भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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सारे वाहण तथा क्षत्रिय बनियों या वैश्य बन चले हैं। आज कल सच्चे वाहण अथवा क्षत्रिय मिलते नहीं। सभी रूपये चाहते हैं। वे अपने वर्णों के अनुकूल धर्म का अभ्यास नहीं करते। मनुष्य के पतन का यह मौलिक कारण है। यदि गृहस्थ अपने आश्रम के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करे, यदि वह आदर्श गृहस्थी बने, तो संन्यास लेने की आवश्यकता नहीं है। गृहस्थी अपने कर्तव्य-पालन में विफल हो रहे हैं यही कारण है कि आज संन्यासियों की संख्या बढ़ रही है। गृहस्थ का जीवन उन्नत ही कठिन है जितना कि संन्यास का जीवन। प्रवृत्तिमार्ग अथवा कर्मयोग का मार्ग उतना ही कठिन है जितना कि निवृत्ति मार्ग या संन्यास का मार्ग है।

वाल्यावस्था में बालक तथा बालिका में कोई विशेष अंतर नहीं रहता। कुमारावस्था प्राप्त करते ही उनमें बहुत अंतर उपस्थित हो जाता है। उनके हाव भाव, ढंग, चाल, बात, दृष्टि, गति, गुण आदि में बड़ा अंतर आ जाता है। यद्यपि महिला मृदु अथवा कोमल दिखाई पड़ती है फिर भी वह कोषावस्था में कठोर, कर्कश तथा पुरुषों की भांति बन जाती है। क्रोध, द्वेष तथा धृणा के आवेग में उसकी स्त्रीसुलभ कोमलता नष्ट हो जाती है। स्त्रियों में प्रेम का तत्त्व अधिक है। यदि वे अपने मन को आध्यात्मिक मार्ग में लगावें तो वे सुगमता पूर्वक ईश्वर के दर्शन प्राप्त कर सकती हैं। उनमें स्नेहवृत्ति का अधिक विकास है।

क्रोध, प्रजा तथा सेना के बिना राजा भी क्या राजा है ? सुगन्धि के बिना फूल भी क्या फूल है ? पत्नी के बिना नदी भी क्या नदी है ? उसी प्रकार ब्रह्मचर्य के बिना मनुष्य भी क्या मनुष्य है ? भूल, काम, भय तथा निद्रा—ये मनुष्य तथा जानवरों में समानरूप से पाये जाते हैं। विचार अथवा ज्ञान ही मनुष्य तथा जानवर के बीच भेद लाता है। वर्ण-रक्षण के द्वारा ही विचार तथा ज्ञान संभव है। यदि मनुष्य विचार हीन है तो वह जानवर ही है। जानवरों में भी मनुष्यों से अधिक आराम-

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