ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ वीर्य का प्रचण्ड प्रताप ❁
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हैं परन्तु हमारे पूर्वज विमानों को मंत्र से भी चलाते रहे होंगे ! श्री भीष्मपितामह श्रीपरशुरामजी और ययातिपुत्र, इन्होंने अपने पिताओंके लिये और अनेकों ऋषि-कुमारों ने केवल परोपकारार्थ—दूसरों के लिए ब्रह्मचर्य को धारण किया था। परन्तु आज हमारी ऐसी स्थिति हो गई है कि हम खुद अपने ही उपकार के लिये ब्रह्मचर्य को नहीं पाल सकते ! भला इससे बढ़ कर हमारे 'आत्मिक पतन' का और सुस्पष्ट व पुष्ट प्रमाण दूसरा कौन सा हो सकता है। निर्वीर्य पुरुष को सभी बातें असंभव सी जान पड़ती है। फलतः ब्रह्मचारी पुरुष के लिये संसार में तो क्या परन्तु त्रिमुवन में भी कोई बात असंभव व अप्राप्य नहीं है। श्री भगवान् शंकर कहते हैं—
सिद्धे धिन्दौ महायत्ने किंन सिद्धयति भूतले ।
यस्य प्रसादान्महिमा ममाप्ये तादृशो भवेत् ॥ १ ॥
अर्थात्—“महान् परिश्रमपूर्वक विन्दु को साधने वाले अखण्ड ब्रह्मचारी के लिये त्रिमुवन में भी ऐसी कोई वस्तु नहीं है, कि जो असंभव व असाध्य हो। ब्रह्मचर्य के प्रताप से मनुष्य मेरे ही तुल्य अर्थात् ईश्वर तुल्य ही सर्वत्र बन्दनीय व पूजनीय बन जाता है।”
वस हो गया ! इससे बढ़ कर ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णन करना मानवी शक्ति के बाहर है। ब्रह्मचर्य की महिमा अपरंपार है। केवल सच्चे ब्रह्मचारी ही ब्रह्मचर्य की अद्भुत महिमा का अनुभव कर सकते हैं।
अतः भ्रातृ-भगिनी-मित्रगण ! तुम भी ब्रह्मचर्य का शक्तिभर पालन कर उसके प्रचण्ड शक्ति की दिव्य छटा अनुभूत करो। यद्यपि तुम्हारे हाथ से आज तक बहुत कुछ अपराध हुए हैं, तो