ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
४—ईश्वर परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् है। मेरा भी स्वरूप वही है; मैं भी परम वीर्यवान्, पूर्ण भान्यवान् व असीम सामर्थ्यवान् हूँ ! ❁ !
५—ईश्वर पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी है; ईश्वर मुझ में है; मैं भी पूर्ण निष्कास, निर्विपय व निर्विकारी हूँ । ❁ !
आवश्यक सूचनाः—“मैं” शब्द “ईश्वर” बोधक है, न कि शरीर बोधक। क्योंकि यह साढ़े तीन हाथ का अभिमानी चोला मृत्यु के बाद ज्यों का त्यों पड़ा रहने पर भी “मैं” नहीं कह सकता। अतः “मैं” यह सर्वव्यापी शब्द केवल ईश्वर बोधक ही संममना चाहिये; न कि देह का बोधक ! देहाभिमान से अधःपतन होगा यह बात सदा ध्यान में रखना चाहिये।
६—मैं ईश्वर हूँ, मेरी शक्ति अनन्त है। मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ । ❁ !
७—मैं पुरुष हूँ; प्रकृति मेरी स्त्री है; अतः प्रकृति को मेरी आज्ञा अक्षर अक्षर माननी होगी। ❁ !
८—अय प्रकृति देवि ! मन तथा इन्द्रियों को विषय का स्मरण न करने दो। उन्हें विषय की ओर न जाने दो। उन्हें विषय से पीछे हटाओ ! उन्हें विषय से खूब सम्हालो। हरगिज़ उनका नाश न होने दो। उन्हें विवेक से शान्त व सुखी करो। देखो इस आज्ञा का ठीक ठीक पालन करो। ❁ !
द्वितीय सूचनाः—अब नीचे के संकल्प हृदय की ओर देखते हुये करो; मानां परमात्मा हृदय में ही बैठे हुए हैं और हम “भक्त” भाव से, परमात्मा से बातचीत कर रहे हैं। इन सङ्कल्पों से शरीर
❁ वीर्यरत्ना के अनूठे नियम ❁
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पर अत्यद्भुत परिणाम होते हुये दिखाई देंगे। रोगी भी निरोग होंगे, कोधी भी शान्त होंगे और कामी भी ब्रह्मचारी होंगे। इस निश्चय को पूर्ण सत्य जानो। परन्तु दृष्टि हृदय पर लगी हुई होनी चाहिये और परमात्मा को हृदयस्थ समक्ष उसे सम्बोधित कर संकल्प करना चाहिये।
९—हे परमात्मन् ! आप प्रेमस्वरूप, शान्तिस्वरूप व क्षमारूप हो। इस दास के नसनस में प्रेम का, शान्ति का तथा क्षमा का सञ्चार हो रहा है। उनकी सनसनाहट का मैं अनुभव कर रहा हूँ। ❁ !
१०—भगवन् ! आप के पास दुःख, रोग, चिन्ता, भीति वारिद्रय कहाँ ? आप सदा सर्वदा सुखी, निरोगी, निश्चिन्त, निर्भय, लक्ष्मीपति हो। सुख, समृद्धि, शान्ति, आरोग्य, निर्भयता, आदि मुझ में संचार कर रहे हैं, ऐसा मेरा हृद विश्वास है। पहले से मैं अधिक आरोग्य हूँ, अधिक निर्भय हूँ, अधिक शान्त हूँ, निर्वाकारी हूँ। ❁ !
११—आज रात्रि में स्वप्न-द्रोप नहीं होगा मैं बहुत जल्द दुःखस्त हूँगा ! भगवन् मुझे सम्हालो ! वीर्य नाश होने के पहले ही मेरी आँखें खोल दो, मुझे जागृत कर दो, अब मैं किसी से नहीं डरूँगा, क्योंकि मेरा रक्षक प्रभु है। ❁ !
१२—वृत्तियाँ अब दिन-वदिन पवित्र हो रही हैं, दृष्टि में प्रत्येक क्षी के लिये मातृभाव समाया है, कानों में ब्रह्मचारियों का यश गूँज रहा है। मैं अब ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा हूँ, मेरा उद्धार हो रहा है। ❁ !
१३—प्रभो, मैं तेरा हूँ और तू मेरा है।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
“अब करुणा कर कोजिए सोई, जा विधि मोर परम हित होई ॥”
आहिमाम् ! आहिमाम् !! आहिमाम् !!!
