भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ वीर्य का प्रचण्ड प्रताप ❁

[ ५९ ]

है वह सब ब्रह्मचर्य का ही प्रताप है । जीवनकला में सौन्दर्य, तेज, आनन्द, उत्साह, सामर्थ्य, असामान्यता, मोहकता अर्थात् आकर्षकत्व व सजीवत्व आदि अनेकानेक उच्च बातों का समावेश होता है । जैसे हाथी के पैर में सभी जीवों के पैर समाते हैं; वैसे ही एक ब्रह्मचर्य ही में सब कुछ आ जाता है । “एकहि साधे सब सधे” ऐसा शक्ति-सम्पन्न साधन यदि विश्व में कोई है तो वह एकमात्र ब्रह्मचर्य ही है । अतः प्रयत्नपूर्वक एकमात्र ब्रह्मचर्य ही को सम्हालो । क्योंकि ब्रह्मचर्य ही सन्पूर्ण शक्तियों का खजाना है ।

जो ब्रह्मचारी है उसमें दैवी तेज कूट कूट कर भरा रहता है । आप की आँखों में जो इतनी ज्योति है वह किसका प्रभाव है ? गाल पर गुलाबी छटा, मुख पर कमनीयता, छाती में अकड़, चाल में फौजी ढव आदि यह किसका प्रताप है ? हास में प्रथम नम्बर रहना, खेल में अमग्रण्य रहना, कुशती में किसी से हार न जाना, बड़े भारी बोझ को सहज ही में उठा लेना, हाथ में लिया हुआ काम पूरा करना, एक शब्द ही से दूसरों को वश में कर लेना, बड़ी बड़ी सभाओं में खड़े होते ही, अपनी सुरीली तथा प्रभावशाली आवाज से बड़े बड़े विद्वानों की अच्छी अच्छी युक्तियाँ, अपनी वाक्धारा प्रवाह में बहा देना, अत्यन्त निर्भयता, साहस तथा हृद निश्चय का होना—यह सब किसका प्रताप है ? निश्चय जानिए यह सब केवल ब्रह्मचर्य ही का अद्भुत प्रताप है ! कुमार अवस्था में सम्हल कर चलने के ही ये सब चमत्कार हैं ।

ये तपश्च तपस्यन्ति कौमाराः ब्रह्मचारिणः । विद्यावेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यपि तरन्ति ते ॥ १ ॥