ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म संयम है ।
गुरु के प्रति आदर तथा सबों के प्रति करुणा भी आत्मसंयम है । आत्मसंयमी व्यक्ति दूसरों की निन्दा नहीं करता । आत्मसंयमी व्यक्ति भूठ बोलना, अपहरण करना, तिन्दा करना, काम, लोभ, मद, अभिमान, भय, द्वेष, अनादर, आदि का परित्याग करता है ।
वह कभी भी कलंकित नहीं बनता । वह द्वेष से मुक्त रहता है ।
आत्म संयम द्वारा ही ब्रह्म के उस अमर धाम की प्राप्ति हो सकती है जो हृदय गुहा में छिपा हुआ है ।
आत्मसंयमी व्यक्ति सांसारिक सम्बन्धों तथा भावनाओं से उत्पन्न राग-पाशों से बद्ध नहीं होता ।
जहां आत्मसंयमी व्यक्ति रहता है वहीं अरण्य है । वही पवित्र स्थान है । आत्मसंयमी के लिए अरण्य की क्या आवश्यकता है ? जिसे आत्मसंयम नहीं उसके लिए भी अरण्यवास से क्या लाभ ?
आत्मसंयमी व्यक्ति परलोक में महान् पुण्यसंस्कार प्राप्त करता है । वह इस जगत में सम्मान प्राप्त करता है तथा दूसरे जगत में उन्नत पथ पर आरूढ़ होता है । वह नक्ष पद को प्राप्त करता है वह मुक्ति प्राप्त करता है ।
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