भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

भूमिका

लिंग तथा अहंकार के अतिरिक्त इस जगत में कुछ है नहीं। अहंकार ही प्रधान वस्तु है। यही आधार है। लिंग तो अहंकार पर ही आश्रित है। यदि विचार द्वारा या—“मैं कौन हूँ ?” के अनुसंधान से अहंकार को नष्ट कर दिया जाय तो लिंग-विचार स्वयंमेव विनष्ट हो जायगा। मनुष्य—जो अपने भाग्य का विधाता है—अपनी दिव्य महिमा को खोनुका है, वह अमानवश लिंग तथा अहंकार का गुलाम बन बैठा है जो अविद्या से उत्पन्न है। आत्मज्ञान का प्रादुर्भाव आत्मा के इन शत्रुओं को विनष्ट कर डालता है। ये ही दो डाकू हैं जो असहाय, अशक्त, मिथ्या जीव या मिथ्या अहं को प्रपीड़ित कर रहे हैं।

हाल के कुछ वर्षों में ही—गत पचास वर्ष—विज्ञान का ध्यान मनुष्यांतरगत लिंग-प्रवृत्ति के स्वभाव तथा उन्नति की ओर आकृष्ट हुआ है। मनोवैज्ञानिक तथा औपधीय विद्यार्थियों ने सभ्य जनता के स्वाभाविक तथा अस्वाभाविक यौन-जीवन के विषय में बहुत ही जाँचपूर्ण खोज की है।

लिंग तथा धर्म के विषयों का निकट संबंध है। सामाजिक प्रगति तथा वैयक्तिक मनोविज्ञान में भी इनका महत्व है। अतः तीनों कालों में समाज के लिए इस विषय की महत्ता प्रमाणित है।

ज्ञान तथा पवित्रता के साथ विषय परायणता नहीं चल सकती। मलों को दूर करना ही जीवन का महान् कार्य है।

विद्युत् कणों में भी ऊँचारे तथा विवाहित विद्युत् कण हैं। विवाहित विद्युत्-कण जोड़ों में रहते हैं; ऊँचारे विद्युत् कण अकेले रहते हैं। ये ऊचारे विद्युत् कण ही चुंबकीय विद्युत्शक्ति का निर्माण करते हैं। विद्युत् कणों में भी ब्रह्मचर्य का शक्ति देखी जाती है। मित्र, क्या आप इन विद्युत् कणों से कुछ पाठ पढ़ेंगे ? क्या ब्रह्मचर्य के अभ्यास के

[ आठ ]

द्वारा आप बल तथा आध्यात्मिक शक्ति का विकास करेंगे ! प्रकृति आपकी सर्वोत्तम गुरु तथा पथप्रदर्शक है ।

ब्रह्मचर्य के अभ्यास से कोई-खतरा या रोग या अनिष्ट की आशंका नहीं है जैसा कि पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक “मानसिक प्रनिय” की गलत धारणा रखते हैं । उन्हें इस विषय का व्यावहारिक ज्ञान नहीं है । उनकी यह गलत धारणा है कि अतृप्त लिंग-वृत्ति अनेक मानसिक ग्रन्थ का रूप धारण करती है । “ग्रन्थ” का अन्य कारण है : अत्यधिक ईर्ष्या, भूषा, क्रोध, तिंचा तथा उदासी आदि से उत्पन्न मन की मलिन अवस्था ही इसका कारण है ।

इसके विपरीत थोड़ा भी आत्म संयम अववा थोड़ा भी ब्रह्मचर्य का अभ्यास मनुष्य को शक्ति प्रदान करता है । यह आंतरिक शक्ति तथा मन की शक्ति प्रदान करता है । यह मन तथा स्नायुओं को स्फूर्ति प्रदान करता है । यह शारीरिक तथा मानसिक शक्ति को सुरक्षित रखता है । यह स्मृति, हृच्छ्रशक्ति तथा मानसिक बल को विकसित करता है । यह अत्यधिक बल, वीर्य, तथा शक्ति प्रदान करता है । यह शरीर का पुनर्गठन करता, कोषों का पुनर्निर्माण करता पाचन शक्ति को सवल बनाता तथा जीवन-संग्राम में कठिनाइयों से लोहा लेने के लिए बल प्रदान करता है । पूर्ण ब्रह्मचारी जगत को हिला सकता है । वह प्रभु जीसस की तरह समुद्र की तरंगों को रोक सकता है पर्वतों को नलायमान कर सकता है, शान देव की तरह प्रकृति तथा पंच-तत्त्वों पर आदेश चला सकता है । इन तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे वह प्राप्त न कर ले । सारी सिद्धियां तथा ऋद्धियां उसके चरणों पर लोटती हैं ।

