भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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तीन आदर्श ब्रह्मचारी

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करने पर भी मैं नित्य सुख तथा अमृतत्व को प्राप्त करूँगा।

स्वर्ग के देवताओं ने पुष्पवृष्टि की तथा कहा—“यह भीष्म प्रबल है।” तब से ही देवव्रत भीष्म कहलाये।

सत्यवती तथा शान्तनु के बीच विवाह हो गया। शान्तनु बहुत ही प्रसन्न हुए तथा उन्होंने अपने पुत्र को यह वरदान दिया—“ईश्वर सदा तुम्हारी रक्षा करे ! जब तक तुमको जीवित रहने की इच्छा है तब तक मृत्यु तुम्हारे पास नहीं फटकेगी। मैं तुमको इच्छा-मृत्यु का वर देता हूँ।”

भीष्म ने आदर्श ब्रह्मचर्य का जीवन बिताया। महाभारत के युद्ध में वे मय से बड़े योद्धा थे। वे एक दार्शनिक सलाहकार भी थे। वे गुरु, राजनीतिज्ञ तथा धर्म-मर्मज्ञ थे। वे आत्म संयम तथा तिलीक्षा के अवतार थे। वे कई दिनों तक शरशैल्या पर पड़े रहे। उन्होंने युधिष्ठिर को राजनीति, धर्म, दर्शन, सामाजिक नीति तथा सदाचार आदि विषयों पर अनमोल उपदेश दिए। उनके उपदेश तथा उनके जीवन का आदर्श आज भी मानव इतिहास में जाज्वल्यामान है। वे आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं।

उस भीष्म को मेरा नमस्कार है। हम सभी उनके आदशों को अपने जीवन में उतारें। श्री भीष्म जी की जै !

श्री हनुमान जी

श्री हनुमान जी माता अंजना के पुत्र थे। इनके पिता थे वायुदेव। बचपन से ही श्री हनुमान जी की वीरता समुद्र के समान असीम थी।

बचपन में ही वे सूर्यदेव को निगलने के लिए चला पड़े। सूर्य की तप्त किरणें हनुमान जी के शरीर पर पड़ती थीं परन्तु फिर भी वे आकाश की छाती को चिरते हुये