भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 199 में से

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❧ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❧

“जो कुमार ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यरूपी तपः के तपस्वी हैं और जिन्होंने सुविद्या ( वेद ) से अपने को पवित्र बना लिया है वे ही केवल अद्वुत और कठिन से कठिन कर्मों को कर सकते हैं और इस दुस्तर संसार-सागर से तर सकते हैं।”

ब्रह्मचारी पुरुष सर्वत्र दिग्विजयी होते हैं; उन्हें कभी अपयश नहीं मिलता। सम्पूर्ण अपयश का मूल एक मात्र वीर्यहीनता ही है ! वीर अभिमन्यु का नाश क्यों हुआ ? वह समय में जाने के पहले भारत-वंश विस्तार का “वीज” आरोपण करके गया था। पृथ्वीराज क्यों पकड़ा व मारा गया ? कहते हैं युद्ध में जाते समय उसकी कमर उसकी खी ने कस दी थी ! जो वीर्य को नष्ट करता है, वह हर जगह नष्ट किया जाता है और जो वीर्य को धारता है वही सब जगह विजयी होता है सच्चा ब्रह्मचारी काल का भी काल होता है ! दुश्मन भी उसके सामने कान्तिहीन पड़ जाते हैं। “आत्मिक तेज” जिसको अंग्रेजी में परसनल म्याग्नेटिज्म (Personal Magnetism) अथवा तेजोबल यानी परसनल श्रोरा (Personal Aura) कहते हैं, ब्रह्मचारी में कूट कूट कर भरा रहता है, जिसके प्रताप से लोग उस पर अनायास लट्ट हो जाते हैं। वह जो कुछ कहता है, वही प्रिय व सत्य मालूम देने लगता है। और सब के चित्त में उसके लिये पूज्यभाव पैदा होता है।

एक धनी अच्छे अच्छे कपड़े पहिनता है, चेहरा भी उसका सफेद होता है, पर उसके तरफ देखते ही, हमारा हृदय भी अपराध न करने पर भी, हम में एकाएक उसके लिये तिरस्कार बुद्धि जागृति

❧ ब्रह्मचर्य परंतपः ।” ब्रह्मचर्य ही सब से श्रेष्ठ तपश्चर्या है।

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