वर्णभूम धर्म तो आजकल समाप्तप्राय हो चला है । प्रत्येक मनुष्य आज अंश अववा बनिया बन गया है—वह भिक्षा, कर्ज, अववा चोरी के द्वारा किसी न किसी तरह धनोपार्जन के लिए लालायित है । प्रायः

[ १० ]

सारे वाहण तथा क्षत्रिय बनियों या वैश्य बन चले हैं। आज कल सच्चे वाहण अथवा क्षत्रिय मिलते नहीं। सभी रूपये चाहते हैं। वे अपने वर्णों के अनुकूल धर्म का अभ्यास नहीं करते। मनुष्य के पतन का यह मौलिक कारण है। यदि गृहस्थ अपने आश्रम के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करे, यदि वह आदर्श गृहस्थी बने, तो संन्यास लेने की आवश्यकता नहीं है। गृहस्थी अपने कर्तव्य-पालन में विफल हो रहे हैं यही कारण है कि आज संन्यासियों की संख्या बढ़ रही है। गृहस्थ का जीवन उन्नत ही कठिन है जितना कि संन्यास का जीवन। प्रवृत्तिमार्ग अथवा कर्मयोग का मार्ग उतना ही कठिन है जितना कि निवृत्ति मार्ग या संन्यास का मार्ग है।

वाल्यावस्था में बालक तथा बालिका में कोई विशेष अंतर नहीं रहता। कुमारावस्था प्राप्त करते ही उनमें बहुत अंतर उपस्थित हो जाता है। उनके हाव भाव, ढंग, चाल, बात, दृष्टि, गति, गुण आदि में बड़ा अंतर आ जाता है। यद्यपि महिला मृदु अथवा कोमल दिखाई पड़ती है फिर भी वह कोषावस्था में कठोर, कर्कश तथा पुरुषों की भांति बन जाती है। क्रोध, द्वेष तथा धृणा के आवेग में उसकी स्त्रीसुलभ कोमलता नष्ट हो जाती है। स्त्रियों में प्रेम का तत्त्व अधिक है। यदि वे अपने मन को आध्यात्मिक मार्ग में लगावें तो वे सुगमता पूर्वक ईश्वर के दर्शन प्राप्त कर सकती हैं। उनमें स्नेहवृत्ति का अधिक विकास है।

क्रोध, प्रजा तथा सेना के बिना राजा भी क्या राजा है ? सुगन्धि के बिना फूल भी क्या फूल है ? पत्नी के बिना नदी भी क्या नदी है ? उसी प्रकार ब्रह्मचर्य के बिना मनुष्य भी क्या मनुष्य है ? भूल, काम, भय तथा निद्रा—ये मनुष्य तथा जानवरों में समानरूप से पाये जाते हैं। विचार अथवा ज्ञान ही मनुष्य तथा जानवर के बीच भेद लाता है। वर्ण-रक्षण के द्वारा ही विचार तथा ज्ञान संभव है। यदि मनुष्य विचार हीन है तो वह जानवर ही है। जानवरों में भी मनुष्यों से अधिक आराम-

[ दस ]

संयम है। तथाकथित मनुष्य ही विषयवासना में इतना पतित हो चला है। जिस मनुष्य में काम-वृत्ति गहरी गड़ी हुई है वह वेदान्त को कदापि नहीं समझ सकता वह सैकड़ों करोड़ों जन्मों में भी ब्रह्म साक्षात्कार नहीं कर सकता।

पूर्ण भौतिक तथा मानसिक ब्रह्मचर्य की स्थापना ही वास्तविक संस्कृति है। साक्षात्कार के द्वारा जीव तथा परमात्मा के बीच एकता का साक्षात्कार करना ही वास्तविक संस्कृति है। कामुक सांसारिक मनुष्य के लिये 'आत्मसाक्षात्कार', 'ईश्वर', 'आत्मा', 'वैराग्य', 'संन्यास', 'मृत्यु', 'स्मशान'—ये सभी बहुत ही भयावह ज्ञान पड़ते हैं। क्योंकि वह विषयों से आसक्त है। सस्ते शब्द नृत्य, संगीत विलासपूर्ण बातें उन्हें बहुत ही प्रिय हैं। यदि मनुष्य सच्चाई के साथ जगत का मिथ्या स्वभाव का चिंतन करना शुरू करे तो विषयों के प्रति आकर्षण धीरे धीरे क्षीण होता जायगा। लोग कामाग्नि में झुलस रहे हैं। इस भीषण व्याधि को दूर करने के लिये सभी साधनों का प्रयोग करना चाहिये। सभी व्यक्तियों को चाहिये कि वे इस कामरूपी वेशी को नष्ट करने के लिये सभी साधनों का परिश्रम रखें। यदि एक साधना से लाभ न हुआ तो उन्हें दूसरा साधन पकड़ना चाहिये। असंस्कृत मनुष्यों में काम पाशवी वृत्ति है। युद्धता की प्राप्ति तथा सतत ध्यान के अभ्यास से ही ईश्वर साक्षात्कार मिलता है—इसका शान रखते हुये भी वारम्बार उसी पाशवी क्रिया को करते रहने से मनुष्य में लज्जा आनी चाहिये। प्रतिपक्षी जन कह सकते हैं कि इन विषयों को खुले आंख नहानी रखना चाहिये, इन्हें गुप्त रूप से पढ़ना चाहिये। यह गलत है। तथ्यों को छिपाने से क्या लाभ है किंगी यस्त को छिपाना तो पाप है।