इस प्रकार रोज़ प्रातःकाल, सायंकाल, और भोजन के समय ऐसे केवल तीन ही बार यदि विश्वास और दृढ़ता के साथ हम संकल्प करेंगे तो अपरन्पार कल्याण होगा। महापुरुष कहते हैं:—
“स यः संकल्पब्रह्मेत्युपास्ते कल्द्वान्चै सः ।
लोकान् धृवान् धृव प्रतिष्ठान् प्रतिष्ठिते ॥१॥
“जो इस संकल्परूपी ब्रह्म की नित्यमति उपासना करता है वह निर्भय होकर इस लोक व परलोक में ईश्वर के तुल्य पूजनीय बन जाता है और उसका सर्वत्र सन्मान होता है।”
“सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्वदुःखमान्नुयात्” ॥१॥
ॐशान्तिःपुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु ।
शुभं भवतु ।
“तथास्तु”
“पवित्र-मातृभाव-दृष्टि”
नियम दूसरा :—
वक्तव्य—वीर्य-रक्षा के लिए हमें हनुमानजी को मुख्य आदर्श मान उनकी तरह प्रत्येक स्त्री की ओर, यदि देखना ही हो तो “मातृवत् परदारेणु” अर्थात् “पर तिथ मात समान” इसी पवित्र
❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁
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दृष्टि से देखना चाहिये। परन्तु किसी स्त्री की ओर आँख उठा कर न देखना ही पवित्र दृष्टि बनाए रखने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। किसी स्त्री का ध्यान व स्मरण कदापि न करो। स्त्रियों के कोई चित्र किंवा मूर्ति भी कभी न देखो, फिर स्त्रियों की ओर देखना तो दूर रहा ! यदि किसी स्त्री का ध्यान आवे तो तत्काल अपने परमात्मा के फोटो का तथा अपनी माता का ध्यान करने लगे। अपनी मां वा ईश्वर को उस स्त्री में देखने लगे। कोई अंग प्रत्यक्ष स्मरण हो तो “उसी तृण” अपनी माँ के उसी अंग प्रत्यक्ष को उसमें स्थापित करो। निःसन्देह तुम्हें अपनी करनी पर अत्यंत लज्जा व घृणा प्राप्त होगी और तुम उस स्त्री का नाशकारी ध्यान करना ही छोड़ दोगे। यदि कोई स्त्री सामने भी आ जाय तो फौरन अपनी दृष्टि नीची कर लो; दृष्टि ऊपर हरगिज़ न उठाओ, और तत्काल मन में, “भगवन्नाम स्मरण” अथवा “माँ” “माँ” “माँ” “माँ” इस महामन्त्र का निरन्तर जप करने लग जाओ, निस्सन्देह तुम्हारी संपूर्ण पापमय वासनायें दग्ध हो जाँयगी और मन पूर्णतया पवित्र बना रहेगा। मातृनाम पवित्र है, मातृनाम का जप इतना श्रेष्ठ है कि कु-चिन्ता उसके पास आ ही नहीं सकती। अवश्य अनुभव कीजियेगा; परम उद्धार होगा। यदि किसी स्त्रीसे बातचीत करने का प्रसंग ही आवे, तो बहुत कम बातचीत करो और उन्हें “हे वहन, हे माँ” इत्यादि पवित्र नामों से सम्बोधित करो। परन्तु हमेशा दृष्टि को नीची बनाये रखने की बात कभी मत भूलो; इस बात को अपने हृदय पट पर अंकित कर रखो। स्त्री-समाज में आवागमन सहसा न करो। स्त्रियों से एकान्त में बात चीत करना
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❁ प्रत्यक्ष्य ही जीवन है ❁
सर्वथा त्याग दो । क्योंकि वैसा करना स्त्री-पुरुष दोनों के लिये हानिकर व नाशकर है । भरद्वास वामन कहते हैं :—
यदपि मात भगिनी सुता तऊ न घैठे पास । प्रवला हैं ये इन्द्रियाँ करो न तुम विश्वास ॥
श्री लक्ष्मणजी की तरह प्रत्येक स्त्री को स्त्री जगन्मनी जानकीजी का ही रूप समझ कर, मातृभाव से उसे मन ही मन प्रणाम करो और “सिया रामसय रुच जग जानी”—ऐसा पवित्र चिन्तन करने लगे ।
स्त्रियों को “पर नर तात समान” ऐसी शुद्धदृष्टि रखनी चाहिये निस्सन्देह उद्धार होगा । मातृ-चिन्तन या ईश्वर-चिन्तन यह विषयचिन्तन को मिटाने की एक घड़ी ही उत्कृष्ट दवा है । आप भी इसका सेवन कीजिये और अपना उद्धार कर लीजिये । जब तक हमारी दृष्टि वन्द है, हम निद्रित हैं, तब तक वगल में पड़े हुये महा विपथर काले सांप से भी हम नहीं डर सकते; पूर्ण निर्भय बने रहते हैं । परन्तु दृष्टि पड़ते ही उसका कितना भयंकर परिणाम होता है यह तत्काल स्पष्ट दिखाई देता है । वैसे ही जब तक किसी स्त्री की ओर हम पलक उठा के नहीं देखेंगे, उसका मुँह काला है या गौरा है ऐसा नहीं जानेंगे, तब तक यदि प्रत्यक्ष हमारे सामने उर्वशी भी आ के खड़ी क्यों न हो जावे तो वह भी हमें एक रत्नी भर डिगा नहीं सकती; हमारे चित्त को विचलित नहीं कर सकती । परन्तु दृष्टि जाले ही नष्टदृष्टि पतिंगे की तरह, उस मनुष्य के बाहर-भीतर आग लग जाती है । श्रीमान शंकराचार्य कहते हैं—
❁ पवित्र-मातृभाव-दृष्टि ❁
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दोषेण तीव्रो विषयः कृष्ण सर्प विषादपि । विषं निहन्ति भोक्त्वा दृष्ट्वा चक्षुषाप्यहम् ॥ १ ॥ —विवेक चूडामणि ।
