ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
लिंग तथा अहंकार के अतिरिक्त इस जगत में कुछ है नहीं। अहंकार ही प्रधान वस्तु है। यही आधार है। लिंग तो अहंकार पर ही आश्रित है। यदि विचार द्वारा या—“मैं कौन हूँ ?” के अनुसंधान से अहंकार को नष्ट कर दिया जाय तो लिंग-विचार स्वयंमेव विनष्ट हो जायगा। मनुष्य—जो अपने भाग्य का विधाता है—अपनी दिव्य महिमा को खोनुका है, वह अमानवश लिंग तथा अहंकार का गुलाम बन बैठा है जो अविद्या से उत्पन्न है। आत्मज्ञान का प्रादुर्भाव आत्मा के इन शत्रुओं को विनष्ट कर डालता है। ये ही दो डाकू हैं जो असहाय, अशक्त, मिथ्या जीव या मिथ्या अहं को प्रपीड़ित कर रहे हैं।
हाल के कुछ वर्षों में ही—गत पचास वर्ष—विज्ञान का ध्यान मनुष्यांतरगत लिंग-प्रवृत्ति के स्वभाव तथा उन्नति की ओर आकृष्ट हुआ है। मनोवैज्ञानिक तथा औपधीय विद्यार्थियों ने सभ्य जनता के स्वाभाविक तथा अस्वाभाविक यौन-जीवन के विषय में बहुत ही जाँचपूर्ण खोज की है।
लिंग तथा धर्म के विषयों का निकट संबंध है। सामाजिक प्रगति तथा वैयक्तिक मनोविज्ञान में भी इनका महत्व है। अतः तीनों कालों में समाज के लिए इस विषय की महत्ता प्रमाणित है।
ज्ञान तथा पवित्रता के साथ विषय परायणता नहीं चल सकती। मलों को दूर करना ही जीवन का महान् कार्य है।
विद्युत् कणों में भी ऊँचारे तथा विवाहित विद्युत् कण हैं। विवाहित विद्युत्-कण जोड़ों में रहते हैं; ऊँचारे विद्युत् कण अकेले रहते हैं। ये ऊचारे विद्युत् कण ही चुंबकीय विद्युत्शक्ति का निर्माण करते हैं। विद्युत् कणों में भी ब्रह्मचर्य का शक्ति देखी जाती है। मित्र, क्या आप इन विद्युत् कणों से कुछ पाठ पढ़ेंगे ? क्या ब्रह्मचर्य के अभ्यास के
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