करने की शक्ति, तथा श्रमत्त्व प्राप्त कीजिये। जिसके पास वीर्य पर पूर्ण नियन्त्रण है, वह व्यक्ति उन शक्तियों को प्राप्त कर लेता है जिन्हें अन्य किसी साधन से नहीं प्राप्त कर सकते।

लोग ब्रह्मचर्य के बारे में बहुत बातें करते हैं। परन्तु व्यावहारिक जन तो विरले ही मिलते हैं। ब्रह्मचर्य का जीवन सन्मनुष्य ही कठिनाइयों से भरा हुआ है। परन्तु लौह संकल्प, धैर्य तथा संलग्न व्यक्ति के लिये मार्ग सुगम हो जाता है। हम वास्तविक ब्रह्मचारियों को कार्यक्षेत्र में देखना चाहते हैं जो अपने सखल शरीर, आदर्श जीवन, भव्य चरित्र तथा आध्यात्मिक बल से लोगों पर प्रभाव डाल सकें। केवल बातें करने से तो कोई लाभ नहीं होगा। कुछ व्यावहारिक जन आगे बढ़ें तथा आध्यात्मिक तेजस् के द्वारा कुमार्ग एवं युवकों का पथ-दर्शन करें। सिद्धांत से उदारहण कहीं बढ़कर है।

आज मानव जीवन की औसत अवधि ४० वर्ष की हो गई है जब कि पहले १०० वर्ष की थी। देश के प्रत्येक सुमेच्छु को चाहिए कि वह इस अपमान जनक अवस्था के प्रति सावधानी पूर्वक विचार करे, तथा समय रहते ही इसको सुधारने के लिए प्रयत्न शील बने। देश क भविष्य युवकों पर ही अवलंबित है। सन्ध्यासियों, साधुओं, गुप्तज्ञों शिष्यों तथा माता पिताओं का यह कर्तव्य है कि वे ब्रह्मचर्य-जीवन को पुनः जनता के जीवन में लाने के लिये प्रयत्नशील बनें।

हे कृष्ण, तु मुझे बहुत प्रिय है क्योंकि तू सत्यमार्ग पर चल रहा है। तू सच्चाई पूर्वक संग्राम कर रहा है। तू आत्मसात्कार के मार्ग का अनुगमन कर रहा है। यही कारण है कि मैंने आपको यह सम्मति दी है। तू नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, आत्मा है। हे प्रिय आनन्द! इसका अनुभव कीजिये। इस जन्माधिकार को प्राप्त कीजिये। विविध कार्यों में संलग्न रहते हुये भी इस जन्माधिकार को न छोड़िये। गुहा-जीवन से यह कहीं अन्च्छा है। यह सक्रिय जीवन है। यह शिव का सम्पूर्ण योग है। यही शंकर तथा बुद्ध का भी योग था।

[ बाएह ]

मेरे प्रिय भाइयो ! याद रखिये आप मांस तथा हाड से निर्मित स्वर शरीर नहीं है। आप अमर सर्वव्यापक सच्चिदानन्द आत्मा हैं। आप सजीव सत्य हैं। आप ब्रह्म हैं। आप आत्मा हैं। आप परम अतन्य हैं। आप सच्चे ब्रह्मचारी का जीवन-यापन कर इस परमावस्था को प्राप्त कर सकते हैं।

उपसंहार करते हुये मैं अपने दोनों हाथों को जोड़ कर हार्दिक गर्भना करता हूँ कि आप सभी शांति एवं सम्पत्ति के प्रबल शत्रु काम र विजय पाने के लिये साधना के द्वारा प्रबल संग्राम करेंगे। वास्तविक ब्रह्मचारी ही इस जगत का महान् सम्राट् है। सारे ब्रह्मचारियों को मेरा मूक नमस्कार है। उनकी जय हो ! मेरी प्रार्थना है कि शिस्तक, प्राध्यापक, तथा शिक्षा-विभाग के अधिकारी जन इस महत्वपूर्ण विषय नम्रचर्य की ओर अपना विशेष ध्यान देंगे जिससे कि भावी संतति का उत्थान हो सके।

आपके चेहरों से ईश्वरीय ज्योति विभासित हो !