अर्थात्:—काले सांप के विष से भी बढ़कर विषय-जन्य विष अत्यन्त भयानक है। विष तो पी लेने पर मनुष्य मरता है परन्तु यह विषय-विष इतना उग्र है कि केवल उसकी ओर देखने मात्र ही से मनुष्य थूल में मिल जाता है ! भक्तदास वासन ने क्या ही ठीक कहा है कि:—
अहि विष तो काटे चढ़े, यह हगवत चढ़ि जाय ।
ज्ञान, ध्यान, बल, धर्म, को प्राण सहित खा जाय ॥ १ ॥
“खी के सारे शरीर में जहर भरा हुआ है” ऐसा कहने की जगह यदि यों कहा जाय कि “सब विष दृष्टि ही में भरा हुआ है” तो बहुत ही यथार्थ होगा। सारा संसार आपको यदि करटक-मय ही मालूम होता हो तो स्वयं अपने पैर में जूता डालकर बाहर निकलना ही आपकी बुद्धिमानी होगी। शिकायत करना निरी मूर्खता है। क्योंकि आप समस्त संसार को निष्कंटक तो नहीं बना सकते हो और न उसे चमड़े से ही ढांप सकते हैं ? उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत को आप नारी-रहित तो बना नहीं सकते हो। हां, अपनी ही पापमय दृष्टि को आप अवश्य पवित्र बना सकते हो। इसी में आपकी बुद्धिमानी है और सद्गति है। खी जाति पर व्यर्थ कुत्सित कटाक्ष करना निरी मूर्खता है। अतः दृष्टि को नीची रखने ही से हम विषय के हल्लाहल विष से बच सकते हैं। जब तक हम अपनी दृष्टि उठा कर किसी खी पर नहीं डालेंगे तब तक हमारा ब्रह्मचर्य निःसन्देह अटूट बना
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
रहता है, यह अनुभवसिद्ध बात है। आप भी इसका अवश्य अनुभव कीजिये, निस्सीम कल्याण होगा।
एक बार शेष जी बीमार पड़े। बहुत दवा की परन्तु आराम नहीं हुआ। अन्त में धन्वन्तरी ने शेष जी की आँखें वाँधीं और फिर दवा दी। तब बहुत जल्द ठीक हो गये। मित्रों ! शेष जी के नेत्र क्यों बांधे गये, जानते हो ? सुनो, जब तक शेष जी के नेत्र खुले थे तब तक उनके नेत्रों से निकलने वाली विषमयी ज्वालाओं से सब औषधि विलकुल विष बन जाती थी; अमृतवल्ली भी विषवल्ली बन जाती थी। नेत्र जब बांधे गये तभी दवा दवा बनी रही और वे चंगे हो गये। इसी प्रकार जब तक हम अपनी विषयपूर्ण पापी दृष्टि को बन्द अर्थात् नीची नहीं करेंगे तब तक सात जन्म में हमारा सुधार नहीं हो सकता। अतः चंचल चिन्त वालों को पर-खी की ओर देखना एकदम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग ही देना चाहिये। जो गण करके इसके अनुसार चलेगा, उसको अवश्य ही मेवा मिलेगा। उसका अवश्य ही उद्धार होगा और जो मोह वश पर-खी की तरफ़ ताकेगा उसको उसका ही निर्मित पाप-रूपी पिशाच अवश्य ही खा डालेगा। विषयी दृष्टि को बन्द करने से—किसी खी की ओर विलकुल न ताकने से—पापी से पापी मनुष्य भी बहुत जल्द सुधार सकता है। नीची अर्थात् नम्र दृष्टि ही से मनुष्य ऊँचा से ऊँचा बन सकता है। जो गीध या ऊँट की तरह किसी खी की ओर गर्दन उठा के वा घुमा के ताकेगा वह फौरन नरककुंड में जा गिरेगा। नीच पुरुष सती स्त्रियों की ओर भी पाप की ही दृष्टि से देखा करते हैं। भला ऐसे नारकी पुरुषों का कैसे भला हो सकता है? भक्तदास वामन कहते हैं:—
❁ पवित्र-सातुभाव-दृष्टि ❁
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“चटक मटक नित कुमति बन तकत चलत चहुँ और । वामन ! ऐसे अधम नर पड़े नरक में घोर ॥
ऋष्यमूक पर्वत पर जब श्री सीता देवी के गहने श्री लक्ष्मणजी के सामने जांचने के लिये रखे गये तब श्री लक्ष्मणजी क्या ही उत्कृष्ट उत्तर देते हैं:—
“नाहं जानामि केयूरं नाहं जानामि कुरुडले । नृपुरेत्यभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्” ॥१॥
“इन सब गहनों में केवल नृपुर ही मेरे पहिचान के हैं जो कि रोज वन्दन करते समय मैं श्रीसीता माता के चरणों में देखता था । इन केयूर कुरुडलों को और अन्य गहनों को मैं नहीं जानता हूँ । क्योंकि चरणारविंद को छोड़ कर मैंने दृष्टि उठाकर कभी ऊपर देखा ही नहीं !” अहह ! धन्य है श्री लक्ष्मणजी, आपकी यह आदर्श-शिक्षा ! यही कारण था कि आप चौदह वर्ष पर्यन्त श्रीसीतादेवी जैसी त्रैलोक्य सुन्दरी के साथ रहते हुये भी अपना ब्रह्मचर्य का अटूट पालन कर सके और मेघनाद जैसे प्रवल शत्रु को मार सके । मेघनाद तो केवल ‘हन्द्रीजीत’ ही था, परन्तु आप उससे भी बढ़कर ‘इन्द्रिय-जीत’ थे । श्रीमच्छङ्कराचार्य कहते हैं, “जितं जगत् केन ? मनो हि येन !” सत्य है, एक मात्र ‘इन्द्रियजीत’ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्य को जीत सकता है !
