भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ अज्ञान का फल मृत्यु है ❁

[ ६५ ]

“एको ब्रह्म पूर्णं सब जग में, छोड़ कपट की गाँठ गही को ॥ २ ॥

“दुख सुख सो बीती सो बीती, याद न कर ! बरबाद वही को ॥ ३ ॥

“जानकीदास सुमिर श्री रघुवर, गई सो गई, अब राख रही को” ॥ ४ ॥

१७—अज्ञान का फल मृत्यु है

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।

स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्मात् विमुच्यते ॥ १ ॥

“मनुष्य अपने ही कर्म करता है, अपने ही उसके भले-बुरे फल भोगता है, अपने ही कर्म से इस काल संसार में चक्कर लगाता है और अपने ही कर्मों से इन सब से मुक्त भी होता है।” सारांश, आत्मघात वा आत्मोद्धार यह सब अपने ही हाथ में हैं।

श्री मनु महाराज कहते हैं:—“किया हुआ कुकर्म वा अधर्म कभी निष्फल नहीं होता—चाहे जंगल में भाग जाय, पर्वत में छिप जाय, आकाश में उड़ जाय, चाहे पातालमें घुस जाय, कहीं भी पाप कर्मों से छुटकारा नहीं होता ? पाप का भूत सिर पर सदा सवार ही रहता है ! अधर्म का फल जल्दी नहीं मिलता, केवल इसी कारण, अज्ञानी वा मोहान्ध लोग पाप से डरते हैं। परन्तु निश्चय जानो कि वह पापाचरण धीरे धीरे तुम्हारे सुखकी जड़ों को बराबर काटता ही चला जा रहा है।”