनुष्य को गलाम