भाइयो ! तुम भी अपनी दृष्टि श्रीलक्ष्मणजी की तरह पवित्र बनाओ । प्रत्येक स्त्री के सामने दृष्टि को सदैव नीची ही रखो और मन में ईश्वर का चिन्तन वा “माँ, माँ, माँ,” इस पवित्र महा मंत्र का अटूट जप शुरू कर दो । तब ही तुम ब्रह्मचर्य का
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
सच्चा पालन कर सकेंगे और कामरूपी मेघनाद को निश्चयपूर्वक मार सकेंगे। सारांश यह कि किसी स्त्री की ओर न देखना ही ब्रह्मचर्य-रक्षा का परम श्रेष्ठ रहस्य है—उपाय है।
“सादी रहन-सहन”
नियम तीसरा :—
वक्तव्यः—ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये हमें अपना जीवनक्रम 'Simple living and high thinking' यानी “सादा वर्तव और ऊँचा ख्याल” इस सद्गुणदेश के अनुसार अत्यन्त सीधा-सादा प्रकार का रखना होगा; क्योंकि सादापन ही बड़पन का चिह्न है, बल्कि रहस्य है। Simpleness is itself greatness संसार में आज तक जितने महापुरुष हुए हैं वे सब सादी ही रहन-सहन से हुए हैं। अधिक सुख-भोग की सामग्री से घिरे रहना मानों अपने को व्यभिचारी ही बनाना है। श्रद्धार से कामदेव जागृत होता है। विलासप्रियता से तन, मन, धन, तीनों बरबाद हो जाते हैं। पेश-आराम का चसका ही मनुष्य को धूल में मिला देता है। आराम-तलव मनुष्य को कामरिपु पटक पटक कर मारता है। यही कारण है कि गरीबों से धनी लोग विशेष कामी और विशेष दुःखी रहते हैं। नखरेबाजी से मनुष्य आतिशबाजी की तरह बिलकुल जल उठता है। नकाशीदार लोटा या गिलास में जैसे सर्वत्र मैल भरा रहता है, उसी प्रकार नखरेबाज स्त्री-पुरुषों में भी काम, क्रोध, अहंकारादि मैल विशेष भरा रहता है। सत्पुरुष कहते हैं :—
❁ सादी रहन-सहन ❁
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भीतरसों मैलो हियो, बाहर रूप अनेक । नारायण तासों भले, कौआ तन मन एक ॥
खुद “न-खरा” शब्द ही मनुष्य की खोटी चाल को सावित कर रहा है । विशेष सज-धज करना, ऊँचे ऊँचे और रंगे-विरंगे भड़कीले व कामोत्तेजक कपड़े पहिनना, अपने हाथ अपने गले में मालाये पहरना, अंग में और बालों में सुगन्धित तैल, इत्र आदि लगाना, नेकट्राई, कॉलर, रिस्टवाँच से अपने को सवॉरना, बार बार शीशे में सूरत देखना, पान से मुँह लाल करना,—ये सब ब्रह्मचर्य के लिये काल के समान हैं । परन्तु शोक की बात है कि कई सयाने माता-पिता खुद अपने ही हाथ से, अपने बच्चों को इन विषय-अवृत्तिकर बातों में फँसा रहे और इस प्रकार अपने बच्चों को विगाड़ रहे हैं । भला ऐसे लोग विषय को कैसे जीत सकते हैं ? “कहत कवीर सुनो भाई साधो, ये क्या लड़ेगे रण में ?” यदि हमारे ईर्द-गिर्द शृङ्गारपूर्ण सामग्री न हो तो आत्मसंयम के कामों में बहुत ही सहायता मिल सकती है और हम बड़ी आसानी से आत्मसंयम कर सकते हैं । पास में खाने के लिये होने पर जैसे बराबर फूठी ही भूक लगती है, वैसे ही विलासी वस्तुओं और व्यक्तियों से घिरे रहने पर मन में काम भी बराबर जाग उठता है । ऐसा करना असंशयतः अपने भले मन को और भी विगाड़ना है; आग में तेल डालना है; वास्तव में यह भी एक प्रकार का छिपा कुसंग है । अतः इन सब भोग-विलास की बातों से सदैव दूर रहो । सादी रहन-सहन अथवा भोग-विलास से विरक्ति ही ब्रह्मचर्य-रक्षा का सहज उपाय है । सादगी ही
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
जीवन है और सजावट ही नाश है, यह तत्त्व पूर्णरीति से ध्यान में रखो ।
“सत्संगति”
नियम चौथा :—
सत्संगत्वे निःसंगत्वं निःसङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलत्वं निश्चलत्वे जीवन्मुक्तः ॥
—श्रीमच्छङ्कराचार्य ।
“सत्सङ्ग से निःसङ्ग ( Non-attachment ) की प्राप्ति होती है; निःसङ्ग से निर्मोहत्व अर्थात् विषय से अप्रतीति बढ़ती है; निर्मोह से सत्य का पूरा ज्ञान व निश्चय होता है और सत्त्व के निश्चल ज्ञान से मनुष्य जीवन्मुक्त होता है अर्थात् इस संसार से तर जाता है ।”