आप सबों में ईश्वरीय ज्योति अधिकाधिक प्रखर हो !

आपमें दिव्य-शक्ति तथा शान्ति सदा के लिये निवास करे !

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

—:o:—

[ तेरह ]

विषय-सूची

प्रथम अध्याय

ब्रह्मचर्य क्या है !...
ब्रह्मचर्य के अष्ट अंग...
वीर्य...
ब्रह्मचर्य-व्रत...

दूसरा अध्याय

दीर्घायु का रहस्य...११
ब्रह्मचर्य का तात्पर्य...१५
ब्रह्मचर्य का महत्त्व...१६

तीसरा अध्याय

आधुनिक शिक्षा...२४
अध्यापकों तथा माता पिताओं के कर्तव्य...२६

चौथा अध्याय

ब्रह्मचारी कौन है !...३०
आखण्ड ब्रह्मचारी...३१
ऊर्ध्वरेता योगी...३२
ब्रह्मचर्य का माप-दण्ड...३६
स्त्रियों के लिये ब्रह्मचर्य...३७
गृहस्थियों के लिये ब्रह्मचर्य...३९

पाँचवां अध्याय

कामवासना की प्रवृत्तता...४१
कुसंगते का प्रभाव...४३
स्वमदोष...४४

[ चौदह ]

दुराचारी जीवन से हानियां....५८
दुर्विचार....६२
पवित्र विचारों को ग्रहण कीजिये....६५

छठा अध्याय

मन, प्राण और वीर्य....६७
वासनाओं की इतिथी कीजिये....७१
वैराग्य....७६

सातवां अध्याय

आहार संबंधी नियम....८३
ध्याय भोजन....८८
मिताहार....९०
मन (उपवास) तथा ब्रह्मचर्य....९१

आठवां अध्याय

ब्रह्मचर्य रक्षण की विधि....९५
दृष्टिकोण परिवर्तन कीजिये....१००
मत्स्य का माहात्म्य....१०१
विशेष उपदेश....१०३

नवां अध्याय

ऋतुयोग की प्रक्रियाएँ (१) सिद्धासन....११५
(२) शीर्षासन....११६
(३) सर्वोंगासन....११७
(४) मत्स्यासन....११८
(५) पादगुप्तासन....११९
आसन संबंधी सूचनाएँ....१२०
संघ मृग....१२२

[ पन्द्रह ]

६. मूल बंध ७. जालन्धर बंध ८. उद्वियान बंध१२३
(९) नीली क्रिया१२४
(१०) महामुद्रा१२५
(११) योगमुद्रा १२. सरल सुखपूर्वक प्राणायाम१२६
(१३) भक्ति का प्राणायाम१२७
(१४) अन्य प्रकार१२८
(१२) निश्चय कीजिये और ध्यान कीजिये१३१
(१७) टंडा हिप बाथ (कठि स्नान)१३२

दसवां अध्याय

कहानियां और चरित्र १. जैमिनी ऋषि
(२) सुकदेव मुनि : चित्त की एकाग्रता की जांच१३
(३) राजा ययाति१३
(४) सुकरात और उसका शिष्य (ब्रह्मचर्य संबंधी संभाषण)१३
(५) एक पिशाच (भूत) की कहानी१४
(६) सुदद और अशुदद मन१४

परिशिष्ट

(१) ब्रह्मचारी का गीत१४१
(२) ब्रह्मचर्य के नुस्खे१४१
(३) ब्रह्मचर्य माला१४६
(४) शाहंशाह की अंगूठी-एक सलाहकारी मित्र (वैराग्य की कृति)१४८
(५) क्या स्त्रियों के लिये ब्रह्मचर्य आवश्यक है ?१५१
(६) उत्पत्ति अवरोध (जन्म-निरोध) की विधि१५२
ब्रह्मनिग्रह की विधि१५३
उपाय, तिरथंक१५४

[ नोल्ह ]

(द्वितीय भाग)

