ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंराग जय
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करता ।” यही उनका स्थूल दर्शन है । वे लोग चर्वाक तथा विरोचन की सन्तान हैं । अतिभोजन ही उनके जीवन का लक्ष्य है । इनके अनुयायी बहुत हैं । वे शैतान के मित्र हैं । उनका दर्शन कितना प्रशंसनीय है ! अपनी सम्पत्ति, स्त्री, सन्तान के नष्ट होने पर, असाध्य बीमारियों के द्वारा पीड़ित होने पर वे कहेंगे “हे ईश्वर हमें इस भयानक बीमारी से मुक्ति दे । मेरे पापों को क्षमा कर । मैं महान् पापी हूँ ।”
हर हालत में राग पर विजय पाना चाहिये । राग तथा काम को रोकने में बीमारियाँ उत्पन्न नहीं होतीं । स्थूल आविष्काधिक सुख तथा आनन्द की प्राप्ति होती है । प्रकृति के विरुद्ध जाकर ही तो आप आत्मा को पा सकते हैं । आत्मा प्रकृति से परे है । जिस तरह नदी में मछली पानी की धारा के विरुद्ध तैरती है उसी तरह आपको संसार धारा के विरुद्ध चलना होगा । तभी आपको आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति हो सकती है । यदि आप अज्ञेय आत्मानन्द को पाना चाहते हैं तो राग पर विजय पाना होगा । यौन सुख तो कोई भी सुख नहीं । यह विपत्ति निराशा, थकावट तथा दुःख से परिपूर्ण है । यदि आप आत्मा अथवा योग विद्या को जान लें तो आप सुगमता के साथ राग पर विजय पा सकते हैं । आत्म सुख की प्राप्ति तभी होगी जब कि आप संसार के सभी सुखों को त्याग दें । यही ईश्वर आपसे अपेक्षा रखता है । ये सुन्दरी स्त्रियाँ तथा धन माया के ही निमित्त हैं । इनके द्वारा ही माया आपको अपने प्रलोभनों में पड़ाना चाहती है । यदि आप एक सांसारी ध्यक्ति—कुसित कामनाओं, निम्न विचारों से पूर्ण बना रहना चाहते हैं तो आप हर तरह से ऐसा कर सकते हैं ।