वक्तव्यः—संसार में ‘आत्मोन्नति’ के लिये जितने साधन मौजूद हैं उन सब में सत्संग सब से श्रेष्ठ उपाय है । ‘सत्संग’ यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । सत्संग में संसार की तमाम उत्ततिकर बातों का समावेश होता है । जैसे पवित्र व ऊँचे विचार करना, पवित्र व मीठे वचन बोलना, पवित्र वचन सुनना, पवित्र भोजन करना, पवित्र स्वदेशी कपड़े पहनना आदि अनन्त बातों का समावेश होता है और ‘कुसंग’ में संसार की तमाम स्वपरनाशकारी बातों का समावेश होता है । सत्संग से मनुष्य देवता बनता है और कुसंग से मनुष्य राक्षस बन जाता है । भक्त तुलसीदास जी पूछते हैं “को न कुसंगति पाय नसाई ?” सच है, कुसंग से आज तक
❁ सत्संगति ❁
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बड़े बड़े शीलवान, गुणवान, और होनहार बालक-बालिकायें तथा स्त्री-पुरुष धूल में मिल गये हैं । कुसंग का प्लेग महान् भयानक होता है । जंगली जानवर का वा काले साँप का भी साथ बहुत अच्छा है; उससे मनुष्य की केवल मृत्यु ही होगी । परन्तु दुर्जन का संग महान् दुर्गतिकर है; वह मनुष्य को नीच योनियों में व नरक में ही डालने वाला है । पण्डित विष्णु-शर्मा कहते हैं:—
“वरं प्राणत्यागो न पुनरधमानासुपगमः ।”
“प्राण त्याग देना अच्छा है परन्तु नीचों के पास जाना तक घुरा है ।” “जैसा संग वैसा रंग” यही प्रकृति का कायदा है । धुवों के संग से सफेद मकान भी काला पड़ जाता है । लता में का कीड़ा लता ही के तुल्य हरा बन जाता है । वैसे ही दुर्जन के साथ मनुष्य भी दुर्जन बन जाता है और सज्जन के साथ सज्जन । “कामी के संग काम जागे पै जागे” “कायर के संग शूर भागै पै भागै” “काजर की कोठरी में कैसोहू सवानो घुसो, एक रेख काजर की लागै पै लागै ।” कवि का यह कथन अक्षरशः सत्य है । नीच पुरुष अपने ही तुल्य अपने मित्रों को भी नीच, पापी और दुर्गत्मा बना डालते हैं और सत्पुरुष अपने ही जैसे अपने मित्रों को भी पुर्यात्मा महात्मा बना देते हैं ।
सत्संग की महिमा अपरंपार है । सत्संग से मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति होती है और कुसंग से नरक की प्राप्ति होती है । सत्संग की महिमा और कुसंग की अधमता किसी से छिपी नहीं है । कुसंग से मनुष्य जीते जी ही नरक का सा अनुभव करने लग जाता है । इसी कारण से गोस्वामी जी कहते हैं—“वरु भल वास नरक
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
कर ताता, दुष्ट संग जनि देहि विधाता ।” अतः कल्याण चाहने वालों को कुसंग को एक दम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग देना चाहिये और सत्सङ्ग को प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये । कुमित्रों से मिश्ररहित रहना ही लाख गुना श्रेष्ठ है; क्योंकि कुसंग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों मटियामेट हो जाते हैं और अन्त में महान् अधोगति होती है । परन्तु सत्संग से चारों पुरुषार्थ अनायास सध जाते हैं । याद रक्खो, राजपाट, गज, वाजि, धन, स्त्री, पुत्रादि सब कुछ मिलेंगे, परन्तु सत्सङ्ग मिलना परम दुर्लभ है । “विनु सत्सङ्ग विवेक न होई, राम कृपा विनु सुलभ न सोई ।”—यह गोस्वामी जी का वचन अक्षर अक्षर सत्य है । मोक्ष के सब साधन एक तरफ और सत्सङ्ग एक तरफ दोनों में सत्सङ्ग का ही दर्जा बहुत ऊँचा है ।
“तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग । तुलै न ताही सकल मिलि, जो सुख लव सरसंग ॥
सच है, “शठ सुधरहिं सत्संगति पाई” कैसे ? तो जैसे “पारस परसि कुधातु सुहाई ।” यह नितान्त सत्य है कि “सम्पूर्ण दुराचार और व्यभिचार की जड़ एक मात्र कुसंगति ही है ।” अतः ब्रह्मचारियों को तथा अभ्युदयेच्छुओं को चाहिये कि कभी भी जीभ से बुरी बात न कहे, कान से बुरी बात न सुनें (जैसे कजली होली की गालियां व भद्रे भद्रे गीत आदि), आंख से बुरी चीज़ न देखें (जैसे नाटक, तमाशा, सिनेमा, नाचवाली रामलीला, भद्दी चीज़ इत्यादि), पैर से बुरी जगह न जायें, हाथ से बुरी चीज़ न छुवें और मन से विषय-चिन्तन हरगिज़ न करें । वस्त्रिकुम्भावों को