ब्रह्मचर्य...१५७
कार्य सिद्धि करने के लिये ब्रह्मचर्य ही नींव है, ब्रह्मचर्य का महत्व...१५८
ब्रह्मचर्य की परमावश्यकता...१६४
ब्रह्मचारियों को उपदेश...१६८
ब्रह्मचारियों को पथ-प्रदर्शन...१७०
ब्रह्मचर्य माला...१७२
ब्रह्मचर्य के लिये सहायक...१७८
अनुश्यक...१८१
वरैता योगी...१८२
न—भयंकर द्रविशाप...१८५
तथा उस पर विजय...१८६
-जय...१८१
सम-संयम...२००
। आदर्श ब्रह्मचारी : श्री भीष्म...२०४
दनुमान जी...१०५
लक्ष्मण...२०७
। अथ तथा ब्रह्मचर्य...२०८
। चर्य मध्यन्धी उपदेश...२११
। चर्य के लिये कुछ नुस्खे...२१५
। के लिये मंत्र...२१६
। चर्य संयंभी तीन प्रेरणात्मक पत्र १-ब्रह्मचर्य का अभ्यास...२१८

—:०:—

प्रिय आत्मन्

पूर्ण ब्रह्मचर्य के बिना आप ठोस आध्यात्मिक उन्नति नहीं सकते। आध्यात्मिक मार्ग में अथूरी साधना को स्थान नहीं है।

सब से पहले शरीर को नियंत्रित कीजिये। तब प्रार्थना, कीर्तन, विचार तथा ध्यान के द्वारा अपने विचारों को शुद्ध बनाइये

दृढ़ संकल्प कर लीजिये—‘मैं आज से ही पूर्ण ब्रह्मचारी बन जाऊंगा

ईश्वर आपको ग्लोभनों पर विजय प्राप्त करने तथा काम-श का संहार करने के लिये आध्यात्मिक बल प्रदान करे। ॐ तत्सत् ।

—शिवानन्द

ब्रह्मचर्य साधना

पहला अध्याय

ब्रह्मचर्य क्या है ?

ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म की पवित्रता है। ब्रह्मचर्य अविवाहित जीवन है, ब्रह्मचर्य अत्यधिकार है, केवल जननेन्द्रिय को ही काबू में करना ब्रह्मचर्य नहीं है। यह ब्रह्मचर्य की विस्तृत (स्पष्ट) अर्थ में व्याख्या है। ब्रह्मचर्य वेदों और ईश्वर के आशय को निर्दिष्ट (सूचित) करता है। ब्रह्मचर्य में चरित्र निर्माण सम्मिलित है। ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। ब्रह्मचर्य एक यान्त्रित पदार्थ है। ब्रह्मचर्य बड़े महत्व की वस्तु है। लोग कहते हैं “ज्ञान शक्ति है।” परन्तु मैं पूर्ण विश्वास के

ब्रह्मचर्य साधना

साथ तथा अपने निजी अनुभव द्वारा यह घोषणा करके कहता हूँ कि चरित्र ही शक्ति है और चरित्र ज्ञान से भी कई अधिक श्रेष्ठतर है।

‘यम’ राजयोग का पहला अंग है। वह है—अहिंसा (किसी प्रकार की हिंसा न करना), सत्य (सत्य बोलना), अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (अविवाहित पवित्र जीवन-यापन करना), और अपरिग्रह (किसी से कुछ न लेना)—इनमें ब्रह्मचर्य का महत्व सब से अधिक है। ज्ञानयोग में साधक के लिए साधना की नींव दम (आत्म-संयम) है। महाभारत (शान्ति पर्व) में आपको मिलेगा “धर्म की कई शाखायें हैं, परन्तु उन सब का आधार ‘दम’ है।” जो मनुष्य आधिभौतिक या आध्यात्मिक जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए ब्रह्मचर्य का विषय बड़े महत्व का है। बिना ब्रह्मचर्य के मनुष्य सांसारिक कार्यों या आध्यात्मिक अभ्यासों के लिए पूर्ण अयोग्य है।

ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म से पवित्र (अविवाहित) रहने का व्रत है जिसके द्वारा मनुष्य ब्रह्म की प्राप्ति करता है। ब्रह्मचर्य एक दिव्य शब्द है। यह योग का तथ्य (सार) है। अविद्या के कारण हम इसे भूल गए हैं। यह उत्तम योग है जिसके लिए भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में बड़े जोर के साथ स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ध्यान के लिये ब्रह्मचर्य व्रत परम आवश्यक है—(अध्याय ६. श्लोक १४, अध्याय १७. श्लोक १४४ में)। भगवान् कृष्ण कहते हैं कि शारीरिक त्यों के लिये जो जो आवश्यक वस्तुयें हैं, उनमें ब्रह्मचर्य एक है। पुनः अध्याय ८. श्लोक ११. में

ब्रह्मचर्य क्या है ?

