भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

तीन आदर्श ब्रह्मचारी

श्री भीष्म

भीष्म का पहला नाम देवव्रत था। वे महार शान्तनु के लड़के थे। इनकी माता गंगादेवी थीं। वे देवता के अवतार थे। किसी आपवश उनकी इस भू पर जन्म धारण करना पड़ा था।

एक बार महाराजा शान्तनु एक मछुआ-सरदार की लड़की सत्यवती पर आसक्त हो गए। वे उसके पि के पास शादी का प्रस्ताव लेकर गये। मछुआ सरदार कहा—“मैं अपनी लड़की देने के लिए तैयार हूँ पर आपको एक प्रतिज्ञा करनी होगी। मेरी लड़की से उस पुत्र को ही अपना उत्तराधिकार प्रदान करेंगे।”

अपने प्रिय पुत्र देवव्रत के रहते राजा यह प्रतिज्ञा नहीं कर सकते थे। वे खिन्न होकर लौट आये। त्रिीर दुख रहने लगे। देवव्रत को यह बात मालूम हुई। अपने पिता का दुख दूर करने के लिए स्वयं वे मछुआ-सरदार के पास गये। उस सरदार के समक्ष ही उन्होंने प्रतिज्ञा की “इस लड़की से उत्पन्न पुत्र ही इस राज्य का उत्तराधिकारी होगा। मैं इस राज्य का त्याग करता हूँ।”

सरदार ने कहा—“मैं आपकी शिष्टता की स्तुति करता हूँ। परन्तु आपके पुत्र मेरी लड़की के पुत्र को बलपूर्वक राज्य से हटा सकते हैं।

देवव्रत ने कहा—हे सरदार सुनो ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचारी बना रहूँगा। जगत की सारी रजियां मेरे लिए माता हैं। मैं हस्तिनापुर के राजा का परम भक्त बना रहूँगा। पुत्र रहित मृत्यु प्राप्त