ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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होती है। इसका क्या कारण ? इसका एक मात्र कारण उसकी वीर्यहीनता ही है। दूसरा एक कोई गरीब का नवयुवक सतेज बालक होता है, परन्तु उसे देखते ही मनुष्य के चित्त में उसके लिये एकाएक स्नेहभाव जागृत होता है। यह किसका प्रताप है ? यह सब वीर्यपुष्टता वा ब्रह्मचर्य का ही दिव्य प्रताप है। सारांश शुक्रसंचय ही स्नेह का एकमात्र आदि कारण है यह बात अक्षर अक्षर सत्य है।
स्वामी विवेकानन्द जब शिकागो ( अमेरिका ) की प्रचण्ड विद्वत्सभा में खड़े हुए, तब वहाँ के समस्त विद्वानों को उन्होंने केवल पाँच ही मिनट में कठपुतलियों की तरह मुग्ध कर लिया। उनकी अच्छी अच्छी युक्तियों को अपनी वाक्शक्ति-प्रवाह में, चरण ही में, वहा दिया और लोगों को अपना पूर्ण व स्थायी भक्त बना लिया। यह किसका प्रताप है ? यह केवल ब्रह्मतेज ही का प्रताप है, जो कि एक मात्र ब्रह्मचर्य ही से प्राप्त हो सकता है और अन्य किसी से नहीं। एक विद्वान आता है तीन घंटे व्याख्यान देता है और लोगों को अपनी वाक्सामर्थ्य से हिला छोड़ता है, पर लोग घर पर जाते ही वह सब भूल जाते हैं। ऐसा क्यों ? यह सब वीर्यहीनता के ही बदौलत ! दूसरा एक ऐसा ही मामूली मनुष्य आता है, दो-चार ही शब्द सुनाता है। परन्तु वे ही दो-चार शब्द मनुष्य आखीर दम तक नहीं भूलता। यह किसका प्रताप है ? यह सब आत्मतेज का अर्थात् वीर्यवत्ता का प्रताप है ! वीर्यभ्रष्ट पुरुष कभी आत्मबली नहीं हो सकता और न वह स्थायी प्रभाव ही डाल सकता है, चाहे वह फिर जटा बढ़ाये हो, चाहे मूँड मुँडाये हो अथवा चारों वेदों का ज्ञाता हो ! कहा है :—“एकतश्चतुरो वेदाः ब्रह्मचर्यं तथैकतः ।”