कहा है “योगी जन ध्येय (जिसको वेद वेत्ताओं ने बताया है) को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं।” यही बात कटोपनिषद् अध्याय १-२-१५ में मिलती है।

ईश्वर रस है। रस वीर्य है। रस या वीर्य प्राप्त कर के ही आप नित्यानन्द प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य का अर्थ है—वीर्य पर अधिकार, वेदों का अध्ययन, और व्रत चिन्तन। जैसा कि महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है—

कायेन मनसा वाचा सर्वावस्थातु सर्वदा ।

सर्वत्र मैथुन त्यागो ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥

अर्थात् शरीर, मन और वचन से सब स्थानों और सब स्थितियों में मैथुन से सदा बचे रहना ब्रह्मचर्य है।

ब्रह्मचर्य दो प्रकार का कहा गया है—एक शारीरिक और दूसरा मानसिक। शरीर पर नियन्त्रण रखना शारीरिक ब्रह्मचर्य है। डुरे विचारों पर नियन्त्रण रखना मानसिक ब्रह्मचर्य है। मानसिक ब्रह्मचर्य में कोई भी डुरे विचार मन में प्रविष्ट नहीं होंगे। मानसिक ब्रह्मचर्य शारीरिक ब्रह्मचर्य से कुछ अधिक कठिन है, परन्तु सच्ची लगन और परिश्रम के द्वारा मानसिक ब्रह्मचर्य पर वास्तविक आधिपत्य स्थापित किया जा सकता है। आपको सदा मानसिक ब्रह्मचर्य की भावना अपने सामने रखनी चाहिये। तब आप उसका शीघ्र ही अनुभव करेंगे। इसमें तनिक भी रुन्देए नहीं है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल जननेन्द्रिय को ही काबू में राना नहीं है, परन्तु मन, वचन और कर्म से सारो

ब्रह्मचर्य साधना

दन्दिद्वयों को भी । निर्वाण पद का द्वार पूर्णब्रह्मचर्य है परमानन्द के राज्य-द्वार को खोलने के लिए पूर्ण (शुद्ध) ब्रह्मचर्य एकमात्र कुंजी है । परम शान्ति रूपी धाम क मार्ग ब्रह्मचर्य या पवित्रता से ही आरम्भ होता है ।

सांसारिक पदार्थों की इच्छा पूर्ति ही पाप है । स्थूल शरीर तो अलौकिक पदार्थों के विषय में निरन्तर चिंतन करने वाली आध्यात्मिक भावना का एक तुच्छ गुलाम है । मनुष्य की उत्पत्ति इस लिये हुई थी कि वह ब्रह्म या ईश्वर के साथ आध्यात्मिक सम्पर्क रखते हुये जीवन-यापन करे, परन्तु वह उन दुष्ट अशुभों के प्रलोभनों के अधीन हो गया जिन्होंने उसको उसके विषय-सुख वाले स्वभाव की ओर प्रवृत्त कर उसे भगवत् चिंतन से दूर कर दिया तथा उसको सांसारिक जीवन यापन करने में जुटा दिया । इसलिये सब विषय सुखों के त्यागने, विवेक और वैराग्य के द्वारा अपने को संसार से दूर रखने, आत्मा के पीछे अकेला जीवन यापन करने तथा ईश्वर की पूर्णता और पवित्रता का अनुसरण करने में ही धर्मानुरूप भलाई है । ब्रह्मचर्य वसंत ऋतु का खिला हुआ पुष्प है जिसकी पंखुरियों में से अमरत्व निकलता है । धैर्य और वीरता के असाधारण गुण ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं । केवल छी मसंग (मैथुन) से बचे रहना ही पर्याप्त नहीं, परन्तु अनियंत्रित भावुकताओं हस्त और वंसे ही अन्य कार्य तथा सब प्रकार के विपरीत मैथुन-अभ्यासों से दूर रहना भी परमावश्यक है । वैसे ही प्रेम संबंधी चिन्ताओं तथा विषय भोग संबंधी वृथा चिंतन से सदा दूर रहना भी नितांत अनिवार्य है ।

ब्रह्मचर्य क्या है ।

काय-सिद्धि प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य एक आधार है । पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये । यह परम आवश्यक है । योग के अभ्यास से वीर्य श्रोत्र शक्ति में बदल जाता है । योगी का शरीर पूर्ण स्वस्थ होगा । उसकी चाल में आकर्षण और अनुग्रह होगा । वह (इच्छा मृत्यु) जब तक चाहे उतने ही वर्षों तक जीवित रह सकता है । यही कारण है कि भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं “तस्मात् योगो भवार्जुन” —अर्थात् हे अर्जुन तू योगी बन ।

