भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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राग जय

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राग-जय

साधारण व्यवहार में राग का अर्थ प्रबल कामुक प्रवृत्ति है। यह काम-तृप्ति के लिए सांसारिक तृष्णा है। वारंवार यौन-संबंध के द्वारा यह बहुत ही प्रबल होता जाता है।

रजोगुण के प्राधान्य होने पर मन में राग-वृत्ति उत्पन्न होती है। यह अविद्या का कार्य है। यह मन का विकार है। आत्मा सदा शुद्ध है। आत्मन् विमल या निर्मल है यह निर्वाकार है। यह नित्य शुद्ध है। भगवान् की लीला कायम रखने के लिये अविद्या शक्ति ने राग का रूप धारण कर लिया है। आप “चन्दी पाठ” या “हुणांशुमशती” में पायेगे:—

“या देवी सर्व भूतेषु कामरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥

मैं उस देवी को नमस्कार करता हूँ जो कि सभी प्राणियों में कामरूप से संस्थित है”

छोटे बालकों तथा बालिकाओं में राग वृत्ति रूप ले रहता है। यह उनको परेशान नहीं करता। स्त्रि प्रकार वृत्त बीज में प्रसुप्त रहता है उनी प्रकार काम भी वृद्धों में प्रसुप्त रहता है। वृद्धों में काम का राग दब जाता है। यह अविद्ध उपद्रव नहीं करता। युवकों तथा युवतियों के लिए ही यह काम अधिक उपद्रवी बन जाता है। पुत्र तथा त्रियों राग का गुलाम बन जाते हैं।

मांस, मछली, अंडे इत्यादि, राजसिक वस्त्र तथा राजसिक जीवन-यापन, इत्र, सिनेमा, उपन्यास-पठन, विषय-वार्ता, कुसंगति, मद्यपान, सभी प्रकार के उत्सेचक पदार्थ, बीड़ी, सिगरेट, आदि काम को उत्तेजित करते हैं।