❁ सत्संगति ❁
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नष्ट करने वाला परमात्मा का ही शुभचिन्तन व ध्यान हमेशा करें। वस, फिर तुम महात्मा ही हो और तुम्हें यहीं पर सच्चा स्वर्ग है।
एक समय भगवान् विष्णु ने राजा बलि से पूछा कि “तुम सज्जनों के साथ नरक में जाना पसन्द करोगे या दुर्जनों के साथ स्वर्ग में ?” बलि ने तत्काल उत्तर दिया कि “मैं सज्जनों के साथ नरक में ही जाना पसन्द करूंगा।” पूछा, “क्यों ?” तब जवाब मिला, जहाँ पर सज्जन है, वहीं पर स्वर्ग है और जहाँ पर दुर्जन हैं वहीं पर नरक है। दुर्जन पुरुष स्वर्ग को भी नरक बना छोड़ते हैं और सज्जन पुरुष नरक को भी स्वर्ग बना देते हैं। सत्पुरुष जहाँ जायेंगे वहीं पर स्वर्ग बन जाता है।
“सत्संगः परमं तीर्थं सत्संगः परमं पदम् ।
तस्मात्सर्वं परित्यज्य सत्संगं सततं कुर्व ॥”
सत्संग ही परम पवित्र तीर्थ है। सत्संग ही श्रेष्ठतम पद अर्थात् मोक्ष है। इस लिये सब छोड़ छोड़ कर काया वाचा मनसा नित्य सत्संग का ही सेवन करो। जब जब चित्त में नीच विषय विकार उत्पन्न हों, तब तब उस परिस्थिति का एक दम त्याग कर, सत्पुरुषों या सुमित्रों के पास तुरन्त जा बैठो। वहाँ जाते ही तुम्हारी सम्पूर्ण नीच वृत्तियाँ तत्काल दब जायंगी और मन व तन दोनों शान्त व पवित्र बन जायेंगे, यह स्वानुभव सिद्ध बात है। आप भी इसका अनुभव कर अपना उद्धार कीजिये।
एकान्तः—जिनके चित्त में कुविचार उत्पन्न होते हों, ऐसे दुर्बल चित्त वाले व्यक्तियों को एकान्तवास कदापि न करना चाहिये। उन्हें सदा इष्ट-मित्र, माता-पिता, भाई इनके समीप ही रहना चाहिये; इसी में कल्याण है।
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“सद्ग्रन्थावलोकन”
नियम पाँचवाँ :—
वक्तव्यः—जहाँ सन्मित्र व सज्जन-संगति दुर्लभ हो वहाँ सद्ग्रन्थ-रूपी सज्जनों और मित्रों की संगति करन चाहिए। सद्ग्रन्थों द्वारा हम संसार के एक से एक महात्मा की संगति रात-दिन कर सकते हैं और उनसे जब चाहें तब तथा जितने मरतबे चाहें उतने मरतबे वार्तालाप कर सकते हैं और अपना ‘यथेष्ट’ समाधान कर सकते हैं। “सद्ग्रन्थ इस लोक के चिन्तामणि हैं। सद्ग्रन्थों के पठन-पाठन से सब कुचिन्तार्यें मिट जाती हैं, संशय-पिशाच भाग जाते हैं और मन में सद्भाव जागृत होकर परम शांति प्राप्त होती है। ज्ञानाग्नि से मनुष्य का सब पाप जल जाता है और मनुष्य पापात्मा से पुण्यात्मा और व्यभिचारी से ब्रह्मचारी बन जाता है। ज्ञानानन्द के सामने विषयानन्द फीका पड़ जाता है। बिना सिद्धान्त-वाक्यों के श्रवण किये किसी का आचरण कदापि शुद्ध नहीं हो सकता। श्रवण की महिमा अपरम्पार है। बिना देखे और सुने किसी का उद्धार आज तक न हुआ है, न होगा।
अतः हमें रोज़ प्रातःकाल और सायंकाल किसी पवित्र ग्रन्थ का पवित्रता और एकग्रतापूर्वक, शुद्ध जगह पर बैठ कर, थोड़ा ही नियमित पाठ करने का नियम बांध लेना चाहिये। पाठ को शान्ति और प्रसन्नता-पूर्वक पूरा किये बिना अत्र ग्रहण नहीं करेंगे—ऐसा एक निश्चय कर लेना चाहिये। इस प्रकार निश्चय कर लेने से मनुष्य के भीतर एक अद्भुत देवी शक्ति जागृत होती है, जो कि उसे उन्नति के शिखर पर पहुँचा देती है।
❁ सद्ग्रन्थावलोकन ❁
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गीता वा रोमयण का पाठ करना अत्यन्त उपकारी होगा। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये योगवाशिष्ठ, वैराग्यमुमुक्षुप्रकरण, उपदेशरत्नाकर, ज्ञान वैराग्य प्रकाश, श्रीरामकृष्ण, शंकराचार्यकृत प्रश्नोत्तरमणिमाला, दासबोध,—ये पुस्तकें अति ही उपकारी हैं। इनका नित्य पाठ करना चाहिये। जैसे एक ही अन्न और जल रोज़ खाया और पिया जाता है, वैसे ही जो कुछ पढ़ा है उसे ही बराबर पढ़ना और उसका खूब मनन करना चाहिये, इसी में हमारा उद्धार है।
