ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंयम है। तथाकथित मनुष्य ही विषयवासना में इतना पतित हो चला है। जिस मनुष्य में काम-वृत्ति गहरी गड़ी हुई है वह वेदान्त को कदापि नहीं समझ सकता वह सैकड़ों करोड़ों जन्मों में भी ब्रह्म साक्षात्कार नहीं कर सकता।
पूर्ण भौतिक तथा मानसिक ब्रह्मचर्य की स्थापना ही वास्तविक संस्कृति है। साक्षात्कार के द्वारा जीव तथा परमात्मा के बीच एकता का साक्षात्कार करना ही वास्तविक संस्कृति है। कामुक सांसारिक मनुष्य के लिये 'आत्मसाक्षात्कार', 'ईश्वर', 'आत्मा', 'वैराग्य', 'संन्यास', 'मृत्यु', 'स्मशान'—ये सभी बहुत ही भयावह ज्ञान पड़ते हैं। क्योंकि वह विषयों से आसक्त है। सस्ते शब्द नृत्य, संगीत विलासपूर्ण बातें उन्हें बहुत ही प्रिय हैं। यदि मनुष्य सच्चाई के साथ जगत का मिथ्या स्वभाव का चिंतन करना शुरू करे तो विषयों के प्रति आकर्षण धीरे धीरे क्षीण होता जायगा। लोग कामाग्नि में झुलस रहे हैं। इस भीषण व्याधि को दूर करने के लिये सभी साधनों का प्रयोग करना चाहिये। सभी व्यक्तियों को चाहिये कि वे इस कामरूपी वेशी को नष्ट करने के लिये सभी साधनों का परिश्रम रखें। यदि एक साधना से लाभ न हुआ तो उन्हें दूसरा साधन पकड़ना चाहिये। असंस्कृत मनुष्यों में काम पाशवी वृत्ति है। युद्धता की प्राप्ति तथा सतत ध्यान के अभ्यास से ही ईश्वर साक्षात्कार मिलता है—इसका शान रखते हुये भी वारम्बार उसी पाशवी क्रिया को करते रहने से मनुष्य में लज्जा आनी चाहिये। प्रतिपक्षी जन कह सकते हैं कि इन विषयों को खुले आंख नहानी रखना चाहिये, इन्हें गुप्त रूप से पढ़ना चाहिये। यह गलत है। तथ्यों को छिपाने से क्या लाभ है किंगी यस्त को छिपाना तो पाप है।