ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
तथाकथित शिष्टित जनों के लिये भी यह समझना बड़ा ही कठिन है कि आत्मा में ही इन्द्रियातीत सुख है जो कि विषयों पर आश्रित नहीं है। सुषुप्ति में सभी आत्म सुख का अनुभव करते हैं। रात्रि में सभी अपनी आत्मा में निवास करते हैं। वे इसकी प्रतीक्षा करते हैं। वे इसके बिना नहीं रह सकते। वे सुन्दर विलक्षण वैश्वर करते हैं, इसी आत्मानन्द के लिए जहाँ पर कि इन्द्रियों काम नहीं करती तथा राग व द्वेष का गुजारा नहीं। हर सवेरे वे कहते हैं “रात्रि में गहरी नींद आई। मैंने बड़ा सुख अनुभव किया। मैं कुछ भी नहीं जानता था। मुझे जरा भी अशांति नहीं थी। मैं रात्रि में सोने के लिए गया तथा सवेरे प्रातः उठा सात बजे।” फिर भी मनुष्य इस अनुभव को भूल जाता है। माया की शक्ति प्रबल है। माया रहस्यमयी है। यह मनुष्य को अन्धकार के खड्ड में गिरा डालती है। मनुष्य प्रातः से ही दुबारा अपने विषयी जीवन आरम्भ करता है। इसका कोई अन्त नहीं।
कुछ अज्ञानी जन कहते हैं “काम को रोकना ठीक नहीं। हमें प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए। ईश्वर ने सुन्दरी युवतियों का निर्माण क्यों किया ? उनका दृष्टि में कुछ उपयोग तो होना ही चाहिए। हमें उपयोग करना चाहिये तथा सन्तति उत्पन्न करनी चाहिए। यदि सभी संन्यासी बनने लगेँ तथा अरण्य वास करना चाहें तो संसार का क्या होगा ? यह तो नष्ट ही हो जायगा। काम को रोकने से रोग उत्पन्न हो जाते हैं। हमको चाहिए कि अधिकाधिक सन्तानों की उत्पत्ति करें। शक्ति सन्तान के रहने से घर में सुख रहता है। यही जीवन का चरम लक्ष्य है। मैं वैराग्य, त्याग तथा निवृत्ति को पसन्द नहीं