उपन्यासः—उपन्यासादि शृङ्गार रसपूर्ण ग्रन्थ पढ़ना मानों अपने हाथ अपने मकान में दियासलाई लगाना है। शृङ्गारी पुस्तकें बड़े ब्रह्मचारी को भी व्यभिचारी बना देती हैं, अच्छे अच्छे सच्चरित्र बालक बालकायें भी कुग्रन्थों के पठन और श्रवण से दुश्चरित्र बन गयी हैं। अतः कुग्रन्थों का सर्वदा त्याग करो, अच्छे ग्रन्थों का पता अपने सुमित्रों और भाइयों से पूछो। मूर्खता से कोई कुग्रन्थ न पढ़ बैठो। कुग्रन्थ पढ़ना और विष खा लेना दोनों समान है अतः जिन्हें नोच पुरुष न बनना हो, जिन्हें महापुरुष बनना हो, उन्हें चाहिये कि वे आग्रहपूर्वक महापुरुषों के चरित्र-ग्रन्थ पढ़ें।
चरित्र-ग्रन्थः—चरित्र ग्रन्थों के पढ़ने से बड़े बड़े पापात्मा भी पुण्यात्मा बन गये हैं। सुदों में भी जीवन फूँक देते हैं, महापुरुष के चरित्र-ग्रन्थ इस लोक के लिये चैतन्यामृत हैं। अतः जो अपना उद्धार चाहते हैं वे नित्य-प्रति धर्म-ग्रन्थ नीति-ग्रन्थ चरित्र-ग्रन्थ आदि पढ़ें पढ़ाये, सुने, सुनाये क्योंकि सद्ग्रन्थ ही धार्मिक-जीवन का भोजन है। सद्ग्रन्थ ही इस लोक के तारक मंत्र हैं। और कुग्रन्थ ही काल के सारक यंत्र हैं।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
“घर्षण-स्नान”
नियम छटा:—
वक्तव्य:—ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये मन का और वाणी का पवित्र रहना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि गन्दे शरीर से मन भी गन्दा बन जाता है। गन्दगी रोग का घर है। जो पुरुष रोगी है वह कभी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। पुनः रोगी शरीर से दीन और दुनियां दोनों डूब जाते हैं। अतः शरीर को सदा शुद्ध व बलिष्ठ बनाये रखना प्राणि मात्र का सब से प्रथम और मुख्य कर्तव्य है।
एक समय हमारी तरफ एक मनुष्य मोहरूम में शेर बनाया गया था। शरीर में वारनिश मिलाया हुआ पीला रंग सर्वत्र पोंत दिया गया था। दिन भर खेला-कूदा और रात को घर लौटा। थकावट के कारण जल्दी सो गया। सूर्योदय हुआ। ८-९ बजने पर भी नहीं उठा, तब लोग घबड़ा गये। पुकारने पर भी जब नहीं बोला तब लोगों ने किवाड़ तोड़ डाले और क्या देखते हैं कि वह मुर्दे की तरह अचल पड़ा है। तुरन्त डाक्टर को बुलाया। डाक्टर ने आते ही फौन उस शेर को टारपेन तेल, गरम पानी और साबुन से खूब रगड़ कर साफ किया। जब उस मनुष्य का शरीर स्वच्छ हुआ, चमड़े के सब छिद्र जब साफ खुल गये, तब कहीं १५ मिनट के बाद उसने गहरी सांस ली और आँखें खोलीं। अन्त में वह चंगा हो गया। इस दृष्टान्त से यह सिद्ध हुआ है कि नाक और मुँह से भी हमारे शरीर का चमड़ा कहीं अधिक साँस लेता है। चमड़े के छिद्र बन्द होने से नाक और मुँह खुले रहते
❁ धर्पणस्नान ❁
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हुएँ भी हम जी नहीं सकते । अतएव प्रत्येक स्त्री पुरुष को चाहिये कि वह शरीर की स्वच्छता में कभी आलस्य न करे, धर्पण-स्नान रोज किया करे । धर्पण-स्नान से त्वचा के सब छिद्र खुल जाने के कारण भीतर के असंख्य दूषित पदार्थ पसीने के रूप में बड़ी आसानी से बाहर निकल जाते हैं और बाहर की शुद्ध हवा भीतर जाने से शरीर निरोग बन जाता है । धर्पण-स्नान से मनुष्य अधिक तेजस्वी, निरोग, निर्विकारी, ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी सहज में बन सकता है; और गन्दापन से वह रोगी, विकारी, आलसी, विपयी और अस्पायु बन जाता है । सब जगह पवित्रता ही जीवन है व अपवित्रता ही मृत्यु है । हम लोग अक्सर काक-स्नान ( कौआ-स्नान ) किया करते हैं । शिर पर १०—५ लोटे पानी डाल लिये और हो गया स्नान ! शरीर मलने से कुछ मतलब नहीं । लेखक ने तो एक मनुष्य को केवल एक ही लोटे पानी में स्नान करते हुए देखा है । यह बहुत ही बुरा है । नतीजा यह होता है कि, शरीर में का जहर बाहर नहीं निकलने पाता । पाखाना साफ नहीं होता है, जठराग्नि मन्द होने से खाना भी नहीं पचता, सदा अपच हुआ करता है । फिर भीतर के जहर को परम दयालु प्रकृति माता खुजली, दाद, फोड़ों के रूपों में शरीर के बाहर निकालने लगती है । रोग प्रकृति की स्पष्ट सूचनायें हैं और मनुष्य की दुर्गुप्तगी के अन्तिम इलाज हैं । इतने पर भी मनुष्य होश में न आये तो द्वार में इन्तजार करती हुई मृत्यु उसे चट से अपनी गोद में ले लेती है ।
