भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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आत्म-संयम

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अपने अधीन रखने की शक्ति अथवा आदत ही आत्म-संयम है।

अपने को पहले वशीभूत करो। फिर आप दूसरों को वश में ला सकते हैं।

आत्म-संयम मन को शुद्ध बनाता, विचार शक्ति को मजबूत करता है तथा आपके आचरण को ऊपर उठाता है। यह आपको मुक्ति, शान्ति, सुख तथा आनन्द प्रदान करता है। यह आपकी संकल्प शक्ति को मजबूत बनाता है।

जो स्वयं पर विजय प्राप्त करता है, वह उस सेनापति, से बढ़कर है जो किसी देश पर विजय प्राप्त करता है।

आत्मसंयम वह कुञ्जी है जिससे नित्य सुख तथा अमृतत्व धाम का द्वार खुलता है।

अपने ऊपर विजय प्राप्त करने से बढ़कर अन्य कोई भी विजय नहीं है।

अपने इन्द्रियों तथा मन को नियन्त्रित करो। आप आत्मसाक्षात्कार करेंगे।

आत्मप्रभुत्व प्राप्त कीजिए। अपने ऊपर विजय प्राप्त पाइए। जब तक आपने ऐसा नहीं किया आप अपनी इन्द्रियों के गुलाम ही बने रहेंगे।

जो अपने काम का गुलाम है वह इस पृथ्वी पर सब से निकट गुलाम है जो अपने काम, इच्छा, तृष्णा तथा इन्द्रियों पर शासन करता है वह वास्तव में राजाओं का भी राजा है। वह आत्म-राज्य का सम्राट् है। उसके लिए राज्य तथा मुकुट आदि कुछ भी नहीं है। उसका साम्राज्य सर्वोत्तम है।

हर प्रलोभन को दवाने से, हर घुरे विचार का दमन करने से, हर कामना अथवा तृष्णा को नष्ट करने से,