मैथुन संबंधी विचारों और भावनाओं से मुक्त रहना ही ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म से इन्द्रिय-निग्रह है । यह पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिये समान रूप से आवश्यक है । भीष्म, हनुमान, लक्ष्मण, मीरा-वार्हा, सुलभा, और गार्गी—ये सब ब्रह्मचारी थे । भगवान् शंकर ने कहा है—“ब्रह्मचर्य सब से उत्तम तप है; ऐसा पूर्ण पवित्र ब्रह्मचारी वास्तव में ईश्वर है ।”

ब्रह्मचर्य अमरत्व प्राप्त करने के लिये मूल आधार है । ब्रह्मचर्य से आधिभौतिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है । ब्रह्मचर्य शरीर के भीतर रहने वाले काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिये एक प्रमोष शस्त्र है । यह विशिष्ट आनन्द, अस्वंड और नित्य सुख का देने वाला है । वह आर्यभिक वल, शुद्ध मस्तिष्क, विशालबुद्धि और इच्छाशक्ति, धारणा-शक्ति और उत्तम विचारशक्ति प्रदान करता है । केवल ब्रह्मचर्य के द्वारा ही आप शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं ।

ब्रह्मचर्य साधना

प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि वह अपने चरित्र को सुधारने का भरसक प्रयत्न करे। आपका सारा जीवन तथा जीवन में सफलता केवल आपके चरित्र निर्माण पर ही भरसक निर्भर है। संसार में सभी महापुरुषों ने जो प्रभुता प्राप्त की है वह केवल अपने चरित्र के ही द्वारा की है। संसार के प्रसिद्ध बुद्धिमान पुरुषों ने जो कर्त्तव्ययाति और मान प्राप्त किया है, वह केवल उनके चरित्र के ही द्वारा हुआ है।

ब्रह्मचर्य के अष्ट अंग

ब्रह्मचर्य के निम्नलिखित आठ अंग हैं। तदनुसार अष्ट ब्रह्मचर्य की धारा में आठ अवरोध (विघ्न)। आपको इन विघ्नों से पूर्ण विचार, पूर्ण पुरुषाध ॐ पूर्ण सावधानी के साथ बचना चाहिये।

(१) दुर्शन—किसी स्त्री या स्त्री के चित्र (फोटो) को कामातुर हृदि से देखना।

(२) स्पर्शन—स्त्री के पास बैठने, उसको छूने या उस को गले लगाने की इच्छा।

(३) केली—स्त्री के साथ खेलना।

(४) कीर्तन—स्त्री के गुणों की अपने मित्रों के सामने प्रशंसा करना।

(५) गुह्य भाषण—स्त्री के साथ एकांत में बातचीत करना।

(६) संकल्प—स्त्री का चिंतन करना।

(७) अध्यवसायम्—स्त्री के साथ विषय-भोग करने का हृदय संकल्प।

(८) क्रिया—स्त्री प्रसंग।

वीर्य

जो मनुष्य उपर्युक्त आठ प्रकार की वाधाओं से मुक्त है केवल वही सच्चा ब्रह्मचारी कहा जा सकता है। सच्चे ब्रह्मचारी को चाहिये कि वह इन वाधाओं से सर्वथा बचा रहे।

मनु महाराज का कथन है कि जब तक विद्यार्थी पाठशाला में अध्ययन करते हैं, तब तक उनको चाहिये कि वे अपनी इन्द्रियों पर पूरा पूरा नियंत्रण रखने का अभ्यास करें। उनको चाहिए कि वे मदिरा, मांस, सुगन्धित तैल या द्रव, फूल मालाएँ, व्री, गर्भ और तीक्ष्ण पदार्थ, अंजन, जूते, छाता, जूआ, गपशष्प, मिथ्या भाषण, स्त्रियों की ओर देखना, धनकम धनका करना और अन्यो के साथ शयन करना आदि आदि बातों से सदा बचे रहें। विद्यार्थी को स्वप्न में भी अपने वीर्य को नष्ट नहीं होने देना चाहिये। यदि वह जाने या अनजाने किसी भी प्रकार से वीर्य नष्ट करता है तो वह अपने कर्तव्य से न्युत होता है। यह उसकी मृत्यु है। यह पाप है। वह एक पतित व्यक्ति है। उसे चाहिये कि वह उचित साधना के द्वारा अपने वीर्य की रक्षा करे। केवल ब्रह्मचर्य और ब्रह्मचर्य के ही द्वारा आप जीवन में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।