धर्पण-स्नान की शास्त्रीय विधि:—स्नानके लिये प्रातःकाल सबसे अच्छा समय है । प्रातःस्नान से सब दिन बड़े आनन्द से बीतता
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
है और आलस्य नष्ट होकर सम्पूर्ण शरीर चैतन्यमय बन जाता है। अतएव स्नान सूर्योदय के पहले ही कर लेना चाहिये, जाड़े और वरसात में ८-१० या १५ मिनट और गर्मी में पूरा आधा घण्टा तक, जब तक कि मस्तिष्क पूरा ठण्डा न हो तब तक स्नान अवश्य करना चाहिये। स्वप्न-द्रोप से पीड़ित मनुष्य को तो शाम को भी दुबारा नहाना चाहिये। जहाँ तक हो, ताजा और स्वच्छ शीतल जल मस्तिष्क पर खूब डालना चाहिये। स्नान के लिये कूप का जल सब ऋतुओं में अनुकूल होता है; जाड़े में गर्म और गर्मी में सर्द होता है। स्नान से लिये कूप में से जल अपने ही हाथ खींचो उससे सीना और दण्ड पुष्ट हो जाते हैं। जाड़े में स्नान के पहले १०-१२ दण्ड और २५-३० बैठक लगा लेने से जाड़ा नहीं मालूम होगा। परन्तु वर्षण-स्नान में जोर से रगड़ने से जो कुछ व्यायाम होता है, उससे शरीर में काफ़ी गर्मी आ जाती है। स्नान के लिये पानी सदा ताजा, स्वच्छ व विपुल रहे, इस बात का स्मरण रहे। स्नान के पहले सब शरीर को सूखे तौलिया से व खुरखुरे बल्ब से (मुलायम से नहीं) खूब जोर से रगड़ो; रगड़ने में कुछ कमी न करो और कुछ डरो भी मत। पर हाँ उचित जगह पर उचित जोर लगाओ, नहीं तो मारे रगड़ो के आँख ही फोड़ लोगे। तौलिया से रगड़ने के बाद हाथ से रगड़ो। हाथ के रगड़ने से शरीर में एक विजली पैदा होती है। जो कि शरीर के तमाम रोगों को हटाती है। इस कारण शरीर का प्रत्येक अवयव अच्छी तरह से रगड़ना चाहिये। जहाँ संधर्षण न होगा उतनी ही जगह कमजोर और रोगी बनी रहेगी, यह बात ध्यान में रखो। पेट को ठीक रगड़ने से पेट के अनन्त विकार नष्ट होते हैं और पाखाना भी सांफ़ होता है।
❁ घर्षण-स्नान ❁
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स्नान के लिये बैठने पर गर्दन मुकाकर सब से पहिले एक-दो लोटे जल से शिर भिगोओ । यदि मस्तिष्क प्रथम न भिगोया जाय तो नीचे की तमाम गर्मी दिमाग में चढ़कर बड़ी ही हानि करेगी, स्मरणशक्ति नष्ट कर देगी, आँख की ज्योति विगाड़ देगी, मन में काम विकार प्रबल होंगे और स्वास्थ्य भी नष्ट हो जायगा । इस ही कारण “न च स्नायाद्विनाशिरः ।” सब से प्रथम बिना शिर को भिगोये व धोये स्नान कदापि न करना चाहिये, ऐसी सूत्रमय शाखाशा है । इस शास्त्र-हृत्स्य को न जानने से कारण ही, आज न मालूम कितने ही लोगों को मुफ्त में रोगी और अल्पायु बनना पड़ता होगा । अतएव सावधान रहो । गला, शिर भिगोने के बाद फिर गार के रक्खे हुये तौलिये से क्रमशः हाथ ! कंधे, सीना, पेट, पीठ, कमर, टाँग, पैर वगैरह खूब रगड़ो । फिर शिर पर से सम्पूर्ण शरीर भर में यथेष्ट पानी उड़ेलिये । हाथ से सब अंग फिर से रगड़ो । फिर शरीर भर में पानी उड़ेलो तत्पश्चात् सूखे तौलिया से सम्पूर्ण शरीर को पोंछ डालो । ( शरीर को साफ न पोंछने ही से गीलापन के कारण मनुष्य को अक्सर दाढ़, खुजली वगैरह हुआ करती है और खुजलाते खुजलाते अनेकों लड़कों को बुरी आदतें लग जाती हैं ) फिर धोती याँ ही लपेट कर खुली प्रकाशमय जगह में सूर्य-स्नान अर्थात् सूर्य के किरण शरीर पर लेते हुये थोड़ी देर इधर-उधर टहलो । शरीर पूरा सूख जाने के बाद फिर धोती पहन कर अपने धन्धे में लग जाओ । देखो, एक ही दिन के ‘घर्षण स्नान’ से आपके शरीर में क्या ही उत्साह, आनन्द, फुर्ती और कान्ति दिखाई देती है ! हमारा मुख अन्य भव अवयवों की अपेक्षा जो इतना सुन्दर और तेजस्वी दिखाई देता है, इसका मुख्य कारण