भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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द्वारा आप बल तथा आध्यात्मिक शक्ति का विकास करेंगे ! प्रकृति आपकी सर्वोत्तम गुरु तथा पथप्रदर्शक है ।

ब्रह्मचर्य के अभ्यास से कोई-खतरा या रोग या अनिष्ट की आशंका नहीं है जैसा कि पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक “मानसिक प्रनिय” की गलत धारणा रखते हैं । उन्हें इस विषय का व्यावहारिक ज्ञान नहीं है । उनकी यह गलत धारणा है कि अतृप्त लिंग-वृत्ति अनेक मानसिक ग्रन्थ का रूप धारण करती है । “ग्रन्थ” का अन्य कारण है : अत्यधिक ईर्ष्या, भूषा, क्रोध, तिंचा तथा उदासी आदि से उत्पन्न मन की मलिन अवस्था ही इसका कारण है ।

इसके विपरीत थोड़ा भी आत्म संयम अववा थोड़ा भी ब्रह्मचर्य का अभ्यास मनुष्य को शक्ति प्रदान करता है । यह आंतरिक शक्ति तथा मन की शक्ति प्रदान करता है । यह मन तथा स्नायुओं को स्फूर्ति प्रदान करता है । यह शारीरिक तथा मानसिक शक्ति को सुरक्षित रखता है । यह स्मृति, हृच्छ्रशक्ति तथा मानसिक बल को विकसित करता है । यह अत्यधिक बल, वीर्य, तथा शक्ति प्रदान करता है । यह शरीर का पुनर्गठन करता, कोषों का पुनर्निर्माण करता पाचन शक्ति को सवल बनाता तथा जीवन-संग्राम में कठिनाइयों से लोहा लेने के लिए बल प्रदान करता है । पूर्ण ब्रह्मचारी जगत को हिला सकता है । वह प्रभु जीसस की तरह समुद्र की तरंगों को रोक सकता है पर्वतों को नलायमान कर सकता है, शान देव की तरह प्रकृति तथा पंच-तत्त्वों पर आदेश चला सकता है । इन तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे वह प्राप्त न कर ले । सारी सिद्धियां तथा ऋद्धियां उसके चरणों पर लोटती हैं ।

वर्णभूम धर्म तो आजकल समाप्तप्राय हो चला है । प्रत्येक मनुष्य आज अंश अववा बनिया बन गया है—वह भिक्षा, कर्ज, अववा चोरी के द्वारा किसी न किसी तरह धनोपार्जन के लिए लालायित है । प्रायः

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