भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

एक तरफ चारों वेदों का पुराय और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य का पुराय, दोनों में ब्रह्मचर्य ही का पुराय विशेष है ।

ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही श्री भीष्मपितामह के सामने उनके महान प्रतापी गुरु परशुरामजी को हार माननी पड़ी । इतना ही नहीं किन्तु श्रीकृष्ण भगवान् को भी उनके सामने अपना प्रण भूल कर आखीर में मुक ही जाना पड़ा ! अहा ! कहते रोवें खड़े हो जाते हैं ! श्री हनुमान जी ने एक ही घूँसे से इतने बड़े भारी प्रतापी रावण को बेहोश कर दिया और उसके मुख से खून बहाया । एक ही उड़ान में समुद्र को लीघना, बड़े बड़े पर्वतों को सहज ही में उठा ले आना और काल के भी मुंह में थप्पड़ लगाना, यह किस का सामर्थ्य है ? यह सब अखण्ड ब्रह्मचर्य का ही सामर्थ्य है ! ब्रह्मचर्य से मनुष्य में निस्संशय अद्वितीय ब्रह्मतेज प्रकट होता है, जिसके कारण वह बड़े बड़े अद्भुत कार्य बड़ी आसानी से कर दिखा लाता है । आज तक जो कुछ बड़े बड़े धार्मिक व सामाजिक परिवर्तन हुए हैं वे सब ब्रह्मचारियों ही के द्वारा अथवा ब्रह्मचर्य ही के बल पर हुए हैं ।

वीर्यहीनता के कारण आज हम लोगों में अपने पूर्वजों की अद्भुत शक्तियों में भी सन्देह प्राप्त हो रहा है । क्यों न हो ! हमारे ही सौ वर्ष तक जीवित रहने का यदि हमें सन्देह है, तो फिर ईश्वरीय शक्तियों के लिये सन्देह प्राप्त होना स्वाभाविक बात है ! पुष्पक विमान के लिये भी तो हमें पहले ऐसा ही सन्देह था ? परन्तु आज जब ब्रह्म विमानों को देख रहे हैं तब चुप मार कर सिर हिला कर कहने लगे कि ‘होगा भाई, ये लोग यंत्र से चलावे

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