भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

हर कटु शब्द को रोके रखने से, हर खुरे कार्य को निर्बंधि करने से शाश्वत शान्ति तथा सुख के लिए पथ प्रशर बनता है।

जो स्वयं पर हुक्मयत तथा शासन करता है वह दूषण पर भी शासन तथा हुक्मयत कर सकता है।

आत्मसंयम से कठिनाइयों को सहन करने की शक्ति तथा आपत्तियों का सामना करने की ताकत मिलती है।

आत्मसंयम से सर्वोच्च पुरुष की प्राप्ति होती है। आत्मसंयम मनुष्य का नित्य कर्तव्य है। दान तथा वेदाध्ययन से भी अधिक पुरुषकर है आत्मसंयम।

आत्मसंयम से आपकी शक्ति बढ़ती है। आत्मसंयम वड़ा ही पवित्र है। आत्मसंयम से आप सारे पापों को विशुद्ध हो जायेंगे। आप सच्चरित्र होंगे तथा शक्ति प्राप्त करेंगे। आप परम कल्याण को प्राप्त करेंगे।

आत्मसंयम के समान कोई कर्तव्य नहीं है। आत्मसंयम जगत में सर्वोच्च धर्म है। आत्मसंयम के द्वारा आप इस जगत में तथा परलोक में सर्वोच्च सुख का भोग करेंगे। आत्मसंयम से युक्त होकर आप महान् पुरुष प्राप्त करेंगे।

आत्मसंयमी व्यक्ति सुखपूर्वक उठता तथा इस संसार में विचरण करता है। वह सदा प्रसन्न रहता है। आत्मसंयम सब से महान् व्रत है।

आत्मसंयम रहित व्यक्ति सदा दुःख भोगता है। वह बहुत ही विपत्तियों को निमन्त्रित कर बैठता है। वे सभी उसके ही दोषों के कारण उत्पन्न होते हैं। क्षमा, धैर्य, अहंकार, निष्कृता, सत्य, इन्द्रिय दमन, कुशलता, तथा भद्रता, शील, दृढ़ता, उदारता, अक्रोध, सन्तोष, मधुर भाषण, दानशीलता, अद्भुत— इन सबों का समन्वय ही