वीर्य

अस से रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से चरवी, चरवी से हड्डी, हड्डी से मज्जा, और अन्त में मज्जा से शुक्र या वीर्य बनता है।

जो गुदा (मज्जा) हड्डियों के भीतर कुम्भ द्वारा रहता है, उससे वीर्य उत्पन्न होता है। वह सूक्ष्म स्थिति में शरीर

ब्रह्मचर्य साधना

के सब सूक्ष्म भागों में पाया जाता है। अन्न से रस बन है। रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से चरबी, चर से हड्डी और हड्डी से मज्जा और मज्जा से वीर्य उत् होता है। ये ही सात धातु इस शरीर और जीवन आधार हैं। गौर कीजिये कि वीर्य कितना कीमती है। वह अन्तिम सार है। वह सभी सारों का सार है। रक्त की ४ बूँदों से वीर्य की एक बूँद बनती है।

आयुर्वेद के अनुसार रक्त की ८० बूँदों से वीर्य व एक बूँद बनती है, ऐसा माना गया है। जिस प्रकार ईश्वर में रस और दूध में मक्खन सर्वत्र व्यापक रहता है ठीक उसी प्रकार सब शरीर में वीर्य व्यापक रहता है। जिस प्रकार दूध से मध्य कर मक्खन निकाल लेने के बाद पतली छाछ रह जाती है, ठीक उसी प्रकार वीर्य क्षय होने से वह पतला पड़ जाता है। जितना अधिक वीर्य का क्षय होगा उतना ही अधिक मनुष्य अशक्त होगा। योग शास्त्रों में कहा है “मरणम् त्रितु पातेन जीवनम् त्रितु रक्ष्यात्।” अर्थात् त्रितु (वीर्य) के पतन से मृत्यु और उसके रक्षण से जीवन प्राप्त होता है वीर्य ही मनुष्य में वास्तविक सार-भूत शक्ति है। वह मनुष्य के लिए गुप्त निधि है। वह मुख पर कांति (ब्रह्मतेज) और बुद्धि में तीव्रता प्रदान करता है।

अंडकोष की शैली में जो दो अंडकोष रहते हैं, उनको स्नाय या रस-ग्रन्थियां कहते हैं। इन अंडकोषों में एक विशिष्ट पदार्थ रहता है जो रक्त से वीर्य उत्पन्न करता रहता है। जिस प्रकार मधु-मन्त्रियां बूँद बूँद करके छुने में मधु एकत्रित करती हैं, ठीक उसी प्रकार इन अंडकोषों

वीथ

के सूक्ष्म-भाग रक्त की एक-एक बूँद के द्वारा वीर्य को एकत्रित करते हैं। तब यह स्नाव दो नाड़ियों के द्वारा शुक्र संबंधी स्थान को ले जाया जाता है। उच्चेजना या प्रकोप की अवस्था में वह विशिष्ट नाड़ियों के द्वारा मूत्र-नली में फँक दिया जाता है जहाँ वह शिश्न संबंधी स्नाव के साथ मिल जाता है। (इस विषय में विशेष जानकारी के लिए किसी शरीर रचना संबंधी शास्त्र का अवलोकन कीजिए) इस ज्ञान की आवश्यकता है। अब मैं परमावश्यक विभाग साधना की ओर चलता हूँ जिसमें वीर्य रक्षण के आभ्यासिक तरीके बताये गये हैं।

आयुर्वेद के अनुसार वीर्य सातवीं यानी आखिरी धातु है जो मज्जा से बनता है। इन सात धातुओं का निश्चित वर्णन ऊपर कर दिया गया है। प्रत्येक धातु के तीन भाग होते हैं। वीर्य स्थूल शरीर की, हृदय तथा बुद्धि की पुष्टि करता है। जो मनुष्य स्थूल शरीर, हृदय और बुद्धि तीनों का सदुपयोग करता है केवल वही पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है। एक पहलवान या कुश्ती करने वाला जो केवल अपने स्थूल शरीर ही को पुष्ट रखता है परन्तु अपनी बुद्धि और हृदय को उन्नत नहीं करता वह पूर्ण ब्रह्मचर्य कदापि नहीं रख सकता। वह केवल शारीरिक ब्रह्मचर्य ही रख सकता है न कि मानसिक और हार्दिक। वह धातु जिसका सम्बन्ध हृदय और मन से है नितन्देह वह जायगा। यदि कोई साधक केवल जप और ध्यान करता है और यदि वह अपने हृदय को उन्नत नहीं बनाता और यदि वह शारीरिक व्यायाम नहीं करता तो वह केवल मानसिक ब्रह्मचर्य ही प्राप्त कर सकेगा।